मधुमक्खियों की घटती संख्या कृषि के लिए समस्या

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– अनिल कुर्मी

– डॉ. राजेश पचौरी 

– डॉ. अमित कुमार शर्मा
– ब्रजेश कुमार नामदेव
कीट शास्त्र विभाग, कृषि महाविद्यालय, जबलपुर
Email : kvkmandla@rediffmail.com
कृषि की सफलता के लिए मधुमक्खियों का होना अति आवश्यक है, क्योंकि फसलों की परागण की क्रिया में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। वैसे तो फसलों में परागण की क्रिया में दूसरे कीटों जैसे तितली, भौरा, भृंग अन्य मक्खियां और चीटियों का भी योगदान होता है लेकिन मधुमक्खी इनमें सबसे महत्वपूर्ण है। ऐसा माना जाता है कि पचास हजार मधुमक्खियां एक दिन में पँाच लाख पौधों को परागित कर सकती हैं। भारत वर्ष में मधुमक्खियों की चार जातियां मिलती हैं।

  • 1. सुरांग मधुमक्खी (एपिस डोरसाटा)
    2. भारतीय मौना (एपिस इण्डिका)
    3. भृंग मधुमक्खी (एपिस क्लोरिया)
    4. डम्पर मधुमक्खी (मेलिपोना प्रजाति)
    भारत में मधुमक्खी की भारतीय मौना प्रजाति सबसे अधिक संख्या में पायी जाती है। यह प्रजाति दूसरी प्रजातियों की अपेक्षा में अधिक फसलों को परणित करती हैं तथा अधिक जुझारु होती हंै यहाँ तक कि यह प्रजाति विपरीत मौसम में भी फसलों को परागित करती हंै।
  • मधुमक्खी कैसे काम करती है:
    सबसे पहले परागण क्या है? पौधों में नर एवं मादा भाग पौधे के पुष्प में पाये जाते है। पौधों के नर भाग को पुंकेसर कहते है, जिस पर परागकण का निर्माण होता है तथा मादा भाग को वर्तिका कहते हैं जो पुंकेसर में निर्मित परागकण को ग्रहण करती है जिससे बीज का निर्माण होता है। कुछ फसल जो स्ववरागित है, उनमें परागण के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती जैसे धान, गेहूं आदि लेकिन बहुत सी ऐसी फसलें है, जिनके लिए परागकण को वर्तिका तक पहुंचाने के लिए माध्यम की आवश्कयता होती है, जैसे मक्का, सूर्यमुखी, पतीता आदि जिन्हें परपरागित फसलें कहते हैं। परपरागित फसलों में परागण में मधुमक्खियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
  • मधुमक्खियाँ एवं कृषि:
    भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां 65 प्रतिशत से ज्यादा आबादी कृषि पर आधारित है। मधुमक्खियां कृषि को सफल बनाने में लगातार योगदान देती आ रही हंै। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए मधुमक्खियां बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।
    मधुमक्खियों का कृषि की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान होने के बाद भी इनकी संख्या में लगातार कमी आती जा रही है, जो कृषि के लिए चिंता का विषय है। क्योंकि परपरागित फसलों में मधुमक्खियों के बिना परागण नहीं होगा जिससे फल एवं बीज का निर्माण नहीं होगा अंतत: फसलों की उपज में भारी कमी आयेगी।
  • मधुमक्खियों की संख्या में कमी के कारण:
  • कीटनाशकों का अधिक प्रयोग
    फसलों में लगातार कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से वातावरण तो प्रदूषित हो ही रहा है। इसके साथ मधुमक्खियों की भी संख्या कम हो रही है। कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग मधुमक्खियों की संख्या में कमी का सबसे प्रमुख कारण हैै।
  • प्राकृतिक निवास एवं खाने की कमी
    जनसंख्या वृद्धि से मनुष्य के रहवास में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे मधुमक्खियों के प्राकृतिक आवास घटते जा रहे है। वही दूसरी ओर कृषि में एक ही फसल को बड़े क्षेत्र में उगाने से मधुमक्खियों को पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता क्योंकि एक ही पौधा सम्पूर्ण पोषक तत्व प्रदान नहीं कर सकता है।
  • वायु प्रदूषण
    वाहनों तथा फैक्ट्रियों से होने वाले लगातार प्रदूषण से भी मधुमक्खियों की संख्या में कमी आती है। जैसे वायु प्रदूषण हाइड्रोक्सिल तथा नाइट्रेट रेडीकल पुष्प से निकलने वाली सुगंध से शीघ्र वन्ध बनाते है, जिससे मधुमक्खियों को पुष्प को ढूढऩे में समस्या होती है।
  • बीमारी एवं परजीवी
    मधुमक्खियों को होने वाली बीमारिया जैसे, अमेरिकन फाऊल ब्रूड, चाकब्रूड तथा परजीवी जैसे बोरा माइट, एकरीना माइट भी मधुमक्खियों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं।
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