मिट्टी का संरक्षण

www.krishakjagat.org
Share

जब तेजी से वर्षा होती है तो वर्षा के पानी की सम्पूर्ण मात्रा को भूमि सोख नहीं सकती। थोड़ी ही देर में सतह की मिट्टी के संतृप्त हो जाने पर पानी एकत्र होने लगता है और नीचे सतह की ओर बहने लगता है। वर्षा के जल के साथ-साथ मिट्टी के बहुमूल्य कण भी बहने लगते हैं और कहीं-कहीं अधिक कटाव के कारण खाइयां बन जाने से भूमि कृषि योग्य नहीं रह जाती है।अपवाहित जल का संयोजन और सदुपयोग
बारानी कृषि अनुसंधान परियोजना, इंदौर (म.प्र.) में प्रयोगों में पाया गया जो कुल वर्षा का 54 प्रतिशत भाग अपवाहित जल के रूप में संरक्षित हो सकता है। इस जल को सिंचाई के काम में लेकर सोयाबीन और मूंगफली के बाद गेहूं की फसल ली जा सकती है। सूखे के वर्षों में भी ज्वार की फसल चारे के लिये उगाने के बाद सूरजमुखी की फसल उगायी जा सकती है।
यदि भूमि लगभग समतल हो तो धरातल पर निकास नालियां बनाना आवश्यक होगा। नालियों के बीच की दूरी मिट्टी के प्रकार पर निर्भर होगी। मिट्टी का पोत-जितना भारी होगा, नालियों के बीच दूरी उतनी ही कम रखनी होगी। यदि किसी क्षेत्र में मिट्टी बहुत ही भारी हो और वर्षा भी बहुत अधिक हो तो समतल क्यारियों के बजाय मेड़ पर बुआई करनी चाहिये। यदि जरूरी हो तो किसी अवस्था में भूमि-तल का सुधार भी करना चाहिये, ताकि वर्षा का जल भूमि पर खड़ा न रहकर बह जाया करे।
यदि आवश्यकता से अधिक वर्षा का जल प्राप्त हो तो अपवाहित जल को कृषि, प्रक्षेत्रों के गड्ढों, बहुत नीचे वाले खेतों या तालाबों में इकट्ठा करना चाहिये और आवश्यकता पडऩे पर सिंचाई के लिये उपयोग में ले लेना चाहिये। इससे न केवल खरीफ की फसल सूखा पडऩे पर बचायी जा सकेगी वरन रबी की फसल बोने के लिये अथवा बाद में एक सिंचाई के लिये पानी उपलब्ध हो सकेगा।

10 से.मी. बारिश 2 हजार क्विंटल मिट्टी बहा देती है
एक प्रयोग से ज्ञात हुआ है कि लगातार 10 से 12 से.मी. वर्षा हो जाने से एक हैक्टेयर भूमि से लगभग 2000 क्विंटल मिट्टी बह जाती है। उर्वरता को इस प्रकार होने वाली हानि का 20 गुना आंका गया है। यदि ऊपर की मिट्टी से इतनी भारी मात्रा में मिट्टी के कण बह जाएं तो इस मिट्टी की उर्वराशक्ति को बनाये रखना अत्यंत महंगा पड़ेगा। अत: भू-सम्पत्ति का संरक्षण अत्यावश्यक है, अत: भू- संरक्षण के उपाय अपनाना जरूरी हो जाता है।

अपवाहित जल का संचय उन क्षेत्रों के लिये अधिक महत्वपूर्ण है, जहां भूमिगत जल अत्यंत सीमित है, और गर्मियों में कुए भी सूख जाते हैं। अपवाहित जल को सिंचाई के उपयोग में लाने के लिये किसानों के खेतों की स्थिति के अनुसार विभिन्न उपाय अपनाने चाहिए जो निम्न प्रकार हैं-
(क) अधिक ढलान और ऊंचाई वाले खेतों में मक्का, ज्वार, मूंग, उड़द जैसी फसलें उगानी चाहिए और नीची सतह वाले खेतों में धान और बहुत नीची सतह वाले खेतों में अपवाहित जल इकट्ठा करना चाहिए।
(ख) जहां पुराने तालाब हों, वहां इनका पुनरुद्धार कर समस्त जल विभाजन क्षेत्र के लिये उचित फसल क्रम तैयार करके तालाबों के किनारे वाले खेतों में धान लगाएं, ताकि समय पडऩे पर तालाबों के अतिरिक्त धान के खेतों में पानी संचित रहे।
(ग) जोत में होकर बहने वाले नालों पर बांध बनाकर जल संचित करें।
समुचित जुताई
फसलों की बुआई से पहले खेत तैयार करने के पहले समुचित कर्षण क्रियाओं की आवश्यकता होती हैं। कर्षण-क्रियायें भूमि के प्रकार, खरपतवार समस्या की गंभीरता और बोयी जाने वाली फसल (खरीफ या रबी) पर निर्भर करती है। कुछ अवस्थाओं में गहरी जुताई और अवभूमि की जुताई आवश्यकता होगी, जबकि अन्य अवस्थाओं में कम से कम कर्षण क्रियायें लाभप्रद सिद्ध होंगी। भारी काली मिट्टी में गहरी जुताई और अवभूमि की जुताई उसी दशा में लाभप्रद पायी गई है, जबकि खेतों में काँस, झरबेरी दूब, नागरमोथा आदि जैसे बहुवर्षीय खरपतवार हों। यदि खेतों में ऐसे खरपतवार न हों तो खरीफ की फसलों के लिये कम से कम कर्षण क्रिया करना लाभप्रद होता है। (क्रमश:)

www.krishakjagat.org
Share
Share