दुग्ध उत्पादन में मध्यप्रदेश की बड़ी छलांग

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वर्तमान में प्रदेश की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दुग्ध उपलब्धता 383 ग्राम है, जो राष्ट्रीय औसत से (315 ग्राम), विश्व के औसत (281 ग्राम) तथा भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की अनुशंसा (280 ग्राम) से अधिक है। वर्ष 2012-13 में मध्यप्रदेश प्रति व्यक्ति दुग्ध उपलब्धता में उत्तर प्रदेश तथा वर्ष 2013-14 में जम्मू-कश्मीर से आगे निकलकर 10वें से 8वें स्थान पर आ गया था। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की मंशा है कि प्रदेश दुग्ध उत्पादन में नम्बर एक राज्य बने और यहाँ प्रति व्यक्ति दुग्ध उपलब्धता 500 ग्राम हो।
राज्य में दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ उत्पादित दूध के संग्रहण, संसाधन, मूल्य संवर्धन एवं विपणन के लिये सहकारिता आधारित कार्यक्रम को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। प्रोत्साहन के फलस्वरूप डेयरी सहकारी गतिविधियों के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ अर्जित की गई हैं। वर्ष 2001 से 2013 तक प्रति वर्ष औसत 190 दुग्ध सहकारी समितियों का गठन किया गया। इसकी तुलना में वर्ष 2013-14 में 823 समिति का गठन किया गया तथा वर्ष 2014-15 में अब तक 779 दुग्ध सहकारी समिति गठित की जा चुकी है। वर्ष 2002-2012 में दुग्ध संकलन में औसत वृद्धि 7.5 प्रतिशत रही, जिसकी तुलना में विगत दो वर्ष में दुग्ध संकलन में 36.12 प्रतिशत वृद्धि हुई है। वर्ष 2014-15 में 33 प्रतिशत की वृद्धि प्राप्त हुई।
पशुपालन को बढ़ावा
राज्य सरकार का संकल्प है कि प्रदेश में श्वेत दुग्ध क्रांति लायी जाये। इसके लिये पशुपालन विभाग द्वारा दुधारू पशु इकाई प्रदाय, अनुदान पर मुर्रा साण्ड प्रदाय एवं नन्दीशाला योजना संचालित की जा रही है। इसके अलावा बकरी-बकरा प्रदाय, सूकर पालन तथा बेकयार्ड कुक्कुट पालन जैसी हितग्राहीमूलक योजनाएं भी संचालित हैं।
प्रदेश में पशुपालन की गतिविधियों ने सस्ता एवं पौष्टिक आहार उपलब्ध करवाने के अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्र विशेषकर भूमिहीन एवं छोटे किसान तथा महिलाओं में लाभकारी आजीविका के सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मध्यप्रदेश में 70 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण पशुपालन पर निर्भर हैं। पशुपालन में महिलाओं की भागीदारी सर्वाधिक है। पशुपालन से संबंधित गतिविधियों से ग्रामीण क्षेत्र के पशुपालक एवं महिलाएं विशेष रूप से लाभान्वित हो रही हैं। विगत 10 वर्ष में राज्य सरकार द्वारा पशुपालन के क्षेत्र में किये जा रहे प्रयास एवं प्रोत्साहन के फलस्वरूप पशुपालन के परिदृश्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है।
एक ओर जहाँ पशुपालन का राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पादन में 3.41 प्रतिशत योगदान है, वहीं सकल राज्य घरेलू उत्पादन में यह योगदान 7.10 प्रतिशत है। राज्य सरकार के प्रयासों के फलस्वरूप पशुधन की उत्पादकता में महत्वपूर्ण वृद्धि परिलक्षित हुई है। वर्ष 2007-08 से वर्ष 2014-15 के मध्य अवर्णित नस्ल गायों की राष्ट्रीय-स्तर की उत्पादकता में जहाँ 20.47 प्रतिशत वृद्धि रही, वहीं प्रदेश में यह वृद्धि 56.42 प्रतिशत रही। संकर नस्ल की गायों की राष्ट्रीय-स्तर की उत्पादकता में वृद्धि 9.86 प्रतिशत के विरुद्ध प्रदेश में वृद्धि 34.51 प्रतिशत, भैंसों की राष्ट्रीय-स्तर की उत्पादकता में वृद्धि 16.78 प्रतिशत के विरुद्ध प्रदेश में वृद्धि 28.24 प्रतिशत रही। बकरियों की राष्ट्रीय-स्तर की उत्पादकता में वृद्धि 17.94 प्रतिशत के विरुद्ध राज्य में वृद्धि 40 प्रतिशत रही।
