मैं अनुपम मिश्र को मिस कर रहा हूं…

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सभी पानी पीते हैं. सभी पानी के बारे में नहीं जानते हैं. दोनों में अंतर का पता तब चला जब अनुपम मिश्र से मुलाकात हुई. रसायन शास्त्र की कक्षा में मास्टर ने हाईड्रोजन और आक्सीजन के मिश्रण से पानी की उत्पत्ति के बारे में बताया था. अनुपम मिश्र मेरे लिए पानी के मास्टर थे. नदियों के प्रोफेसर और जल-जमीन-जंगल के विश्वविद्यालय. एक ऐसा विश्वविद्यालय जिसकी लाइब्रेरी में कोई विदेशी किताब नहीं थी. तमाम देसी जानकारियों से भरे अनुपम मिश्र हल्के से सवाल पर बिना जिल्द की किताब की तरह खुल जाते थे. बंद तभी होते थे जब टीवी के पत्रकार का लालची मन जिद करने लगता कि कैमरे पर बोल दीजिए न. यही जवाब मिलता कि तुम्हें बता दिया, तुम बोल दो. यह सारी मेरी जानकारी नहीं है. यह तो पहले से थी. मैंने भी तो कहीं से, किसी से सुनी है, पढ़ी है. मैं अपनी जानकारी का मौलिक लेखक नहीं हूं. मुझे वे हैरान करते थे लेकिन तमाम निराशा के क्षणों में हौसले की मशाल.
ऐसे ही एक कमजोर क्षण में उनसे कहने लगा कि दादा मैं नहीं कर पा रहा हूं. पत्रकारिता मेरे लिए नहीं है. उनका एक सरल सा सवाल आया. क्या तीस दिन में एक दिन भी अच्छा काम नहीं कर पाते हो. नहीं एक-दो दिन तो कर ही लेता हूं. हां तो बस एक दिन तो अच्छा काम करने को मिल जाता है, और क्या चाहिए. जितना मौका मिले, उतने में ही अच्छा करने का प्रयास करो. इतना काफी है. बाकी के 29 दिन उस एक दिन के इंतजार में काट दो. मैं हंसता रह गया. जब भी लगता है कि अब पत्रकारिता मुश्किल है. सरकारों का शिकंजा गहरा रहा है. अनुपम जी याद आ जाते हैं. सोचता हूं कि जब तक एक दिन एक पल अच्छा करने की गुंजाइश है, टिके रहना चाहिए. निराशा आती है, उनकी बातों से चली जाती है.
मैं जिनता उनके पास नहीं गया, उससे ज्यादा वे मेरे पास आते रहे. अचानक फोन आ जाता, सब ठीक है न. मैंने सोचा कि हाल चाल ले लेते हैं. आप लोग तो ज्यादा बड़ा काम करते हैं. व्यस्तता भी रहती है. अपन लोग तो खाली हैं. फोन पर हाल-चाल पूछ लेना चाहिए ताकि आपका काम में मन लगा रहे. उनकी चि_ियां आती रहती थीं. तमाम तारीफों के बीच एक चि_ी ऐसी आई जिसमें उन्होंने बड़े प्यार से मेरी कुछ अशुद्धियों को ठीक कर दिया था. मेरी भाषा व्याकरण के मानक पर खरी नहीं उतरती है. संपादन के पैमाने पर भी नहीं. एक इच्छा अधूरी रह गई. मैं उनके संपादन का कायल था. ख्वाहिश थी कि अपना लिखा हुआ कुछ भेजूं और देखूं कि वे अपने संपादन से कैसे बदल देते हैं. जब भी गांधी मार्ग पढ़ता, लगता कि उसमें मेरा एक लेख छपे. अनुपम जी अपनी तरफ से गांधी मार्ग की प्रति भिजवा देते थे और पूछ लेते थे कि पढ़ी या नहीं.
