फूल, पत्ता, गांठ गोभियों को रोग से बचाएं, उपज बढ़ाएं

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प्रमुख रोग एवं नियंत्रण-
अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट- यह रोग डाउनी मिल्ड्यू से गहरे रंग में होता है। यह अल्टरनेरिया फफूंद से होता है। गर्म आद्र्र मौसम में फैलता है। पत्तों पर पीला भूरे रंग के धब्बे केन्द्रीय रिंग के समान दिखाई पड़ते हैं।
संक्रमित रोगाणु हवा, पानी, वर्षा यंत्र व मनुष्य से फैलते हैं। 9 घण्टे आद्र्र मौसम मिलने पर रोगाणु अंकुरित होकर पौधे को संक्रमित कर देते हैं।
नियंत्रण-

  • (गैर रसायनिक) फसल चक्र अपनायें, तीन वर्ष तक गोभीवर्गीय फसल न लें और न ही सरसों की फसल लें।
  • (रसायनिक) क्लोरोथायोनिल 200 मि.ली. प्रति एकड़ या पाइरोक्लोस्ट्रोबिन 0.5 ग्राम/लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

आद्र्रपतन- यह रोग मुख्य रूप से नर्सरी अर्थात गोभी की पौध तैयार करते समय लगता है। इसका प्रकोप दो अवस्थाओं में होता है। प्रथम पौध मृदा की सतह के बाहर आने से पहले ही मर जाती है तथा दूसरा पौध के उग आने के बाद इसका तना मृदा से छूते हुए स्थान पर विगलित हो जाता है जिससे पौध गिर कर मर जाते है।
नियंत्रण-नर्सरी की क्यारियां कुछ ऊंचाई पर उठी हुई व उचित जल निकास वाली होनी चाहिए। केप्टान या थायरम 0.3 प्रतिशत से मृदा उपचार करें। गर्मियों में नर्सरी की क्यारियों की प्लास्टिक द्वारा ढँककर भी उपचारित किया जा सकता है, जिसे मृदा सौरीकरण कहते हंै। बीजों को मेन्कोजेब 75 डब्ल्यू पी 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें। रोग होने की दशा में इसी दवा का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
काला धब्बा रोग- यह एक कवक जनित रोग है। रोग के लक्षण प्रारंभ में छोटे काले धब्बे पत्तियों पर व तने पर दिखाई देते है। जो बाद में फलों को भी ग्रसित कर देते है।
नियंत्रण- कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 डब्ल्यू पी फफूंदी नाशक के 2 से 4 छिड़काव 1.5-2 ग्राम पानी के हिसाब से 15 दिन के अंतराल पर करें।
मृदुरोमिल- यह रोग पौधे की सभी अवस्थाओं में आता है व काफी नुकसान करता है। रोग के प्रमुख लक्षण पत्तियों को निचली सतह पर हल्के बैंगनी से भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। जिन पर बाद में कवक वृद्धि दिखाई देती है।
नियंत्रण- मेटालेक्जिल 8 प्रतिशत मेंकोजेब 64 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. आधा ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से अथवा मेंकोजेब 1.5 से 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 10-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
राइजोक्टोनिया – यह रोग कारक पौधें की विभिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न रोगों को जन्म देता है जिनमें आद्र्रपतन, वायर स्टेम, भूरा सडऩ, शीर्ष सडऩ आदि है।
नियंत्रण- यह एक मृदा जनित फफूंदी है अत: गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें। कम्पोस्ट खाद का उपयोग करें। सिंचाई हमेशा हल्की करें। ब्रेसीकोल 20-30 किलोग्राम की दर से मृदा को उपचारित करें।
