मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य रुपये 1700

मक्का एक उपयोगी फसल

भारत वर्ष में मक्का का उपयोग खाद्यान्न फसलों में धान एवं गेंहू के बाद तीसरे स्थान पर किया जाता है, देश में मक्का का उपयोग खाद्यान्न एवं चारे के लिए किया जाता है। अब मक्का को कार्न, पॉप कार्न, स्वीट कॉर्न, बेबी कॉर्न आदि अनेकों रूप में पहचान मिल चुकी है। विश्व के अनेक देशों में मक्का की खेती प्रचलित है जिनमें क्षेत्रफल एवं उत्पादन के हिसाब से संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, चीन और ब्राजील का विश्व में क्रमश: प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान है। मक्का की फसल अनाज, चारा एवं औद्योगिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मक्का को अनाज की रानी कहा जाता है क्योंकि मक्का का हर भाग उपयोगी होता है। पिछले कुछ वर्षों में मक्का उत्पादन के क्षेत्र में भारत ने नये कीर्तिमान स्थापित किये है जिससे वर्ष 2010-11 में मक्का का उत्पादन 217.26 लाख टन के उच्च स्तर पर पहुंच गया है एवं उत्पादकता 2540 किग्रा. प्रति हेक्टर के स्तर पर है। यही वजह है कि मक्का की विकास दर खाद्यान्न फसलों में सर्वाधिक है जो इसकी बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाती है। भारत में सर्वाधिक क्षेत्रफल में मक्का उगाने वाले राज्यों में कर्नाटक, राजस्थान एवं आन्ध्र प्रदेश आते हैं।

