मिर्च की उन्नत खेती

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पोषक मूल्य
पोष्टिकता की दृष्टि से यह विटामिन एवं खनिज लवणों का स्त्रोत है। इसके फल विटामिन ‘एÓ व ‘सीÓ से भरपूर होते हैं। मिर्च का तीखापन उसमें उपस्थित एल्कालॉयड कैपसाइसिन के कारण होता है।
जलवायु
निमाड़ की जलवायु मिर्च उत्पादन के लिए उपयुक्त है। 15 से 35डिग्री सेल्शियस तापमान मिर्च की खेती के लिए उपयुक्त माना गया है। 40 डिग्री सेल्शियस से अधिक तापमान होने पर इसके फूल एवं फल गिरने लगते हैं। खरगोन जिले में औसतन 835 मिली मीटर वार्षिक वर्षा होती है जो कि मिर्च उत्पादन के लिए उपयुक्त है।
मिट्टी या मृदा
निमाड़ में काली मृदा, मिश्रित काली एवं लाल मिट्टी पाई जाती है जो कि मिर्च उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं। भारी मिट्टी में हल्की मिट्टी की अपेक्षा पौधों की बढ़वार एवं उत्पादन अधिक होता है, किंतु हल्की भूमि में भारी भूमि की अपेक्षा उच्च गुणवत्ता वाले फल प्राप्त होते हैं।
किस्में
अर्का लोहित – यह किस्म भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा 1990 में विकसित की गई है। फल मध्यम मोटाई के अत्यधिक तीखे होते हैं। हरी एवं लाल मिर्च दोनों के लिए उपयोगी है। चूर्णिल आसिता रोग के प्रति सहनशील है। औसत उपज 30 क्विंटल (लाल सूखी मिर्च ) प्रति हेक्टेयर एवं 250 क्विंटल (हरी मिर्च ) प्रति हेक्टेयर है यह किस्म छत्तीसगढ़, उडीसा, अरूणाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडू एवं केरल के लिए अनुशंसित है।
पन्त सी-1- गोविंद बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रोद्यौगिकी विश्वविद्यालय, पन्त नगर द्वारा 1977 में विकसित। फल 6.9 से.मी. लम्बे, 2.9 से.मी. व्यास के चिकने एवं सीधे खड़े होते हैं। फल कच्ची अवस्था में हरे एवं पकने पर गहरे लाल रंग के होते हैं। विषाणु के प्रति सहनशील है। औसत उपज 15 क्विंटल (लाल सूखी मिर्च) प्रति हेक्टेयर है। सम्पूर्ण भारत के लिए अनुशंसित।
जवाहर मिर्च 218 – जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर द्वारा वर्ष 1987 में विकसित। इस किस्म के फल 10-12 से.मी. लम्बे एवं 2.5 से 3 से.मी.मोटे चमकदार, आकर्षक, तेज लाल रंग के। चुडऱ्ा-मुडऱ्ा के प्रति सहनशील हैं। औसत उपज 18-22 क्विंटल सूखी लाल मिर्च। मध्यप्रदेश के लिए अनुशंसित।
पूसा सदाबहार –भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा 1989 में विकसित। फल सीधे 6-8 सेमी. लम्बे होते हैं। विषाणु के प्रति सहनशील है। औसत उपज 15-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर। यह किस्म सम्पूर्ण भारत के लिए अनुशंसित।
के.ए.-2 (काशी अनमोल) – भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी द्वारा विकसित की गई है। पौधे छोटे बढ़वार वाले तथा छातानुमा। फल ठोस, सीधे, 6-7 से.मी. लम्बे एवं 1 से.मी. मोटे। अधिक भण्डारण क्षमता एवं आकर्षक फल होने के कारण इस प्रजाति के हरे फल की कीमत अन्य किस्मों से ज्यादा मिलती है। रोपाई के मात्र 45-50 दिनों बाद प्रथम तुड़़ाई प्राप्त हो जाती है जो अन्य किस्मों से 10-15 दिनों पहले होती है। इस प्रजाति से 6-8 तुड़ाई, 10-12 दिनों के अंतराल पर ली जा सकती है। हरे फल उत्पादन के लिए यह एक उत्तम किस्म है। हरे फल का उत्पादन लगभग 250 तथा सूखे फलों की पैदावार 70 क्विंटल/हेक्टेयर मिल जाता है। यह किस्म पंजाब, उत्तरप्रदेश, बिहार एवं झारखंड के लिए अनुशंसित की गई है।
अर्का सुफल- यह किस्म 2002 में विमोचित की गई है। फल हरे रंग के, चिकने, मध्यम लम्बे (6-7 सेमी.) पकने पर गहरे लाल रंग के होते हैं। भभूतिया रोग के प्रति सहनशील। औसत उपज 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (हरी मिर्च) एवं 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (सूखी मिर्च) है। यह किस्म मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र के लिए अनुशंंसित।
पूसा ज्वाला – कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा 1983 में विकसित फल लम्बे, पतले, मुड़े हुए कच्ची अवस्था में फल हरे और पकने पर खूब लाल थ्रिप्स, माईट, एफिड के प्रति सहनशील औसत उपज 18 क्विंटल (लाल सूखी मिर्च) प्रति हेक्टयर सम्पूर्ण भारत के लिए अनुशंसित।