तना सडऩ – रेाग की प्रांरभिक अवस्था में दिन के समय पौधे की पत्तियां लटक जाती हंै परंतु रात्रि में यह पुन: स्वस्थ दिखाई देती है। तने के निचले भाग पर मृदा तल के समीप जल सिक्त धब्बे दिखाई देते हंै। धीरे-धीरे रोग ग्रसित भाग पर सफेद कवक दिखाई देने लगती है व तना सडऩे लग जाता है। इसे सफेद सडऩ भी कहते हैं।
नियंत्रण- कार्बेण्डाजिम 2 ग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें। मेंकोजब व कार्बेण्डाजिम को मिलाकर 15-20 दिन के अंतराल पर जब फूल बनाना प्रांरभ हो 3-4 छिड़काव करें।
पीलापन- इस रोग में पत्तियां पीली पडऩे लग जाती है व नीचे की पत्तियां जमीन पर लटक जाती हंै। पौधे के उत्तक भी पीले अथवा गहरे भूरे हो जाते हैं। पौधा धीरे- धीरे मरने लगते हंै।
नियंत्रण- यह एक मृदा जनित फफूंदी है इसके नियंत्रण हेतु गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें व रेाग प्रतिरोधी किस्मों की बुवाई करें।
क्लब रॉट- यह एक मृदा जनित रोग है जो प्लाज्मोडीफोरा ब्रासिकासी के नाम से जाना जाता है। इसमें पौधा का पीला पडऩा, मुरझाना व जड़ों का फूलकर मोटा होना प्रमुख लक्षण है। बाद में जड़े सडऩे लगती हैं। पौधे पीले पड़कर कमजोर हो जाते हैं। नम मृदा, ठण्डा मौसम से रोग फैलता है। यह रोग 70 प्रतिशत नमी मृदा व तापमान 17 से 23 डिग्री होने पर अधिक होता है।
नियंत्रण- नर्सरी के क्षेत्र को बुवाई से दो सप्ताह पहले पेन्टाक्लोरोनाइट्रोबैंजीन या क्लोरोप्रिक्रिन या फार्मेलीन से उपचारित करें। खेत में फसल चक्र अपनायें।
काला सडऩ- यह एक जीवाणु रेाग है। इसके प्रमुख लक्षण पत्तियों के किनारों पर अग्रेंजी अक्षर वी आकार के हल्के हरे महीन धब्बे दिखाई देते है। रोग की उग्र अवस्था में पत्तियों की शिरायें काली हो जाती है। फूल का डंठल अंदर से काला पड़ जाता है।
नियंत्रण- यह रोगकारक जीवाणु बीज में रहता है अत: गर्म पानी (520 सी) से बीज को 30 मिनिट तक उपचारित करें। बीजों को बुवाई से पूर्व स्ट्रेप्टोसाईक्लिन 250 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी के घोल में 2 घंटे तक भिगोकर सुखायें व बुवाई करें। रेाग ग्रसित पौधों को निकालकर नष्ट कर दें। स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 250 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।
मुलायम/नरम सडऩ- जीवाणु जनित यह रोग पौधे की विभिन्न अवस्थाओं में दिखाई देता है। यह रोग भण्डारण, मंडी में ले जाते समय अथवा खेत में अत्याधिक नुकसान करता है। यह रोग मुख्य रूप से काला सडऩ रेाग के बाद अधिक होता है।
नियंत्रण- ऐसे फूल जिन पर काला सडऩ रोग पूर्व में आ चुका हो उन्हें तोड़कर नष्ट कर दें। स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 100-200 पीपीएम व कॉपर आक्सीक्लोराइड (0.3 प्रतिशत) केा मिलाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
भूरी, गलन व लाल सडऩ – यह रोग बोरान तत्व की कमी के कारण होता है। गोभी के फूलों पर गोल आकार के भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हंै जो बाद में फूल को सड़ा देते है।
नियंत्रण- रोपाई से पूर्व खेत में 10-15 किलोग्राम बोरेक्स प्रति हेक्टेयर के हिसाब से प्रयोग करें अथवा फसल पर 0.2 से 0.3 प्रतिशत बोरेक्स के घोल का छिड़काव करें।

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