राष्ट्रीय किसान नीति कितनी सार्थक

पिछले दिनों केंद्रीय कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्री    श्री राधा मोहन सिंह ने भारतीय बीज कांग्रेस 2017 का कोलकाता में उद्घाटन करते हुए राष्ट्रीय किसान नीति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कृषि नीति का उद्देश्य बताते हुए कहा कि यह कीर्ति उत्पादन में तेजी लाने, गांवों में बुनियादी सुविधाओं के विकास, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार पैदा करने, किसानों व कृषि श्रमिकों व उनके परिवारों का जीवन स्तर बढ़ाने, शहरों की ओर पलायन को हतोत्साहित करने तथा आर्धिक उदारीकरण व वैश्वीकरण का सामना करने में कारगर सिद्ध होगी। यदि इस नई कृषि नीति के उद्देश्यों को देखें तो इसमें कोई नई बात नजर नहीं आती। केंद्र सरकार ने वर्ष 2007 में भी राष्ट्रीय कृषि नीति बनाई थी जिसके पंद्रह लक्ष्य रखे गये थे। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयास तो किये गये थे। परंतु इनसे किसान की आर्थिक तथा सामाजिक दशा में बहुत कम प्रभाव पड़ा है। किसान आज भी किसानी पर प्राकृतिक विपदा के प्रभाव से जूझ रहा है। किसानों के लिये फसल बीमा का आरंभ तो हो गया परंतु इस योजना में 30-35 प्रतिशत समृद्ध किसान ही जुड़ पाये हैं। प्राकृतिक विपदा से फसल खराब होने की स्थिति में किसान को बीमा की राशि समय से नहीं मिल पाती। किसानों को उनका दावा समय से मिले इसके लिये दावा प्रणाली को सरल व अधिक क्रियाशील बनाने की आवश्यकता है। किसान की आर्थिक दशा तथा जीवन स्तर तभी सुधर सकता है, जब उसे उसके उत्पादों का उचित व समय से मूल्य मिले। कृषि पदार्थों की कीमतों में जो भी उतार-चढ़ाव आते हैं उसका असर किसान को ही सहना पड़ता है। नई कृषि नीति में किसान को उसका उचित मूल्य दिलाने के लिये कोई ठोस नीति बनाना आवश्यक है। यदि किसान को उसके उत्पादों का उचित मूल्य मिले तो उसकी आर्थिक दशा तथा जीवन स्तर स्वयं सुधर जायेगा। गन्ना किसानों को चीनी मिलें द्वारा उनके उत्पाद का मूल्य देने में वर्षों लगा देती है, ऐसे स्थिति में किसानों की आर्थिक दशा सुधारने तथा उसकी आमदनी दुगना करने का लक्ष्य एक सपना बनकर ही रह जायेंगे। किसान को उसके उत्पात का मूल्य फसल लगाने के पहले ही निश्चित रूप से पता हो तथा फसल आने पर उसे उसका मूल्य समय से मिल जाये तो यह कृषि नीति की बड़ी उपलब्धि होगी। यह कृषि उत्पादन बढ़ाने तथा किसान की आर्थिक तथा सामाजिक दशा सुधारने में भी सहायक होगी।

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