गौ-वंश
भारत सरकार द्वारा देशी गौ-वंश को बढ़ावा देने के लिये राष्ट्रीय गोकुल मिशन प्रारंभ किया गया है। मिशन में दो नवाचार भी प्रस्तावित किये गये हैं। इनमें से एक कलोर (हीफर) को प्रोत्साहित करना एवं दूसरे में देशी गौ-वंश की नस्लों में दुग्ध प्रतियोगिता का आयोजन करना है। दोनों योजना मध्यप्रदेश में विगत 3 वर्ष से संचालित है।
पशु उपचार सुविधाओं में इजाफा
ग्यारहवीं एवं बारहवीं पंचवर्षीय योजना में कुल 498 पशु औषधालय का पशु चिकित्सालय में उन्नयन तथा 314 नवीन पशु औषधालय की स्थापना की जाना है। इसमें से अब तक 368 पशु औषधालय का पशु चिकित्सालय में उन्नयन तथा 154 पशु औषधालय की स्थापना की जा चुकी है।
पशुपालकों को एक ही भवन में आधुनिकतम जाँच और उपचार की सुविधा उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से 39 जिला-स्तरीय पशु चिकित्सालयों को पॉली क्लीनिक्स का स्वरूप देकर विशेषज्ञों को पदस्थ किया गया है। निदान हेतु आधुनिक मशीन एवं उपकरण उपलब्ध करवाये गये हैं। प्रदेश के 32 जिले में रोग निदान एवं उपचार को त्वरित गति देने के लिये पशु रोग अन्वेषण प्रयोगशालाएँ स्थापित की गई हैं।
टीका द्रव्य कार्यक्रम को सुदृढ़ करने एवं पशु स्वास्थ्य रक्षा को बेहतर बनाने के लिये पशु स्वास्थ्य एवं जैविक उत्पाद संस्थान महू का सुदृढ़ीकरण प्रारंभ किया गया है। इससे पशु-रोगों की रोकथाम का कार्य सुचारू रूप से संचालित हो रहा है। जी.एम.पी. मानकों के अनुरूप नवीनीकरण के बाद संस्थान द्वारा आधुनिक तकनीक के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर के वर्तमान टीकों का उत्पादन करने के साथ ही अन्य टीका द्रव्यों का उत्पादन संभव हो सकेगा।
नस्ल सुधार कार्यक्रम
पशु नस्ल सुधार कार्यक्रम में पशुपालन विभाग द्वारा विभागीय, गैर सरकारी संगठनों की सहायता से संचालित एकीकृत पशुधन विकास केन्द्र, कृत्रिम गर्भाधान निजी कार्यकर्ताओं को सम्मलित करते हुए 5756 कृत्रिम गर्भाधान संस्था संचालित की जा रही हैं। इसी कड़ी में 500 कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया गया है। कार्यकर्ताओं को 4 माह के प्रशिक्षण के साथ-साथ आवश्यक उपकरण एवं मानदेय का भी प्रावधान रखा गया है।
नस्ल सुधार कार्यक्रम के सुदृढ़ीकरण विस्तार एवं आधुनिकीकरण के उद्देश्य से वर्ष 2012-13 में उच्च आनुवांशिक गुण वाले वत्सों के उत्पादन के लिये भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक प्रयोगशाला की स्थापना की गई। केन्द्रीय वीर्य संस्थान भोपाल की फ्रोजन सीमेन (डोजेज) उत्पादन क्षमता 11 लाख से बढ़कर 19.01 लाख पहुँच गई है। दतिया में भी नवीन सेन्ट्रल सीमेन स्टेशन की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। भोपाल केन्द्रीय वीर्य संग्रहालय में कृत्रिम गर्भाधान के लिये फ्रोजन सीमेन स्ट्रा के वितरण एवं स्टोरेज के लिये प्रभावी एवं कम लागत में कोल्ड चेन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जबलपुर, भोपाल, ग्वालियर एवं सागर में तरल नत्रजन उत्पादन संयंत्र की स्थापना की जा रही है।
पुरस्कार योजनाएँ
