धान का आहार पोषण

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धान के पोषण में विभिन्न पोषक तत्वों की भूमिका
नाइट्रोजन
धान की नाइट्रोजन आवश्यकता बहुत अधिक है। फसल लगभग पकने के समय तक नाइट्रोजन चाहती है फिर भी कल्ले बनने की अवस्था में नाइट्रोजन की मांग विशेष अधिक रहती है। धान में नाइट्रोजन की कमी से पौधों की वृद्धि रुक जाती है, कल्ले कम निकलते हंै, पत्तियां आकार में छोटी हो जाती है और पीली पड़ जाती है बालें छोटी हो जाती हैं और उपज कम हो जाती है। नाइट्रोजन के अभाव के कारण दाने आकार में छोटे हो जाते हैं और उनमें प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है।
फास्फोरस
धान की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये यह आवश्यक है कि फसल की फास्फेट आवश्यकता की पूर्ति भलीभांति हो। फास्फेट न केवल धान की उपज वृद्धि में सहायक है, बल्कि यह फसल की जड़ों के विकास और सूखा सहन करने की क्षमता में भी वृद्धि करता है और फसल द्वारा अन्य पोषक तत्वों के शोषण की क्षमता में वृद्धि करता है। फास्फोरस की कमी से पौधे का विकास रुक जाता है। पत्तियां गहरे -हरे रंग की हो जाती हैं। पत्तियों का आकार थोड़ा छोटा हो जाता है और झुन्ड में निकलने लगती हैं। इनकी मुख्य जड़ों की लम्बाई बढ़ जाती है और उनका रंग गहरा लाल हो जाता है। गौण जड़ों का विकास रुक जाता है और कल्ले भी कम बनते हैं। फास्फोरस की कमी से बालें देर से निकलती हैं, फलत: फसल देर से पकती हैं।
पोटाश
पोटाश धान के पोषण में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। धान की फसल की पोटाश आवश्यकता भी अन्य खाद्यान्न फसलों की तुलना में अधिक ही है। पोटाश कल्ले बनने से लेकर दाने बनने तक प्रभावकारी भूमिका अदा करता है। कार्बोहाइड्रेट निर्माण और स्थानान्तरण के साथ ही पोटाश दानों के निर्माण में सहायक है। यह पौधों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि के साथ प्रतिकूल जलवायु की दशाओं को सहन करने की क्षमता प्रदान करती है। पोटाश की कमी से पौधों की वृद्धि रुक जाती है। तने छोटे और मुलायम हो जाते हैं। पत्तियों का रंग नीला, हरा हो जाता है और उनकी नोक मुड़ जाती है। उग्र कमी की अवस्था में पुरानी पत्तियां अग्रिम सिरों की ओर से भूरे पीले रंग की हो जाती हैं। पत्तियों पर अनियमित जले हुए से स्थान दृष्टिगोचर होने लगते हैं। आकार में लम्बी, परंतु पतली बालें निकलती हैं और फसल गिरने की संभावना रहती है। यदि कल्ले बनने के समय पोटाश की कमी रहती है तो फसल की उपज निश्चित रूप से गिर जाती है।
गौण और सूक्ष्म मात्रिक तत्व
कैल्शियम और गंधक गौण तत्वों की श्रेणी में आते हैं। ये दोनों ही तत्व धान की फसल के विकास में महत्वपूर्ण सहयोग देते हैं। सूक्ष्म मात्रिक तत्व जस्ता की कमी अधिकांश क्षेत्रों में देखी गयी है। जिंक की कमी की दशा में धान की फसल की वृद्धि सर्वथा रुक जाती है। धान का ‘खैराÓ रोग जिंक की कमी से होता है। धान में जिंक की कमी के लक्षण तीन-चार सप्ताह के पौधों की पुरानी पत्तियों पर कल्ले बनने के समय दिखायी देने लगते हैं। प्रारंभ में पत्तियों का हरा रंग कम होने लगता है और बीच का भाग आधार की ओर से भूरे रंग (कत्थई) का होना प्रारंभ हो जाता है।
उग्र कमी की स्थिति में यह रंग बढ़ते-बढ़ते पूरी पत्ती पर फैल जाता है। प्रभावित पत्तियां बाद में मर सी जाती हैं और अग्रिम सिरा सूख कर ऐंठ जाता है। जिंक की कमी के इन लक्षणों के प्रकट होने से दो-तीन सप्ताह के अंदर ही सभी पत्तियाँ सूखने लगती है और पौधों की बढ़वार रुक जाती है। पौधों की जड़ों को देखने से प्रतीत होता है कि उनकी बढ़वार रुक गई है और रंग हल्का भूरा दिखाई देने लगता है। ऊसर भूमि में धान की फसल में जस्ता का प्रभाव सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि इस प्रकार मिट्टी में इस तत्व की प्राप्यता बहुत कम (0.4 पी.पी.एम.) होती है, जिससे रोपाई के 10-15 दिन बाद ही खैरा रोग परिलक्षित हो जाता है।

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