कर्ज और फिर माफी का ड्रामा बन्द हो

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किसान की अर्थव्यवस्था को पूरा समझना पड़ेगा ,लोन लेने व देने वाले दोनों की भूमिका है। चार किसान हैं।
एक किसान निकम्मा है। सरकार बैंक से लोन ऑफर करती है। वो लोन लेकर शराब में, मकान में या शादी में खर्च कर देता है। लोन नहीं चुका पाता।
दूसरा किसान मेहनत से काम करता है। ईमानदार है। नीयत भी है मगर कर्ज नहीं चूका पाता।
तीसरा किसान मेहनती है। ईमानदार है। नीयत भी है और कर्ज चुका देता है।
चौथा किसान बैंक से कर्जा ही नहीं लेता।
सरकार का ट्रेंड बन गया है कि हर चुनाव से पहले कर्ज माफी का वादा किया जाता है और सरकार बनने पर कर्ज माफ़ भी कर दिया जाता है। चारों किसान हैं। उनकी कार्यक्षमता पर, सोच पर और सरकार से मिली लूट का उनके मन पर क्या प्रभाव होगा। जो लोन चुका पायेगा उसे पश्चाताप होगा। जिसने लोन नहीं लिया वो हतोत्साहित होगा और जिसने पैसा उड़ा दिया उसको प्रोत्साहन मिलेगा।
राजनैतिक पार्टियों के द्वारा वोट के लालच में बार-बार कर्जमाफी का नाटक भारतीय कृषि के लिए अत्यंत घातक और एक क्रूर मजाक साबित हो रहा है। बार-बार लोन माफी किसान के एक वर्ग को भारी मुसीबत दे रही है। आप किसान को मुफ्त बिजली दीजिये, कृषि भूमि के हिसाब से खाद दीजिये और सब्सिडाइज्ड बीज दीजिये उसे उन्नत खेती का प्रशिक्षण दीजिये। मगर बार-बार कर्ज और माफी का ड्रामा बंद होना चाहिए। ये एक नशे की लत जैसा है। जहर है। विकास के रास्ते की बाधा है।
सिर्फ एक विचार…..
– आशालता पाठक

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