भूमि का चयन एवं खेत की तैयारी
मक्का की खेती की अधिकतम पैदावार के लिए गहरी उपजाऊ दोमट मिट्टी उत्तम होती है, जिसमे वायु संचार व जल निकास उत्तम हो तथा जीवांश पदार्थ प्रचुर मात्रा में हों। मक्का की फसल के लिए मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 के मध्य (अर्थात न अम्लीय और न क्षारीय) उपयुक्त रहता हैं। खेत मे पानी जमा होने पर मक्के की फसल नष्ट हो जाती है।
बोआई समय
भारत में मक्का की बोआई वर्षा प्रारंभ होने पर की जाती है। देश के विभिन्न भागों में (खरीफ ऋतु) बोआई का उपयुक्त समय जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम पखवाड़े तक का होता है।
बीज दर
मक्का का प्रमाणित बीज प्रत्येक वर्ष किसी विश्वसनीय संस्थान से लेकर बोना चाहिये। संकुल मक्का के लिए पहली फसल कटते ही अगले वर्ष बोने के लिए स्वस्थ्य फसल की सुन्दर-सुडोल बाले (भुट्टे) छाँटकर उन्हे सुरक्षित रखें ।
बीज उपचार
संकर मक्का के बीज पहले से ही कवकनाशी से उपचारित होते है अत: इनको अलग से उपचारित करने की आवश्यकता नहीं होती है। अन्य प्रकार के बीज को थायरम अथवा विटावैक्स नामक कवकनाशी 1.5 से 2.0 ग्राम प्रतिकिलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए जिससे पौधों को प्रारम्भिक अवस्था में रोगों से बचाया जा सके।
उन्नत किस्म
नवजोत, अरुणा, जवाहर मक्का 216, प्रभात, त्रिशूलता, पी 3522, 1864, डीएचएम 121, विवेक 51, केएमएच 25, के 45, सीएम 3, जीएम 8, 12।
बोआई की विधियाँ
मक्का बोने की निम्नविधियाँ, छिटकवाँ, हल के पीछे ट्रैक्टर चलित मेज प्लांटर और डिबलर विधि प्रचलित है, जिनका विवरण यहां प्रस्तुत है।
छिटकवाँ विधि
सामान्य तौर पर किसान छिटककर बीज बोते है तथा बोने के बाद कल्टीवेटर से बीज को मिट्टी में मिला कर पाटा लगाकर बीज ढकते है। इस विधि से बोआई करने पर बीज अंकुरण ठीक से नहीं हो पाता है, पौधे समान और उचित दूरी पर नहीं उगते जिससे अच्छी उपज के लिए प्रति इकाई इष्टतम पौध संख्या प्राप्त नहीं हो पाती है। इसके अलावा फसल में निराई-गुड़ाई (अन्तकर्षण क्रिया) करने में भी असुविधा होती है। छिटकवाँ विधि में बीज भी अधिक लगता है।
हल के पीछे
हल के पीछे तथा हल के द्वारा बनी लाइनों मे चोगा विधि द्वारा बुवाई की जा जाती है। इस विधि से कतार से कतार तथा पौध से पौध की दूरी इष्टतम रहने से पौधो का विकास अच्छा होता है। उपज अधिक प्राप्त होती है।
डिबलर विधि
डिबलर एक उन्नत हस्तचलित यंत्र है। इस यंत्र से बीज की बोआई सर्वोत्तम विधि है। यह छोटे प्लॉट या पहाड़ी इलाकों में मक्का, चना, मटर, सोयाबीन, ज्वार इत्यादि के लिए उपयुक्त मैन्युअल रूप से संचालित यन्त्र है। इसका उपयोग उचित अंतराल से बुआई करने के लिए किया जाता है। इस यन्त्र से मिट्टी में इच्छानुसार गहराई तक दबाकर होल बनाकर बीज को डालकर छिद्र को ढंक दिया जाता है। इस विधि से बीज का जमाव और उत्पादन अच्छा होता है एक डिबलर से दो श्रमिक एक दिन में मक्का की फसल की बुआई लगभग 0.2 से 0.5 एकड़ तक आसानी से कर सकता है। विभिन्न प्रकार के डिबलर बाजार में उपलब्ध है।
जीरो टिलेज तकनीक
पिछली फसल की कटाई के उपरांत बिना जुताई किये मशीन द्वारा मक्का की बुवाई करने की प्रणाली को जीरो टिलेज कहते हैं। इस विधि से बुवाई करने पर खेत की जुताई करने की आवश्यकता नही पड़ती है तथा खाद एवम् बीज की एक साथ बुवाई की जा सकती है। इस तकनीक से चिकनी मिट्टी के अलावा अन्य सभी प्रकार की मृदाओं में मक्का की खेती की जा सकती है। जीरो टिलेज मशीन साधारण ड्रिल की तरह ही है, परन्तु इसमें टाइन इनवर्टेड टी टाइप की होती है। यह टाइन मिट्टी में नाली के आकार की दरार बनाता है, जिसमें खाद व बीज उचित मात्रा में सही गहराई पर पहुँच जाता है।

ट्रैक्टर चलित प्लांटर
मक्का की लाइन से लाइन और पौध से पौध की दूरी से बुआई करने के लिए मेज प्लान्टर का उपयोग अधिक किया जाता है। ट्रैक्टर चलित मेज प्लांटर अथवा देशी हल की सहायता से रबी मे 2-3 सेमी. तथा जायद व खरीफ में 3.5-5 सेमी. की गहराई पर बीज बोना चाहिए। इस मशीन द्वारा बुआई करने से खाद और बीज को एक साथ डाला जा सकता है। किसानों द्वारा मक्का की बुआई हेतु इस मशीन का प्रयोग अधिक किया जा रहा है।
खाद एवं उर्वरक
मक्का की भरपूर उपज लेने के लिए संतुलित मात्रा में खाद एंव उर्वरकों का प्रयोग आवश्यक है। मक्का बुवाई से 10-15 दिन पूर्व 10-15 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। मक्का में 150 से 180 किलोग्राम नत्रजन, 60-70 किलो ग्राम फास्फोरस, 60-70 किलो ग्राम पोटाश तथा 25 किलो ग्राम जिंक सल्फेट प्रति हैक्टर देना उपयुक्त पाया गया है। संकुल किस्मो में नत्रजन की मात्रा उपरोक्त की 20 प्रतिशत कम देना चाहिए। मक्का की देशी किस्मो में नत्रजन व पोटाश की उपरोक्त मात्रा की आधी मात्रा देनी चाहिए। फास्फोरस, पोटाश और जिंक की पूरी मात्रा तथा10 प्रतिशत नाइट्रोजन को आधार डोज (बेसल) के रूप में बुवाई के समय देना चाहिए।

