सही समय, सही तरीके से बढ़ता है उत्पादन

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सघन खेती एवं असंतुुलित उर्वरक उपयोग के कारण कृषि भूमि में पोषक तत्वों की उपलब्ध मात्रा में कमी एवं असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होती जा रही है, फलस्वरूप भूमि की उर्वरता एवं उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इस उत्पादन में पोषक तत्वों का महत्वपूर्ण योगदान है इसलिए उर्वरकों के बढ़ते मूल्यों को देखते हुए इनके कुशल समुचित और समन्वित उपयोग करना आवश्यक हो गया है परंतु महत्वपूर्ण तो यह है कि उर्वरकों की क्षमता को कैसे बढ़ाया जाए अर्थात् जो उर्वरक हम उपयोग कर रहे हैं उनका पौधा भरपूर उपयोग कैसे करें। क्योंकि जो हम नत्रजन उपयोग करते हैं उसका 40 से 60 प्रतिशत तथा फास्फोरस का 15 से 20 प्रतिशत ही पौधा उपयोग कर पाता है।
उर्वरकों का सही समय व सही तरीके से उपयोग निश्चित ही उसकी उपयोग क्षमता बढ़ाता है। परिस्थिति अनुसार व फसल अनुसार उर्वरक देने से उपज में भारी वृद्धि होती है। फसलों की आवश्यकता के अनुसार तत्वों को फसलों में देने का अलग-अलग समय निम्न प्रकार है।
नत्रजन (नाइट्रोजन)- पौधों को नत्रजन की आवश्यकता वृद्धि के आरंभ में कम, वृद्धि के समय अधिक व वृद्धिकाल व परिपक्वता के समय के बीच कम होती है। अत: नत्रजन के उर्वरक की कुछ मात्रा बुआई के समय व शेष मात्रा वृद्धिकाल तक देते हैं। जो फसलें 4-5 महीनें में पकती है उनको नत्रजन की कुल मात्रा दो बार में, जो 9-12 महीने में पकती है। 3-4 बार में और जो इससे अधिक समय खेत में खड़ी रहती है। जैसे गन्ने की अधसाली फसल, नत्रजन की कुल मात्रा 4-5 बार में देते हैं। रेतीली मृदाओं में नत्रजन की मात्रा को कई बार में देना आवश्यक है।
फास्फोरस- पौधे में फास्फोरस की आवश्यकता प्रारंभ में ही जड़ों की वृद्धि के लिये होती है। जब पौधे अपने कुल शुष्क भार का 1/3 हिस्सा तैयार कर लेते हैं। उस समय तक फास्फोरस की कुल आवश्यकता का 2/3 भाग मृदा से ग्रहण करते हैं। अत: फास्फोरस की कुल मात्रा फसल की बुआई के समय ही खेत में देनी चाहिए।
पोटाश – यदि भूमि में पोटाश उपलब्ध अवस्था में है जो जब तक फसल की वृद्धि होती हैं। उसे ग्रहण करते रहते है। उपलब्ध पोटाश को फसलें आवश्यकता से अधिक ग्रहण कर लेती हैं। अधिक मात्रा जो पौधों द्वारा ग्रहण की जाती है। उससे पौधों की वृद्धि नहीं होती, अत: पोटाश को भी खेत में फसलों की बुआई के समय दे देना चाहिये।
जैविक खाद- कम्पोस्ट व गोबर की खाद को फसल बोने से एक माह पूर्व ही खेत में डालते हैं। इन खादों को इसलिये पहले खेतों में डालते हैं, जिससे कि फसल के अंकुरण के समय तक इन खादों में उपस्थित अवस्था में परिवर्तित हो जाए।
सूक्ष्म तत्व- विभिन्न सूक्ष्म तत्व जैसे लोहा, तांबा व जस्ता आदि का हमें पहले ही ज्ञात हैं कि मृदा में इन तत्वों की कमी है, तो बुआई के समय, खेत में डाल देते हैं या फिर जैसे ही फसलों में किसी तत्व विशेष की कमी के लक्षण दिखाई दें, इन तत्वों को खेत में छिड़क देते हैं।
खाद की मात्रा को निर्धारित करने वाले कारक –
शस्य चक्र- फसल चक्र में यदि हरी खाद उगा रहे हैं या दलहनी फसल उगा रहे हैं, तो इसके बाद वाली फसलों को नत्रजन के खादों की कम आवश्यकता हैं।
फसल की किस्म – अलग-अलग फसलों में पोषक तत्व संबंधी आवश्यकता अलग-अलग होती है। उदाहरण के लिये दलहनी फसलों की नत्रजन की आवश्यकता गेहूं या गन्ने की फसल की तुलना में कम होती है।
मृदा या भूमि उर्वरता व गठन – जो मृदाएं कमजोर अथवा कम उर्वरा होती हैं उनमें अधिक खाद की आवश्यकता होती है। जैसे बलुई भूमियों में दोमट मृदाओं की अपेक्षा एक ही फसल को अधिक खाद देना पड़ता है।
खरपतवार का प्रकोप- यदि खेत में खरपतवारों का प्रकोप अधिक है, तो फसल की खाद संबंधी आवश्यकता बढ़ जाती है।
मृदा में नमी की मात्रा – मृदा में नमी की मात्रा कम है और सिंचाई के साधन भी उपलब्ध नहीं हैं तो भूमि में खाद की मात्रा भी कम दी जाती है।
खाद की किस्म- एक ही तत्व को खेत में देने के लिये बाजार में कई उर्वरक उपलब्ध होते है। जिन खादों में तत्व की प्रतिशतता अधिक होती है उनकी मात्रा कम करते हैं।
मौसम- शुष्क मौसम होने पर खेत में उर्वरक की कम मात्रा प्रयोग की जाती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में खाद तत्व उद्धीपन से या अपधावन द्वारा अधिक नष्ट होते हैं।
खाद देने की विधि समय स्त्रोत- खाद देने की विधि भी खाद की मात्रा को कम या अधिक करती है। उदाहरण के लिये हम खेत में नत्रजन देने के लिये यूरिया उर्वरक के घोल का छिड़काव करें तो फसल की आवश्यकता पूर्ति के लिये कम खाद की आवश्यकता होगी और यदि खाद ठोस रूप में मृदा में बिखेर दी जाये तो इसकी अधिक मात्रा की आवश्यकता होगी। यूरिया को हल्की नम मिट्टी के साथ रात भर मिलाकर रखें तथा दूसरे दिन मिट्टी का छिड़काव करें।
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