बिना आपरेशन ठीक हो सकते हैं बच्चों के टेढ़े-मेढ़े पैर

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गर्भ के समय या पूर्व में मां ने स्टेरॉयड दवाओं का इस्तेमाल अधिक किया है तो इससे नवजात के पैर जन्म से ही टेढ़े हो सकते हैं। इसे क्लबफुट बीमारी कहा जाता है जिसका बिना सर्जरी इलाज किया जा सकता है। बच्चे के पैरों का सामान्य विकास होने के इंतजार में अधिकतर माता-पिता दो से तीन साल की उम्र में ही ऐसे बच्चों के इलाज के लिये डॉक्टर के पास  पहुंचते हैं जबकि इलाज शुरू कर विकलांगता सही होने की संभावना अधिक रहती है। इसका नि:शुल्क इलाज किया जाता है, जहां तक जानकारी है अब तक 2100 बच्चों को ठीक किया जा चुका है।
दिल्ली में एम्स के आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. शाह आलम खान ने बताया कि जेनेटिक कारणों के अलावा अधिक स्टेरॉयड दवाओं का इस्तेमाल, खून की कमी या जुड़वां बच्चे होने की सूरत में गर्भ में नवजात के पैरों का सामान्य विकास नहीं हो पाता, जिसकी वजह से पैर विकृत या विकलांग हो जाते हैं। ऐसे बच्चों को जन्म के तुरंत बाद पहचाना जा सकता है तथा जिन अस्पतालों में क्लबफुट का इलाज उपलब्ध है वे इसे जन्म के बाद ही शुरू कर देते हैं जबकि विशेषज्ञों की सलाह पर क्लब फुट सोसायटी से भी संपर्क कर इलाज कराया जा सकता है।
चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय के आर्थोपेडिक सर्जन              डॉ. अनिल अग्रवाल ने बताया कि इलाज के लिये टीनोटॉमी विधि से  बच्चों को विशेष तरह का प्लास्टर चढ़ाया जाता है, इसके बाद विशेष जूतों की सहायता से पैरों को सही एंगल (40 डिग्री) दिया जाता है। पूरी तरह ठीक होने पर 10 से 12 साल का समय लगता है। एम्स सहित दिल्ली के साथ सरकारी अस्पतालों में क्लब फुट का इलाज किया जाता है। क्योर इंटरनेशनल के डॉ. संतोष जार्ज ने बताया क्लबफुट के दिल्ली में बीते तीन साल में 2100 बच्चों का इलाज किया जा चुका है, जबकि अब तक देश में 4000 बच्चे सही हो चुके हैं जबकि वर्ष 2008 से पहले ऐसे बच्चों को विकलांग की श्रेणी में रखा जाता था।
क्या है टीनोटॉमी
बच्चों की एड़ी को सही एंगल देने के लिये टीनोटॉमी के बाद प्लास्टर चढ़ाया जाता है, इसके लिये डॉक्टर एड़ी में हल्का कट लगाते हैं, विकृत 90 डिग्री के एंगल के पैरों में टीनोटॉमी की जरूरत अधिक होती है। कई  बार बच्चों को एक पैर में विकलांगता की शिकायत होती है, जबकि कभी दोनों पैरों में विकलांगता होती है। टीनोटॉमी के बाद विशेष तरह के जूतों (स्पीन्ट) से विकृति को दूर करते हैं। प्रक्रिया में बच्चों की बोन ग्राफ्टिंग नहीं होती है।
सात महीने की उम्र में 11 प्लास्टर
बिहार के भागलपुर जिले से क्लबफुट बच्चे का इलाज कराने आए बिरजू यादव ने बताया कि सात महीने एक उनके बेटे सच्चिदानंद के पैर जन्म से सामान्य नहीं थे अत: बच्चे के इलाज के लिए अस्थाई रूप से सोनीपत में रह रहे हैं। अब तक 11 बार प्लास्टर चढ़ चुका है। धीरे-धीरे विकृति दूर होगी, प्लास्टर के बाद विशेष जूतों से बच्चे का इलाज किया जाएगा। जिन्हें बच्चों को सोते हुए भी पहनना पड़ता है।

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