रोटावेटर युक्त मेड़ बनाने व बीज बोने की मशीन

भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश की अधिकतर आबादी की जीविका का मुख्य स्त्रोत खेती है। परन्तु खेती में बढ़ती हुई लागत चिंता का विषय है। अधिक लागत लगने के कारण खेती की ओर ग्रामीणों का रूझान कम होने लगा है क्योंकि अधिक लागत एवं मौसम की अनिश्चितता खेती से होने वाले आय को प्रभावित करती है । खेती की परम्परागत विधि में किसान भाई बुवाई से पहले कई बार जुताई करते हैं जिससे लागत काफी बढ़ जाती है क्योंकि ट्रैक्टर से जुताई करने पर डीजल की आवश्यकता होती है। जिसके लिए हमारा देश दूसरे देशों से कच्चा पेट्रोलियम तेल का आयात पर निर्भर रहता है। इसमें हमारे देश में संचयित विदेशी मुद्रा व्यय हो जाती हैै। तथा बार-बार जुताई करने पर खेत की नमी उड़ जाती है और सिंचाई के लिए अधिक पानी की आवश्यकता होती है। पानी की लगातार निकासी के कारण जल स्तर काफी नीचे जा रहा है। इन सभी बातों को ध्यान में रखकर केन्द्रीय कृषि अभियंात्रिकी संस्थान भोपाल ने एक ट्रैक्टर चलित मशीन का विकास किया है जो मेड़ बनाकर बुवाई करने में सक्षम है तथा बने हुए मेड़ को पुन: ढंाचा देकर लगातार दस वर्षो तक उपयोग में लाया जा सकता है। जिससे प्राकृतिक संसाधनों की काफी बचत होती है तथा प्राकृतिक आपदा जैसे भारी वर्षा, ओलावृष्टि, आंधी आदि की स्थिति में नुकसान भी कम होता है। क्योंकि अधिक बारिश होने पर पानी मेड़ पर नहीं रूकता तथा नाली से निकल जाता है। आंधी आने की स्थिति में हवा आसानी से निकल जाती है क्योंकि पांच कतारों के बाद नाली के लिए खुला स्थान होता है। संस्थान द्वारा विकसित मशीन का उपयोग करने से नमी की बचत के साथ – साथ दूसरे परम्परागत जुताई की तुलना में मिट्टी में कार्बन की मात्रा भी बढ़ती है।
इस मशीन में ट्रैक्टर की पी.टी.ओ. से चलने वाले एक रोटावेटर के पीछे एक पांच कतारीय बीज व खाद बुवाई यंत्र और मेड़ को सही आकार देने के लिये एक घूमने वाले रोलर जैसा यंत्र लगे रहते है।
इस यंत्र में से रोटावेटर को हटाने तथा उसके स्थान पर कल्टीवेटर लगाने का भी प्रावधान होता है। इस मशीन को अच्छी तरह से जुते खेत में 4.5 किमी प्रति घंटा की गति से चलाये जाने पर इसकी कार्य क्षमता 0.54 हेक्टेयर प्रति घंटा पायी गयी है। मध्य प्रदेश की काली मिट्टी में यह मशीन 150 से 200 मि मी ऊचंाई का सम लम्बाकार मेड़ बनाने में सक्षम है जिसकी ऊपर व नीचे चौड़ाई क्रमश: 1200 व 1500 मि.मी. होती है। इस मशीन से 50 मिमी गहराई पर बुवाई की जाती है तथा इसको चलाने में 6.75 लीटर प्रति घंटा डीजल की खपत होती है तथा प्रचालन लागत रूपये 2100 प्रति हेक्टेयर आती है। इस मशीन को चलाने में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है परन्तु इसका उपयोग होने से पैदावार में वृद्धि भी होती है तथा फसल विषम परिस्थितियों जैसे अधिक वर्षा, कम वर्षा, आंधी व ओलावृष्टि आदि में भी कम प्रभावित होती है। इस यंत्र की उपयोगिता से प्रभावित होकर देश की प्रसिद्ध ट्रैक्टर एवं कृषि यंत्र बनाने वाली अग्रणी संस्था ट्रैक्टर व फार्म इक्विपमेंट लिमिटेड (टैफे) ने इसके निर्माण व बाजार में उपलब्ध करानेे के लिए केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल से करार किया है।

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