बीज की आनुवांशिक शुद्धता

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बीज की आनुवांशिक शुद्धता का तात्पर्य बीज किस्म में निहित उन विशिष्ट लक्षणों से है, जिनके कारण इस किस्म को विशेष नाम से पहचाना जाता है जैसे किस्म की जीनी संरचना, पौधे की ऊंचाई, रोगरोधिता और कीट रोधी-गुण, पादप, तना और पत्तियों का आकार-प्रकार, पुष्प। पुष्प क्रम, बाली, फल आदि का रूप रंग और गठन, फसल अवधि या परिपक्वता, बीज/दाने का आकार-प्रकार, रंग, गठन, भार उत्पादन-क्षमता आदि। बीज उत्पादन के दौरान इन सभी किस्म संबंधी लक्षणों का अनुरक्षण किया जाता है। फिर भी यह उल्लेखनीय है कि यदि उत्पादित बीज ढेर अपने किस्म संबंधी लक्षणों का अनुरक्षण किया जाता है। फिर भी यह उल्लेखनीय है कि यदि उत्पादित बीज ढेर अपने किस्म संबंधी लक्षणों के अनुरूप होता है तो उसे उच्च आनुवांशिक शुद्धता वाला बीज ढेर कहा जाता है और यदि उक्त ढेर के अधिकांश बीज/पौधे आनुवांशिक लक्षणों से मेल नहीं खाते तो बीज की आनुवांशिक शुद्धता को असंतोषजनक कहा जाता है। उन्नत बीज किस्मों के प्रसार से अपेक्षित परिणामों को प्राप्त करने के लिये यह आवश्यक है कि इन किस्मों का शुद्ध बीज किसानों को उपलब्ध कराया जाये। आनुवांशिक रूप से शुद्ध बीज के अभाव का फसल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा उपज कम होती है।
विकास के दौरान विभिन्नताएं
विभिन्न परिस्थितियों में एक ही किस्म की वृद्धि अनुक्रिया भिन्न-भिन्न हो सकती है जैसे भिन्न जलवायु, मृदा दशाओं, दीप्तिकालों में पादप वृद्धि में विभिन्नताएं पाई जाती हैं। इन परिवर्तनों का मुख्य कारण संबंधित किस्म का नए वातावरण में अनुकूलित होना है। इस प्रकार के परिवर्तनों को न होने देने के लिये प्रदत्त किस्म को उसके अनुकूलित क्षेत्र में ही उगाना चाहिये।
उत्परिवर्तन
अधिकांशत: उत्परिवर्तनों से किस्मों का ह्रास नहीं होता है, फिर भी अनाजों, जैसे जई आदि में प्राय: उत्परिवर्ती पौधे देखे जाते हैं, जिन्हें बीज खेत से निकाल दिया जाता है। समय-समय पर वरण करते रहने और किस्म सम्बंधी शुद्धता को बनाये रखने के लिये आवश्यकता के अनुसार अवांछनीय पौधों को बीज खेत से निकालते रहने से बीज फसल में उत्परिवर्तन से होने वाले ह्रास को रोका जा सकता है।
प्राकृतिक संकरण
लैंगिक रूप से वर्धित पर-परागित किस्मों में यांत्रिक मिश्रण की भांति प्राकृतिक संकरण से भी गुणता का ह्रास हो जाता है। यह ह्रास तीन तरह से होता है – (क) निकृष्ट प्रकार के पौधों में होने वाले प्राकृतिक संकरण से (ख) रोग ग्रस्त पौधों से होने वाले प्राकृतिक संकरण से (ग) बीज फसल के पौधों से भिन्न प्रकार के पौधों द्वारा होने वाले प्राकृतिक संकरण से। प्रबल रूप से स्व निषेचित अनाज की फसलों में इस प्रकार के प्राकृतिक संकरण द्वारा संकरण बहुत कम होता है, परन्तु पर-परागित फसलों में वांछनीय पृथक्करण न होने पर सारी फसल में संदूषण हो जाता है। अत: इन फसलों में प्राकृतिक संकरण से संदूषण को नियंत्रित करने के लिये पर्याप्त पृथक्करण प्रदान करना आवश्यक होता है।
