मरू क्षेत्र में आलू लगायें

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जलवायु एवं भूमि :
आलू के लिये शीतोष्ण जलवायु तथा कन्द बनने के समय उपयुक्त तापक्रम 18 से 20 डिग्री सेन्टीग्रेड होना चाहिये। यह फसल पाले से प्रभावित होती हैं। आलू की फसल सामान्य तौर पर सभी प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती हैं परन्तु हल्की बलुई दोमट मिट्टी वाला उपजाऊ खेत जहाँ जल निकास की सुविधा हो इसके लिये विशेष उपयुक्त रहता हैं। खेत का समतल होना भी आलू की फसल के लिये आवश्यक हैं। आलू को 6 से 8 पी एच वाली भूमि में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता हैं परन्तु लवणीय तथा क्षारीय भूमि इस फसल के लिये पूर्णतया अनुपयुक्त रहती हैं।
उन्नत किस्में:-
कुफरी  पुखराज:- यह अगेती किस्म हैं तथा 70 से 90 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। इसकी औसत उपज 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं। इसके कंद बड़े आकार के अण्डाकार, सफेद पीले रंग का गूदा लिए होते हैं। यह किस्म अगेती झुलसा रोग प्रतिरोधी हैैं तथा पछेती, झुलसा से मध्यम प्रतिरोधी हैं।
कुफरी सूर्या:- यह अगेती किस्म हैं तथा 90 से 110 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। इसकी औसत उपज 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं। हैं। यह किस्म उच्च ताप के प्रति सहनशील हैं।
खेत की तैयारी एवं भूमि उपचार:– इसकी खेती के लिये खेत की जुताई बहुत अच्छी तरह होनी चाहिये। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा फिर दो तीन बार हैरो या देशी हल से जुताई कर मिट्टी को बारीक भुरभुरी कर लेनी चाहिये। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगायें जिससे ढेले न रहें। भूमि उपचार के लिये अन्तिम जुताई के समय क्विनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में भली-भांति मिला दें। इससे भूमिगत कीटों से सफल की रक्षा होती हैं।
खाद एवं उर्वरक:- फसल की बुवाई से एक माह पूर्व 25 से 35 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद दें। उर्वरकों में 120 से 150 किग्रा नत्रजन, 80-100 किग्रा फास्फोरस एवं 80-100 किग्रा पोटाश प्रति हैक्टेयर के हिसाब से देना चाहिए। उर्वरकों के प्रयोग के अतिरिक्त यदि आलू कंद बीज को 1 प्रतिशत यूरिया एवं 1 प्रतिशत सोडियम बाई कार्बेनिट के घोल में 5 मिनिट डुबोने के बाद पी एस बी कल्चर एवं ऐजेटोबेक्टर कल्चर से उपचारित करके बुवाई करने पर उपज में वृद्धि होती हैं। यूरिया के समुचित उपयोग के लिये आलू फसल को नत्रजन की आधी मात्रा को बेसल रूप में  तथा शेष बची हुई आधी नत्रजन की मात्रा को यूरिया द्वारा बुवाई के 30-35 दिन बाद मिट्टी चढ़ाने की अवस्था में दें। पोटाश की 2/3 मात्रा बुवाई के समय एवं शेष मात्रा बुवाई के 30-35 दिन बाद भी दी जा सकती हैं।
बीज की तैयारी:- भण्डारित आलू को 4 से 5 दिन पूर्व शीतगृह से निकालकर सामान्य ठण्डे स्थान पर रखना चाहिये। बुवाई से पूर्व इसे 24 से 48 घण्टे तक हवादार, छाया युक्त स्थान फैलाकर रखें। इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि शीतगृह से लाये गये आलुओं को धूप में न रखें और न ही तुरन्त बुवाई के लिये प्रयोग में लावें अन्यथा बाहरी तापक्रम की अधिकता की वजह से आलू के सडऩे का खतरा बना रहता हैं। जिन केन्द्रों पर अंकुरित प्रस्फुटन न दिखाई दें उन्हें हटा देना चाहिये।
बीज की मात्रा व उपचार:- बुवाई के लिये रोग रहित प्रमाणित स्वस्थ कंद ही उपयोग में लाने चाहिये। सिकुड़े हुए या सूखे कन्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिये। बीज कम से कम 2.5 सेन्टीमीटर व्यास के आकार का या 25 से 35 ग्राम वजन के साबुत कंद होने चाहिये। विभिन्न परिस्थितियों में एक हेक्टेयर भूमि में बुवाई के लिये 25 से 30 क्विंटल आलू के कंदों की आवश्यकता होती हैं। बुवाई से पूर्व बीज को स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 0.1 प्रतिशत अथवा थायोफनेट मिथाइल 70 डब्ल्यू. पी. 0.2 प्रतिशत या कार्बेण्डाजिम 50 डब्ल्यू.पी.  0.1 प्रतिशत के घोल मे 20 से 30 मिनट तक भिगोंये तथा छाया में सुखाकर इसके बाद बीजों को एजेटोबेक्टर कल्चर से उपचारित कर छाया में सुखाकर बुवाई काम में लेना चाहिये।
बुवाई:- आलू की मुख्य फसल को अन्तिम अक्टूबर सप्ताह तक बो देना चाहिये। कोटा क्षेत्र में बुवाई का उपयुक्त समय अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक हैं। बुवाई के समय मौसम हल्का ठण्डा होना चाहिये। बीज की मात्रा व बुवाई की दूरी सामान्यत: बीज की किस्म, आकार व भूमि की उर्वरकता पर निर्भर करती हैं।
आलू बोने के लिये निम्न विधियाँ अपनायी जाती हैं-
द्य खेत में 60 सेन्टीमीटर की दूरी पर कतारे बनाकर 20 सेन्टीमीटर की दूरी पर 5-7 सेन्टीमीटर की गहराई पर आलू के कंद बोये। दो कतारों के बीच में हल चलाकर आलू को दवा दें। इस प्रकार बोने से डोलियाँ बनाने का श्रम व खर्चा बचेगा।
द्य पहले खेत में 15 सेन्टीमीटर ऊँची डोलियाँ बना लें और उसके एक तरफ  या बीच में आलू के बीज को 5 से 7 सेन्टीमीटर गहरा बोते हैं।
फसल की सिंचाई:- आमतौर पर आलू की फसल के लिये 10-15 सिंचाईयों की आवश्यकता होती हैं। लेकिन कोटा संभाग में पलेवा के अतिरिक्त 4 से 5 सिंचाईयाँ पर्याप्त रहती हैं। फसल के अंकुरित होते ही सिंचाई प्रारम्भ कर देना चाहिये। मैदानी भागों में जहाँ सर्दियों में बुवाई की गयी हो और तापमान अधिक हो या बलुई या बहुत अधिक हल्की मिट्टी हो तो अंकुरण के पूर्व भी सिंचाई करनी पड़ती हैं। सर्वप्रथम हल्की सिंचाई करनी चाहिये। इसके बाद सामान्य सिंचाई करते हैं परन्तु किसी भी दशा में नालियों को तीन चौथाई से अधिक नहीं भरना चाहिये। डोलियों पर पानी चढ़ जाने से उसका ऊपरी भाग कड़ा हो जाता हैं। इस कारण आलू की जड़े भली-भांति नही फैलने से आलू समान रूप से नहीं बढ़ पाते। हल्की मध्यम दर्जे की मिट्टी में 7 से 10 दिन में तथा भारी मिट्टी में 12 से 15 दिन के बाद सिंचाई करनी चाहिये। जैसे-जैसे फसल पकती जाये सिंचाई का अन्तर बढ़ाते जाये। फसल पकने से 15 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर देवें।
निराई-गुड़ाई:- कंद की बुवाई के 30 से 35 दिन बाद जब पौधे 8 से 10 सेमी. के हो जावें तो खरपतवार निकालकर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिये। इसके एक माह बाद दुबारा मिट्टी चढ़ावें।
रसायनिक खरपतवारनाशी द्वारा नियंत्रण:-
द्य फ्लूक्लोरोलिन (1 किलो प्रति हेक्टेयर- प्री प्लाटिंग इनकारपोरेशन इन सोयल) के उपयोग के समय खेत में पर्याप्त नमी आवश्यक हैं अन्यथा असर नहीं होगा। या
द्य आइसोप्रोटोयूरॉन (1 किलो प्रति हैक्टेयर) (प्री इमरजेंस) जमाव से पूर्व छिड़काव करें।
नोट- खरपतवारनाशी का प्रयोग खरपतवार की अधिक समस्या हो तो ही करें।
पाले से सुरक्षा:- आलू की फसल में पाले से काफी नुकसान होता हैं। सर्दियों में जिस दिन शाम के समय आसमान साफ  हो धीमी ठण्डी हवा चल हर ही हो व तापक्रम कम चल रहा होता पाला पडऩे की सम्भावना हो जाती हैं। इससे बचाव के लिये निम्न उपाय करे-