स्थानीय नस्ल को बढ़ावा देने एवं उच्च आनुवांशिक और उत्पादन वाले पशुओं का डाटाबेस एकत्रित करने तथा भारतीय देशी गौ वंश को प्रोत्साहित करने के लिये वर्ष 2011-12 में गोपाल पुरस्कार योजना एवं वर्ष 2012-13 में वत्स पालन प्रोत्साहन योजना शुरू की गई। इन योजना के कारण प्रदेश में भारतीय नस्ल की 20-20 लीटर वाली गायें उपलब्ध हैं। भारतीय नस्ल के गौ वंश की ओर पशुपालकों का रुझान बढ़ रहा है।
पोषण प्रबंधन
चिकित्सा एवं नस्ल सुधार जितने महत्वपूर्ण घटक हैं, उतना ही महत्वपूर्ण पशुओं का पोषण प्रबंधन भी है। इस दिशा में त्वरित चारा विकास कार्यक्रम में लाखों पशुपालकों को सम्मिलित करते हुए चारे का उत्पादन, नये पशु-आहार संयंत्रों का निर्माण एवं कठिन क्षेत्रों में फॉडर बैंक की स्थापना आदि का कार्य किया गया है। वर्तमान में पचामा (सीहोर), माँगलिया (इंदौर) एवं बंडोल (सिवनी) में पशु-आहार संयंत्र कार्यरत हैं। इनकी कुल उत्पादन क्षमता 350 मीट्रिक टन प्रतिदिन से बढ़ाकर 1000 मीट्रिक टन प्रतिदिन की जाने का लक्ष्य है। इसके लिये कीरतपुर, इटारसी, सागर तथा शिवपुरी में संयंत्र स्थापित किये जायेंगे। इसी तारतम्य में पशुपालन से संबंधित विभिन्न भागीदारों को एक साथ लाने तथा उनको एक दिशा में ले जाने के लिये पशुधन विकास नीति 2011 को अधिसूचित किया गया है।
गौ-शालाएँ
भारतीय गौ-वंश के संरक्षण एवं संवर्धन के लिये 628 गौ-शाला संचालित हैं। इसके साथ ग्राम सालरिया, जिला आगर में गौ-अभ्यारण्य की स्थापना की गई है। अभ्यारण्य में 5000 गौ-वंशीय पशुओं को रखे जाने की व्यवस्था है। जैविक खाद, कीटनाशक में शोध एवं उत्पादन के लिये पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर में संस्थान की स्थापना की गई है। इसी प्रकार की इकाई सालरिया के गौ-अभयारण्य में भी है।
पशुपालन शिक्षा सुविधाओं का विस्तार
पशुपालन के क्षेत्र में शिक्षा को बढ़ावा देने एवं पशुपालन से संबंधित अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से वर्ष 2007 में नवीन पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय की स्थापना रीवा और वर्ष 2009 में पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय की स्थापना जबलपुर में की गई। वर्ष 2011-12 से पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के अंतर्गत जबलपुर, महू, रीवा, मुरैना एवं भोपाल में पशुपालन विज्ञान में द्विवर्षीय डिप्लोमा शुरू किया गया।
कुक्कुट पालन
कुक्कुट पालन को बढ़ावा देने के लिए ग्रामीण बेकयार्ड, स्मॉल होल्डर पोल्ट्री, कड़कनाथ एवं बेकयार्ड कुक्कुट इकाई प्रदाय योजना संचालित है। इस दिशा में किये गये प्रयासों के फलस्वरूप वर्ष 2014-15 में अण्डा उत्पादन की वृद्धि दर 21.80 प्रतिशत प्राप्त की जा सकी है।
पशुपालन प्रशिक्षण संस्थान
भोपाल में राज्य पशुपालन प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किया गया है। इसका उद्देश्य पशु चिकित्सक, पैरावेट एवं अन्य शासकीय सेवकों की क्षमतावर्धन तथा उन्हें अत्याधुनिक तकनीक से अवगत करवाना है। संस्थान आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है। संस्थान में प्रमुख रूप से दो प्रकार के प्रशिक्षण दिये जायेंगे। पशु चिकित्सकों को तकनीकी विषय कृत्रिम गर्भाधान, पशु रोग, आधुनिक पशु प्रबंधन, पशुओं में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव आदि विषय का प्रशिक्षण दिया जायेगा। पैरावेट एवं अन्य संवर्ग के शासकीय सेवकों के लिये कार्यालय एवं सूचना प्रबंधन, ई-वेट प्रशिक्षण दिया जायेगा।

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