अल्प आनुवांशिक परिवर्तन
समान रूप से दिखने वाले वंशक्रमों को मिलाकर जारी की गई मिश्रित किस्मों में अल्पमात्रा में आनुवांशिक परिवर्तन हो सकते हैं। किस्म जारी करने के बाद प्रथम पीढिय़ों में इन परिवर्तनों से औसत उत्पादन क्षमता में वृद्धि हो सकती है तथा परिवर्तनशील परिस्थितियों में इनकी गुण प्रदर्शन क्षमता बढ़ सकती है। बाद में ये परिवर्तन वातावरण के अनुकूलन में समाप्त हो सकते हैं, फिर भी इनसे हानि या लाभ हो सकते हैं।
रोगों का वरणात्मक प्रभाव
किस्मों के ह्रास में रोगों के वरणात्मक प्रभाव का बड़ा उल्लेखनीय स्थान है। अलैंगिक रूप से उत्पादित की जाने वाली फसलों के बीज में कवक और जीवाण्विक रोगों के लगने की संभावना रहती है, इसलिये इन सब रोगों के रोगजनकों और संबन्धित जीवाणुओं की जांच बीज में पहले की जानी चाहिये, इस तरह परीक्षित रोगमुक्त बीज ही अनुकूल और उपयुक्त परिस्थितियों में बढ़ाया जाना चाहिये। प्राय: किसी क्षेत्र में कुछ कीट किसी रोग के वाहक होते हैं जिससे उस क्षेत्र में बीज को रोगमुक्त रखना कठिन होता है। इसलिये सभी प्रकार से रोगमुक्त बीज को रोग जनकों से मुक्त वातावरण में उगाना चाहिये।
पादप प्रजनन की तकनीक
कदम (1942) ने किस्मों के ह्रास में पादप प्रजनन की तकनीकों को एक कारक के रूप में सम्मिलित किया है। इसमें ऐसी स्थितियां सम्मिलित हैं , जिनमें अस्थिरताएं पाई जाती हैं। ये अस्थिरताएं नई किसम में कोशकीय आनुवांशिक अनियमितताओं के उपयुक्त रूप से अनुमानित न होने के कारण उत्पन्न होती है। रोग ग्रहवशीलता रोगरोधिता तथा अन्य दशाओं के लिये जिन किस्मों में पृथक्करण होता रहता है, उन्हें समय के कुछ पूर्व अनाधिकृत रूप से कभी-कभी जारी कर दिया जाता है या किसानों को परीक्षण के तौर पर उगाने को दे दिया जाता है। ऐसी किस्मों में यदि संदूषण होता रहता है तो ऐसी परिस्थितियों में इसे संदूषण का कारक माना जा सकता है। इस बात को परीक्षण कार्यक्रम की असफलता कहा जा सकता है।
अन्य वंशागत परिवर्तन
बीज उत्पादन के दौरान उत्परिवर्तनों के अलावा पुन: संयोजन तथा बहुगुणन आदि के कारण फसल में कुछ अन्य वंशागत परिवर्तन हो सकते हैं। इस प्रकार के परिवर्तनों का रोकने के लिये या इनके प्रभाव को समाप्त करने के लिये किस्म संबंधी शुद्धता के अनुरक्षण हेतु किया जाने वाला सामयिक चरण आवश्यक है।
बीज की आनुवांशिक शुद्धता के लिये बीज स्रोत नियंत्रण संदूषण स्रोतों से पृथक्करण, अवांछनीय पौधों को निकालना, बीज-किस्म का परीक्षण, आनुवंशिक परिवर्तन, बीज प्रमाणीकरण और पीढ़ी पद्धति उपाय से नियंत्रण किया जाना आवश्यक है।

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