गन्ने के मुख्य रोग एवं रोकथाम

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गन्ने-के-मुख्य-रोग-एवं-रोकथाम

लाल सडऩ रोग- यह रोग एक फफूंदी द्वारा होता है। इस रोग से प्रभावित पौधों की तीसरी और चौथी पत्तियाँ पीली होकर सूख जाती हैं। गन्नों की गांठों तथा छिल्कों पर फफूंदी के बीजाणु विकसित हो जाते हैं। ग्रसित गन्नों को फाडऩे पर इसके आंतरिक उत्तकों पर लाल रंग के बीच में सफेद रंग के धब्बे प्रतीत होते हैं। गन्ने का गूदा लाल भूरे फफूंद के धागों से भर जाता है। सूंघने पर अल्कोहल जैसी गन्ध आती है। यह रोग एक वर्ष से दूसरे वर्ष बीज से तथा रोगी फसल की मोढ़ी लेने से फैलता है।
रोकथाम:

  • रोगरहित बीज का चुनाव करें।
  • रोगरोधी किस्मों का चुनाव करें।
  • रोगी पौधों को निकालकर नष्ट कर दें।
  • बितारी वाले खेत की मोढ़ी न लें।
  • रोग को कम करने के लिए एक वर्ष का फसल चक्र अपनाएं।

कंडुआ (स्मट) – यह एक फफूंद नामक रोग है। इस रोग का मुख्य लक्षण यह है कि गन्ने के ऊपर के भाग से लंबी चाबुक जैसी संरचना निकलती है जिसमे काले रंग के बीजाणु चांदी रंग की झिल्ली में भरे होते हैं। ग्रसित पौधों से कल्लों का फुटाव हो जाता है जो बौने रह जाते हैं।
रोकथाम:

  • बिजाई के समय स्वस्थ बीज लें।
  • रोगी पौधों में काली दुम के ऊपर थैली चढ़ाकर नीचे से काट लें।
  • रोगी पौधों को जड़ सहित उखाड़ कर जला दें।
  • रोगी फसल की मोढ़ी ना लें।
  • नम ऊष्मा विधि से उपचारित बीज से पैदा हुई नर्सरियों से ही बौने के लिए बीज लें।
गन्ना हमारे देश की एक मुख्य नगदी फसल है। यह नकदी फसलों में से एक मुख्य फसल है। गन्ने में कई बीमारियाँ आती है जिनमें से लाल सडऩ, उखेड़ा, कांगियारी, बौना व घसैला रोग प्रमुख है। अगर किसान भाई इन बीमारियों की पहचान करके व समय से रोकथाम कर लें तो अच्छी पैदावार ले सकते हैं। इनके लक्षण व रोकथाम के उपाय निम्नलिखित हैं।

सोका रोग – इस बीमारी से पत्ते पीले होकर मुरझा जाते हैं और बाद में पूरा गन्ना सूख जाता है। गन्ना हल्का व अंदर से खोखला हो जाता है। गन्ने की लम्बाई में चीर कर देखने से अंदर का भाग गुलाबी व लाल रंग का दिखाई पड़ता है किन्तु इसमें सफेद रंग के धब्बे नहीं होते।
रोकथाम :

  • रोगरहित बीज का इस्तेमाल करें।
  • रोगी खेत में कम से कम तीन साल तक का फसल चक्र अपनाएं।
  • रोगी फसल की मोढ़ी ना रखें।

पेढ़ी का बौनापन (रेटून स्टंटिग) – यह रोग सूक्ष्म जीवाणु से होता है। इस रोग के कारण पौधों की बढ़वार रुक जाती है जिससे पौधे बौने रह जाते हैं। यह रोग प्रमुख रूप से पेढ़ी की फसल में होता है। संक्रमित गन्नों की गठानों के पास का गूदा हल्का गुलाबी रंग का हो जाता है।
रोकथाम: बीज का गर्म पानी या नम गर्म हवा 54 डिग्री से.ग्रे. पर 2 घण्टे तक उपचार करें।
पौक्हा बोईंग – यह गन्ने की एक गौण बीमारी है जो वायुजनित फफूंद से प्रसारित होती है। रोगग्रस्त पौधों की गोब की ऊपरी पत्तियाँ आपस में उलझी हुई होती है, जो बाद की अवस्था में किनारे से कटती जाती है और गन्ने की गोब पतली लम्बी हो जाती है तथा छोटी-छोटी एक दो पत्तियाँ ही लगी होती है। अन्त में गन्ने की गोब की बढ़वार वाला अग्र भाग मर जाता है और सडऩे जैसी गंध आती है। अग्रभाग के सड़ जाने के उपरान्त अगल-बगल की आंखों में फुटाव हो जाता है।
रोकथाम:

  • अवरोधी किस्मों का चुनाव करें।
  • कार्बेन्डाजिम (1ग्राम/ली. पानी या कॉपर ऑक्सीक्लोराड 2 ग्राम/ली. पानी) या मैंकाजेब (3 ग्राम/ली. पानी) के साथ फसल पर छिड़काव करें।

घसैला या घासी प्ररोह – यह रोग माइक्रोप्लाज्मा सूक्ष्म जीव से उत्पन होता है। इस रोग से गन्नों की जगह घास जैसे बारीक कल्ले निकलती हैं। पत्तियाँ छोटी, पतली और सफेद या पीले रंग की होती है। रोगग्रस्त पौधों में गन्ने कम बनते हैं तथा छोटे रह जाते हैं।
रोकथाम:

  • स्वस्थ बीज का प्रयोग करें।
  • रोगी पौधों को खेत से निकाल दें।
  • बीज को आद्र्र गर्म हवा 54 डिग्री से. ग्रे. पर 2 घण्टे तक उपचार करके ही बीजें।

 

  • पूजा सांगवान
  • कुशल राज
  • ऐनी खन्ना
  • नमीता सोनी
    email : choudhary.shweta737@gmail.com
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