  • फसल की सिंचाई करें।
  • खेत की मेड़ में उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ घासफूस जलाकर धुआं करें।
  • व्यापारिक गंधक के अम्ल का 0.1 प्रतिशत (1 लीटर गंधक का अम्ल 1000 लीटर पानी में मिला कर) फसल का छिड़काव करें। इससे फसल 10-15 दिन के लिए पाले से सुरक्षित हो जाती हैं। गंधक का अम्ल छिड़काव करने के लिये टंकी में पानी भरकर अम्ल को लकड़ी की डंडी के सहारे पानी में मिलावें।

खुदाई:- आलू की फसल में जब पत्तियाँ एवं तने सूखने आरम्भ हो उस समय ख्ुादाई प्रारम्भ करें। वैसे आलू की खुदाई का समय बाजार की मांग व भाव पर भी निर्भर करता हैं। यदि मांग अच्छी हो, मूल्य ठीक मिलता हो तो, और आलू के पौधे हरे हो परन्तु आकार सामान्यत: ठीक हो गया हो तो खोदकर बाजार में बेच देना चाहिये। सामान्य तौर पर जब पौधे पीले होकर सूखने लगते हैं उस समय पौधे के तने को पत्तियों सहित काट लेते हैं तथा इसके 10-15 दिन बाद खुदाई करते हैं। इससे कन्दों में मजबूती आ जाती हैं और अधिक समय तक रखे जा सकते हैं। अधिक समय तक भूमि में छोड़ा गया आलू गर्मी के कारण सड़ जाता हैं अत: समय रहते खुदाई करके आलू निकाल लेना चाहिये। आलू औसतन उपज 200 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
विक्रय:-यदि शीतगृह की व्यवस्था न हो तो खुदाई के बाद आलू के विक्रय की व्यवस्था करना आवश्यक होता हैं क्योंकि गर्मी के कारण खराब होने की सम्भावना रहती हैं अत: इसे ज्यादा समय तक नहीं रखा जा सकता हैं।

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