बकरियों की देखरेख ऐसे करें

बकरियों को जब बड़े पैमाने पर एक वैज्ञानिक रीति से पालना हो उस परिस्थिति में इनके लिए घर बनाना अंत्यत आवश्यक होता है। इनके घर की व्यवस्था करने से पहले स्थान का चुनाव करना आवश्यक होता है क्योंकि बकरी पालन की बहुत कुछ सफलता उसके लिए बनाये गये घर व उसके आसपास की स्थिति पर निर्भर करती है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए बकरियों को घर बनाने के लिए स्थान चुनते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।

  •     बकरियों के आवास के आस-पास कीचड़ इत्यादि होने की संभावना न हो।
  •     स्वच्छ हवा व प्रकाश का समुचित प्रबंध हो।
  •     अधिक ठंडी, गर्मी व बरसात से उनका बचाव हो सके।
  •     चोरों व जंगली जानवरों से सुरक्षा मिल सके।

मुख्य रूप से दुधारू बकरियों के लिए अच्छे भोजन के साथ-साथ अच्छी आवास व्यवस्था भी आवश्यक है। तभी वे अपनी क्षमता के अनुसार पर्याप्त मात्रा में उत्पादन कर सकती है। बकरी पालन के लिए एक अच्छे घर में बकरियों व बच्चों के रहने के लिए अलग-अलग स्थान होने चाहिए। दाना और पानी का अलग-अलग स्थान होने से दाना और पानी दोनों को खराब होने से बचाया जा सकता है।
बकरियों के लिए सस्ता घर –
अपने देश की गरीब किसानों की परिस्थिति को ध्यान मे रखते हुए सस्ते घर बनाने के लिए अगर किसी मकान के बगल की दीवार के सहारे एक ओसार तैयार कर लिया जाये तो वह सबसे सस्ता और अच्छा रहता है। दो बकरियों के परिवार के लिए इस प्रकार 5 फुट चौड़ा और 10 फुट लम्बा ओसार पर्याप्त रहता है।
असुरक्षित चारागाह –
अधिकांशत: ग्रामीण इलाकों में जहंा चारागाह या वन क्षेत्र उपलब्ध है, वहां  बकरियों को चरने के लिए ले जाया जाता हैं इसके लिए इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि बकरियों को जिस स्थान पर चरने के लिए ले जाया जाता है, वहां पर गहरे गड्ढे व कम गहरे तालाब व पोखरे इत्यादि नहीं होनी चाहिए। क्योकि आमतौर से ऐसी ही जगहों से इनके शरीर में परजीवी एवं कीटाणु प्रवेश कर जाते हैं जो कि आगे चलकर एक भयंकर बीमारी पैदा करते है।
बकरियों से दूध निकालना –
गायों का दूध दुहने की भांति बकरियों का दूध दुहना भी एक कला है जिसे कि केवल अभ्यास से ही सीखा जा सकता है। दूध अच्छी तरह से पूरा-पूरा दुहना चाहिए बकरी का दूध दुहने की मुख्य दो विधियां हैं। पहली विधि है थनों को सूतकर या खींचकर। इस विधि से थनों को अंगुलियों के अगले भाग से पकड़कर अंगूठे के अगले भाग से सूतना चाहिए। इससे अंगूठे के अगले भाग का दबाव पडऩे से दूध की धार निकलने लगती है। दूसरी विधि है थन को मु_ी से दबाकर दूध निकालना। थन को मु_ी से दबाकर दूध दुहने की विधि यह है कि थन को  अच्छी तरह पकड़कर उसको अंगुलियों से हथेली की ओर बार-बार दबाना चाहिए। यह क्रिया जल्दी-जल्दी करनी चाहिए। यदि थनों का आकार बहुत छोटा न हो तब इन दोनों विधियों में से थन का मु_ी में दबाकर दुहने की विधि अधिक अच्छी और उपुयक्त पाई गई है।
दुधारू बकरियों की देखभाल –
बकरियों में साधारणतया बच्चे देने के 10 दिन पहले व 10 दिन बाद तक विशेष ध्यान देना अत्यंत जरूरी होता है क्योकि बकरियों  के जीवन का यह एक ऐसा समय है जब इनके शरीर पर प्राकृतिक रूप से काफी बोझ पड़ता है। इसी समय में इनमें बहुत सी बीमारियां जैसे कि योनि का फूल जाना, योनि का बाहर निकल आना, गर्भाशय का फूल जाना, योनि में घाव हो जाना या गर्भाशय में मवाद बन जाना, उसमे पानी भर जाना, थन का फूल जाना, या थन में फोड़ा हो जाना, स्तन में घाव हो जाना, गर्भाशय का बाहर निकल आना इत्यादि के होने का काफी डर रहता है। थन की बीमारियां अधिकांश: बच्चो के पैदा होने के कुछ दिन पहले या बाद में ही होती है। इसके बाद अधिकांशतया थन की बीमारियां उसमें चोट या खरोच लगने के कारण ही होती है।
बधिया करना –
साधारणतया बहुत कम नर बच्चों को प्रजनन के लिए उपयोग में लिया जाता है। प्रक्षेत्र के अंदर पैदा हुए नर बच्चों में से किसी एक या दो स्वस्थ बच्चे के प्रजनन के लिए चुनकर उन्हें अच्छी तरह से पालना चाहिए। जिन नर बच्चों को प्रजनन के लिए उपयोग में नहीं लिया जाता है उन्हें साधारणतया मांस के लिए ही पाला जाता है और इसके लिए उनको बधिया करना अत्यंत आवश्यक होता है। इन बच्चों को बधिया करवाने का सबसे उपयुक्त समय उनके जन्म के करीब 7 दिन से 15 दिन के अंदर का होता है। इस उम्र के अंदर इन बच्चों को बधिया करवाना बहुत ही अच्छा रहता हैं बधिया करने के लिए उपयोग में लाये जाने वाले औजार को Óबर्डिजो कैस्ट्रेटरÓ कहते है। यह किसी भी पशु चिकित्सालय में उपलब्ध रहता है। नर बच्चों को अगर हमारे पशुपालक चाहें जो अस्पताल में ले जाकर या खुद अपने घर में ही बधिया कर सकते है।
बधिया करने से पहले नर बच्चों के अंडकोष के ऊपरी भाग में स्प्रिट से लगा हुआ रूई का फूहा रख कर भाग को Óबर्डिजो कैस्ट्रेंटरÓ से दबाकर कुछ देर तक रखना चाहिए उसके बाद इसे निकालकर अलग कर देना चाहिए और अंडकोष के उस दबे हुए भाग में अच्छी तरह से स्प्रिट या टिंचर आयोडीन लगानी चाहिए। यदि उस स्थान पर घाव हो गया हो तो लगातार वहां पर टिंचर आयोडीन या स्प्रिट या कोई अन्य दवा लगाकर अच्छी तरह से घाव का उपचार करना चाहिए। ऐसा करने से घाव शीघ्र भर जायेगा। जब बच्चा तीन माह के ऊपर का हो जाये उस समय बधिया करवाने के लिए किसी भी पशु चिकित्सक की सलाह लें।
बच्चों को बधिया करवा देने से बड़े होने पर उनका मांस खाने के लिए बहुत उपयुक्त रहता है। परंतु यदि उन्हें बधिया नहीं किया जाता है तब उनके मांस की गुणवत्ता थोड़ा कम हो जाती है। साथ ही मांस के रेसे मोटे व काफी कड़े हो जाते है जो कि खाने के लिए अधिक उपयुक्त नहीं रहते है अत: बच्चों को बधिया करवाना अच्छा रहता है।

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