संरक्षित खेती का महत्व

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संरक्षित खेती का मतलब होता है खेती करने का एक आधुनिक और वैज्ञानिक तरीका जिसके अन्र्तगत पौधों को विपरीत प्रकृतिक परिस्थितियों या प्रतिकूल वातावरण जैसे तेज गर्मी, तेज सर्दी, तेज हवा, तेज प्रकाश की तीव्रता, अतिवृष्टि, अनावृष्टि इत्यादि से पौधों का बचाव किया जाता है पौधों को संरक्षण दिया जाता है और उन्हें अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान की जाती है जो कि उनकी बढ़वार में सहायक होती है और इस तरीके से उनसे अच्छी गुणवत्ता की और ज्यादा पैदावार प्राप्त की जाती है।
इस प्रकार से जो खेती की जाती है उसे हम संरक्षित खेती कहते हैं। संरक्षित खेती के अंतर्गत कई कृत्रिम संरचनाएं बनानी पड़ती हैं जैसे पॉलीहाऊस, शेडनेट हाऊस, ग्लास हाऊस, वाकिंग टनल, लो टनल इत्यादि। इन संरचनाओं के अंदर तापमान, आद्र्रता वायु का बहाव, प्रकाश की तीव्रता और सी.ओ.टू (कार्बन डाय आक्साईड) का स्तर काफी हद तक नियंत्रित किया जाता है और पौधे की बढ़वार में सहायक सभी अनुकूल परिस्थितियां प्रदान की जाती हैं। इस प्रकार से जो खेती की जाती हैं उसे संरक्षित खेती कहते हैं। अगर हम ग्रीन हाऊस के बारे में बात करें तो ग्रीन हाऊस लोहे की पाईपों से बना एक ऐसा घर है जो कि पारदर्शी आवरण से ढका रहता है। अगर ये पारदर्शी आवरण पॉलीथिन है तो इसे हम पॉली हाऊस कहते हैं पॉली हाऊस का इस्तेमाल आमतौर पर कट फ्लावर की खेती यानि डंडी वाले फूलों की खेती के लिए किया जाता है और डंडी वाले फूल जो हमारे राजस्थान के अंदर लगाये जा सकते हैं वो हैं डच्च गुलाब, जरबेरा और कुछ जगहों पर हम कारनेशन भी लगा सकते हैं। इसके अलावा बेमौसमी सब्जियों की खेती भी पॉली हाऊस में की जा सकती है। शेडऩेट के बारे में कहा जाता है शेडनेट लोहे की पाईपों से बना ऐसा ढांचा होता है जो कि हरे रंग की या सफेद रंग की जाली से या शेड नेट से ढ़का होता है। उसे हम शेडनेट करते हैं। शेडनेट हाऊस के अन्र्तगत हम सब्जियों की खेती कर सकते हैं बेमौसमी सब्जियाँ लगा सकते हैं बेल वाले टमाटर, हरी, लाल, पीली, बैंगनी, नारंगी रंगों वाली शिमला मिर्च, धनियां, बीज रहित खीरा इत्यादि। पर सबसे अच्छा व्यवसाय तो नर्सरी का व्यवसाय है जिसको की आप शेडनेट हाऊस के अन्दर कर सकते हैं। इसके अन्दर आप सब्जियों की पौध भी तैयार कर सकते हैं उसके लिए आप को चाहिए प्लास्टिक की प्रो ट्रे या नर्सरी ट्रे जिसमें की लगभग अठयानवें  छेंद होते हैं उन छेदों के अन्दर कोको पिट एवं वर्मीकम्पोस्ट भरा जाता है और कोको पिट भरने के पश्चात उनमें एक-एक बीज लगा दिया जाता है इस तरीके से पौध तैयार की जाती है टमाटर की पौध तैयार होने में लगभग 25 से 28 दिन लगते हैं। शिमला मिर्च या हरी शिमला मिर्च की पौध तैयार करने में 35 से 40 दिन लगते हैं और वैसे ही अगर आप खीरे की पौध तैयार करना चाह रहे हैं सर्दियों के अन्दर, तो सर्दियों में लगभग आप को 20 से 21 दिन लगते हैं और गर्मियों में यह 15 से 18 दिन में तैयार हो जाती है।  ‘लो टनलÓ लो टनल का मतलब होती है छोटी सुरंगनुमा संरचना या एक ढ़ाचा जो कि छोटा सुरंगनुमा आकार का होता है खासतौर से इसको बनाया जाता है लगभग जब तेज सर्दियां पड़ती हैं दिसम्बर, जनवरी माह में (15 दिसम्बर से 15 जनवरी तक) इसको बनाया जाता है और पहले एक मीटर की बेड बनाई जाती है जो की ऊपर से 90 से.मी. होती है और उसके ऊपर यू शेप या अद्र्धचन्द्राकार में पाईप या लोहे का तार लगा दिया जाता है प्लास्टिक की पाईप या मोटा तार बेन्ड करके लगा दिया जाता है और उसको हर ढाई से तीन मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। इसे हुप्स कहा जाता है और इन हुप्स को ऊपर से पॉलीथिन से ढ़क दिया जाता है और उसके अन्दर खेती की जाती है। पॉलिथिन के स्थान पर नोन वोवन प्लास्टिक का इस्तेमाल भी किया जा सकता है और इसमे छेद करने की जरूरत नहीं होती है। इस तरह की खेती जो कि जाती है लो टनल के अन्दर ये आमतौर पर सर्दियों में की जाती है। कुछ सब्जियां या फसलें होती हैं जो उग नहीं पाती सर्दियों की वजह से परन्तु इस तरीके की सुरंगनुमा लो टनल बनाकर उसके अन्दर अच्छी तरह से ना केवल उगाई जा सकती है बल्कि अच्छी गुणवत्ता का उत्पाद एवं ज्यादा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है जिनका बाजार में अच्छा भाव मिलता है जैसे खासतौर से बेल वाली फसलें जैसे छप्पन कद्दू, टिन्डा, खरबूजा, तरबूज इत्यादि आमतौर पर लगाये जाते हैं और इनसे अच्छे बाजार भाव प्राप्त होते हैं और इस तरह की जो लो टनल होती हैं इनकी ऊंचाई एक सवा मीटर की होती है और इसके अन्दर व्यवसायिक खेती की जा सकती है और इसका चलन बड़ी तेजी से बढ़ रहा है।