मैंने उनसे काफी कुछ सीखा है. अपनी पत्रकारिता को समृद्ध किया है. अनुपम मिश्र मेरे लिए हिन्दी में मौलिक और देसी खयाल के ज्ञान भंडार थे. कैसे लिखूं कि मैंने उनसे कितना काम कराया है. रिपोर्टिंग से लेकर प्राइम टाइम और हम लोग के लिए उनसे कितनी जानकारियां मांगीं. उन्होंने बिना देरी के किताबें भिजवाईं. फोटो कॉपी ईमेल करवा दी. समझा दिया और बता दिया. बस सामने नहीं आए. जि़द थी कि अनुपम मिश्र को टीवी पर लाऊंगा. हर साल, हर महीने और हर मुलाकात में पूछता. एक दिन जैसे ही उन्होंने कहा कि टेड टॉक के लिए भाषण दिया है तो बस पीछे पड़ गया. वे मान गए. हम लोग का पूरा घंटा उन्हीं को दे दिया. दर्शक भूल जाते हैं मगर जिन्होंने भी देखा था वे यही पूछते रहे कि हमारे देश में ऐसे लोग कहां रहते हैं. आपको कैसे मिल गए.
इस दिल्ली में वे एक शख्स थे जो मेरी चिंता करते थे. टीवी पर कभी उदास दिखा तो अगले दिन फोन आता ही था. अविनाश दास ने ही किसी बातचीत में कहा था, अरे आप अनुपम मिश्र को नहीं जानते. आपको उनसे मिलना चाहिए. नदियों के बारे में कितना कुछ बताया. पानी के बारे में कितना कुछ सिखा दिया. वे मेरे लिए तालाब थे. उनसे पानी भर कर लाता और अपने चैनल पर दर्शकों के सामने उड़ेल देता. उनकी दी हुई समझ और जानकारी के आधार पर न जाने कितने कार्यक्रम किए. जिस दिन अनुपम दा कैंसर की पीड़ा से तड़प रहे थे, मैं चेन्नई से लौटकर कस्बा के लिए पानी पर ही ब्लॉग लिख रहा था. पानी पर जब भी लिखता हूं, अनुपम मिश्र याद आ जाते हैं. पानी पर लिखना उन्हीं ने तो सिखाया है.
आज के मीडिया में पर्यावरण की बात खूब होती है. उन सबमें पर्यावरण की समस्या का समाधान महंगी टेक्नालॉजी ही होती है. अनुपम जी के पास पर्यावरण की समस्या का अनुपम समाधान था, जिसे आप समस्या का सामाजिक समाधान कह सकते हैं. बिना लागत और टेक्नॉलाजी के ही उनके पास सूखे से लेकर कावेरी जल विवाद के समाधान मौजूद थे. पर्यावरण को लेकर उनकी समझ भारत के समाज से बनी थी. यहां की संस्कृति से बनी थी. वह समझ ऐसी थी जिसे जानकर लगता था कि अब भी बहुत आसान है पर्यावरण को बचा लेना. बहुत आसानी से तालाब बचाए जा सकते हैं और बहुत कम कोशिश में नदियां. उनकी बातों में थ्योरी नहीं थी. बड़ी-बड़ी पंक्तियां नहीं थीं. उनको पढ़ते हुए जाना कि अपने समाज को जानने से आत्मविश्वास बढ़ता है. आपकी असुरक्षा कम होती है.
उनको खूब पढ़ा है. तीन-चार किताबों को कई बार पढ़ा है. जब भी किताबों से धूलों की विदाई करता हूं, एक बार याद कर लेता हूं कि अनुपम जी की किताब यहीं रखी है. कभी किसी को दिया नहीं. जब भी लगता है कि भाषा बिगड़ रही है तो गांधी मार्ग और आज भी खरे हैं तालाब पढ़ लेता था. उनकी भाषा हिंसा रहित भाषा थी, चिन्ता रहित भाषा थी, आक्रोश रहित भाषा थी. हम सबकी भाषा में यह गुण नहीं हैं. इसीलिए वे अनुपम थे, हम अनुपम नहीं हैं. वे चले गए हैं. मुझे नहीं मालूम कि मैं उनके जाने को लेकर क्या महसूस कर रहा हूं. शायद खुद से भाग रहा हूं. इसलिए अनुपम मिश्र के बारे में कम बात कर रहा हूं. उनकी किताबें, उनकी भाषा, उनकी सादगी के बारे में बात कर रहा हूं. मैं अनुपम दा को मिस कर रहा हूं.

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