 अलग-अलग मक्का की प्रजातियों के लिये बीज दर
सामान्य मक्का  बेबी कॉर्न स्वीट कॉर्न पाप कॉर्न चारे हेतु
बीज दर (किग्रा. प्रति एकड़) 08-10 10-12 2.5-3 04-05 25-30
कतार से कतार की दूरी (सेमी.) 60-75 60 75 60 30
पौधे से पौधे  की दूरी (सेमी.) 20-25 15-20 25-30 20 10

सिंचाई
मक्के की सिंचाई पौधे के 4-5 पत्ती वाली अवस्था आने पर, पौध घुटनों तक आने से पहले व तुरंत बाद, नर मंजरी आते समय, दाना भरते समय तथा दाना सख्त होते समय सिंचाई देना लाभकारी रहता है। सामान्य तौर पर मक्के के पौधे 2.5 से 4.3 मिली. प्रति दिन जल उपभोग कर लेते है। मौसम के अनुसार मक्के को पूरे जीवन काल (110-120 दिन) में 500 मिली. से 750 मिली. पानी की आवश्यकता होती है। मक्के के खेत में जल भराव की स्थिति में फसल को भारी क्षति होती है।
खरपतवारों से सुरक्षा
मक्के की फसल तीनों ही मौसम में खरपतवारों से प्रभावित होती है। समय पर खरपतवार नियंत्रण न करने से मक्के की उपज में 50-60 प्रतिशत तक कमी आ जाती है। प्रारंम्भिक 30-40 दिनों तक एक वर्षीय घास व चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु एट्राजिन नामक खरपवारनाशी 1.0 से 1.5 किग्रा दवा को 1000 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरंत बाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में छिड़कना चाहिए। खरपवारनाशियों के छिड़काव के समय मृदा सतह पर पर्याप्त नमी का होना आवश्यक रहता है। इसके अलावा एलाक्लोर 50 ईसी (लासो) नामक रसायन 3-4 लीटर, 1000 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के बाद खेत में समान रूप से छिड़कने से भी फसल में 30-40 दिन तक खरपतवार नियंत्रित रहते हैं।
कटाई-गहाई
मक्का की प्रचलित उन्नत किस्में बोआई से पकने तक लगभग 90 से 110 दिन तक समय लेती हैं। प्राय: बोआई के 30-50 दिन बाद ही मक्के में फूल लगने लगते है तथा 60-70 दिन बाद ही हरे भुट्टे भूनकर या उबालकर खाने लायक तैयार हो जाते है। एक आदमी दिन भर में 500-800 भुट्टे तोड़ कर छील सकता है। अत: भुट्टों को छीलकर धूप में तब तक सुखाना चाहिए जब तक दानों में नमी का अंश 15 प्रतिशत से कम न हो जाये।
उपज
सिंचित परिस्थितियों में संकर मक्का की उपज 50-60 क्विं./हे. तथा संकुल मक्का की उपज 45-50 क्विं./हे. तक प्राप्त की जा सकती है। मक्का के भुट्टों की पैदावार लगभग 45000-50000 प्रति हे. आती है। इसके अलावा 200-225 क्विंटल हरा चारा प्रति हेक्टर भी प्राप्त होता है।

  • अनुराग पटेल
  • दुष्यन्त सिंह
  • एन. एस. चंदेल
    email: 3679anuragpatel@gmail.com

www.krishakjagat.org

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