मिर्च की संकर किस्में
काशी अर्ली (सी.सी.एच.-3) – पौधे 60-75 से.मी. लम्बे तथा छोटी गांठों वाले होते हैं। फल 7-8 से.मी. लम्बे, सीधे, 1 से.मी. मोटे तथा गहरे होते हैं। पौध रोपण के मात्र 45 दिनों में प्रथम तुड़ाई प्राप्त हो जाती है जो सामान्य संकर किस्मों से लगभग 10 दिनों पहले होती है। फलोंं की तुड़ाई 6-8 दिनों के अंतराल पर मिलती रहती है जिससे लगभग 10-12 तुड़ाई आसानी से ली जा सकती है। हरे फल का उत्पादन 300-350 क्विंटल/ हेक्टेयर प्राप्त हो जाता है। इनकी फसल लम्बी अवधि तक चलती रहती है। हरे फल उत्पान के लिए एक उत्तम किस्म है। उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, उत्तरांचल, कर्नाटक, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, आ.प्र. एवं छत्तीसगढ़ के लिए अनुशंसित है।
काशी सुर्ख (सी.सी.एच.-2) – के पौधे लम्बी बढ़वार वाले लगभग 70-100 से.मी. लम्बे एवं सीधे होते हैं। फल 10-12 से.मी. लम्बे, हल्के हरे, सीधे तथा 1.5-1.8 से.मी. मोटे होते हैं। प्रथम तुड़ाई पौध रोपण के 50-55 दिनों बाद मिल जाती है। यह फल सूखे एवं लाल दोनों प्रकार के लिए उत्तम किस्म है। हरे फल का उत्पादन 240 क्विंटल/हेक्टेयर तथा लाल फल का 40 क्विंटल/ हेक्टेयर की दर से प्राप्त होता है। चूसक कीटों एवं विषाणु से लगभग सहनशील प्रजाति है। यह किस्म पश्चिम बंगाल, असम, पंजाब, उत्तरप्रदेश के तराई क्षेत्र, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, अरूणांचल प्रदेश, राजस्थान, गुजरात एवं हरियाणा के लिए अनुशंसित की गई है।
अर्का मेघना (2005)- फल 10.6 सेमी लम्बे एवं 1.2 सेमी चौड़े, गहरे रंग के औसत उपज 557 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (हरी मिर्च) एवं 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (सूखी मिर्च) है। पंजाब, उत्तरप्रदेश के तराई क्षेत्र, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, अरूणाचल प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडू, एवं केरल के लिए अनुशंसित।
अर्का श्वेता (2005)- फल 11-12 सेमी लम्बे एवं 1.2-1.5 सेमी चौड़े, चिकने, हल्के हरे रंग के पकने पर लाल रंग के होते हैं। सिंचित अवस्था में खरीफ एवं रबी मौसम में लगाने के लिए उपयुक्त है। विषाणु रोग के प्रति सहनशील है। औसत उपज हरी मिर्च 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर एवं सूखी मिर्च 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म पंजाब, उत्तरप्रदेश के तराई क्षेत्र, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उडीसा, अरूणांचल प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडू, एवं केरल के लिए अनुशंसित की गई है।
अर्का हरिता (एम.एस.एच.-172) – (2006) में पौधे लम्बे एवं सीधी बढ़वार वाले पत्तियां मध्यम आकार की, फल 6-8 से.मी. लम्बे, पतले, हरे रंग के तथा चरपरे पौध रोपड़ के 50-55 दिनों बाद प्रथम तुड़ाई प्राप्त हो जाती है। हरे फलों का औसत उत्पादन 300 क्विंटल/हेक्टेयर प्राप्त हो जाता है। हरे फल उत्पादन के लिए एक उत्तम किस्म है। यह किस्म कर्नाटक, तमिलनाडू एवं केरल के लिए अनुशंसित की गई है।

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2 thoughts on “मिर्च की उन्नत खेती

  • November 4, 2016 at 9:44 AM
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    मि र्चि जो सबसे ज्यादा फल दे

  • May 16, 2016 at 5:05 PM
    Permalink

    काशि अरली (सी. सी.एच )

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