राष्ट्रीयकृत बैंकों ने बैंक मित्रों को बनाया बंधुआ

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दो वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना जन-धन को विशेष रूप से ग्रामीणों एवं अशिक्षितों को बचत के प्रति प्रोत्साहित करने के लियेेे प्रारंभ की थी। वह तबका जो बैंक की सीढियां चढऩे में स्वयं को डरा महसूस करता था। बैंक मित्रों के माध्यम से न केवल प्रशिक्षित किया गया है। बल्कि शहरी कामगारों एवं छोटे व्यवसायियों को बैंक समय से अतिरिक्त समय में इन बैंक सेवा केन्द्रों के माध्यम से जमा-निकासी की सुलभ सुविधा प्राप्त हो रही थी। लेकिन लोकप्रिय हो चुकी इस योजना में अब कुछ राष्ट्रीयकृत बैंकें अपना कमाई का जरिया ढूंढऩे लगी हैं। इन बैंकों ने बैंक मित्रों के माध्यम से होने वाले इस लेनदेन को सशुल्क बना दिया है।अब न केवल बाहरी शाखाओं बल्कि स्वयं आधार शाखा में बैंक मित्रों के माध्यम से लेन-देन करने पर 0.6 फीसदी की दर से सरचार्ज ग्राहक के खाते से बैंक शाखाएं काट रही हंै। सुबह आठ बजे से देर रात दस बजे तक काम करने वाले इन बैंक मित्रों से अब ग्राहक दूर हटने लगे हैं। लेकिन अब जबकि बैंकों के लक्ष्य पूरे हो चुके हैं। केन्द्र सरकार ने योजना की सारी जिम्मेदारी बैंकों के सुपुर्द कर स्वयं का ध्यान दूसरी योजनाओं पर लगाया है। ऐसे में अधिकांश बैंक अपनी मनमानी पर उतर आये हैं एवं देश सेवा से जुड़े इस वृहद कार्यक्रम में ही बैंकिंग घाटे की पूर्ति तलाशने लगेे हैं। शून्य बैलेंस पर हितग्राहियों के खाता खोलने के बजाय उन से न्यूनतम बैलेंस की मांग की जाने लगी है, जो कि एक से डेढ़ हजार रूपये है। दूसरी तरफ  इन बैंकों द्वारा बैंक मित्रों को हटाने के कार्य को भी अंजाम दिया जा रहा है। बैंक मित्रों को दिये जाने वाले 5 हजार रुपये मासिक के मानदेय को शहरी क्षेत्र के बैंक मित्रों को देना अब बंद कर दिया गया है। वहीं बैंक मित्रों को मिलने वाले लेन-देन कमीशन को 0.4 फीसदी को घटाकर 12000 से 25000 रुपये के लेन-देन पर मात्र 50 रुपये का नियत कमीशन कर दिया है।
बैंकों ने काटी चांदीगत बर्ष के आंकड़े बताते है कि बैंक मित्रों के माध्यम से प्रतिमाह 50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बैंकिंग व्यवसाय देश में हुआ है। अवकाश एवं बैंक हड़तालों के दौरान भी बैंक मित्र निरन्तर अपनी सेवाएं देते रहे हैं। जबकि इसके बदले में बैंक मित्रों को नाममात्र की राशि दी जा रही है। इस तरह जनधन योजना के तहत ग्राहकों को सुलभ सुविधायें उपलब्ध कराने के बजाय बैंकों द्वारा बैंक मित्रों से अतिरिक्त आय का जरिया तलाशा जा रहा है।आर्थिक शोषण केन्द्र सरकार के वित्तीय समावेशन विभाग द्वारा जनधन योजना से जुड़ी तमाम मशीनरी के निगरानी के अभाव में बैंके ग्राहकों एवं बैंक मित्रों के आर्थिक शोषण पर उतारू हो चुकी है। इन हालात में बैंकों का व्यवहार बैंक मित्रों के प्रति बंधुआ मजदूरों जैसा ही है।  जनधन योजना की शुरूआती गति को पूरे विश्व में भारत के प्रयास को गरीबी उन्मूलन के रुप में देखा जा रहा था। कई एशियाई देशों के अध्ययन दलों ने भारत के बैंक मित्र केन्द्रों का निरीक्षण कर इनकी कार्य प्रणाली का अध्ययन कर इसे छोटे देशों के लिये अत्यधिक लाभप्रद माना था। लेकिन अब यह प्रणाली जन्मदाता देश में ही दम तोड़ती नजर आ रही है।

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