संरक्षित खेती आज हमारे किसान भाईयों के लिए वरदान सिद्ध हो रही है और किसान भाई इसे अपना कर ना केवल अच्छी आमदनी प्राप्त कर रहे हैं बल्कि समाज में अच्छा नाम, अच्छी इज्जत और अपनी अच्छी पहचान बना रहे हैं।
युवा वर्ग भी इस प्रकार के वैज्ञानिक और आधुनिक खेती के प्रति आकृषित हो रहा है और खेती से जो उनका मौह पूर्व में भंग हो गया था। वह मौह वापस पैदा हो रहा है और वह खेती के प्रति आकृषित हो रहे हैं और इससे जुड़ रहे हैं। पिछले कुछ सालों में किसान भाईयों ने मल्च का प्रयोग करना भी खेती में चालू कर दिया है। मल्च का मतलब होता है प्लास्टिक की एक पतली फिल्म जिसको की उठी हुई क्यारियों पे बिछा दिया जाता है। इसके अपने फायदे हैं। मल्च वैसे तो कई रंगों में आती है। मल्च के अपने कुछ फायदे हैं, पहला इससे पौधे के आस पास खरपतवार नहीं उगती है जिससे आपको अतिरिक्त मजदूर या मेहनत नहीं लगानी पड़ती है दूसरा पानी का संरक्षण होता है, क्योंकि पानी का वाष्पीकरण नहीं हो पाता और नमी ज्यादा समय तक रहती है, तीसरा जो सिल्वर रंग की परत ऊपर की तरफ है तो उस पर सूर्य की किरणें गिरती हैं और दर्पण के रूप में परावर्तित हो जाती हैं और ये किरणे परावर्तित होकर मल्च से निचले पत्तों पर निचली तरफ पड़ती है जिससे वहाँ पर किसी प्रकार के कीट-पतंगे उस प्रकाश के कारण वहां रह नहीं पाते और वहां से जाने को मजबूर हो जाते हैं। इस प्रकार से सिल्वर रंग के मल्च का प्रयोग करते हैं तो कीट-पतंगों का प्रकोप भी कम होता है। तो मोटे तौर पर हम देखें तो खरपतवार उग नहीं पाती है मल्च का प्रयोग करने से, दूसरा पानी का संरक्षण होता है, तीसरा कीट-पतंगों का भी प्रकोप कम होता है जिससे पौधे में बीमारियाँ कम होती हैं।
जैसे कि अभी गर्मियों के समय में हम हमारे किसान भाईयों को कहते हैं कि आप अपने यहा पर पॉली हाऊस या शेडऩेट हाऊस के अन्दर हरा धनियां लगाइयें, हरे धनियेंं के भाव इस समय गर्मियों में काफी अच्छे मिलते हैं और इस तरह से किसान भाईयों को चाहिए कि जो भी बेमौसमी सब्जियाँ हैं उनको वह अपने खेतों में कृत्रिम संरचनाएं बनाकर लगायें और उनसे अच्छा उत्पाद और ज्यादा पैदावार प्राप्त करें और अच्छा मुनाफा कमायें। अब सरकार भी इस प्रकार की संरक्षित खेती को प्रोत्साहन दे रही है। इसके लिए वह अनुदान भी दे रही है। साथ में समय-समय पर किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी रखे जाते हैं। ऐसे में हमारे किसान भाई अपने नजदीकतम उद्यान विभाग या कृषि विभाग के कार्यालय में सम्पर्क कर सकते हैं और वहां के अधिकारियों से इस प्रकार के कार्यक्रमों के प्रशिक्षण केन्द्र व प्रशिक्षण केन्द्र के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं प्रषिक्षण के लिए रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं और इन्हें अपना कर विकास की दौड़ में आगे बड़ सकते हैं। किसान भाईयों अगर आप संरक्षित खेती करना चाहते हैं तो इसके लिए प्रशिक्षण बेहद जरूरी है और इस प्रकार का प्रशिक्षण समय-समय पर उद्यान विभाग और कृषि विभाग द्वारा जिला स्तर पर या तहसील स्तर पर किया जाता है। उसमें आप सहभागी हो सकते हैं और वहां के अधिकारियों से पूर्ण जानकारी प्राप्त कर इस प्रकार की स्कीम का फायदा उठा सकते हैं। और संरक्षित खेती कर दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की कर सकते है। अत: सभी कृषक भाइयों को चाहिए की एक नई शुरूआत करें। आओ संरक्षित खेती अपनायें और अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करें।

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