तालाब यानि वरुण देवता का प्रसाद

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महेशपुरराज से मेरा पुराना संबंध है। झारखंड-पश्चिम बंगाल की सीमा पर स्थित यह गांव पाकुड जिला (संथाल परगना) का एक पुराना प्रखंड है। सड़क मार्ग के अलावा पटना-हावड़ा लूप रेल लाइन पर बीरभूमि (पश्चिम बंगाल) के मुरारई स्टेशन से 10 कि.मी. की रास्ता तय कर भी यहां पहुंचा जा सकता है। एक जमाने में यह संताल परगना के ‘धान के कटोरेÓ के रूप में प्रसिद्ध था और यहां से सर्वाधिक राजस्व की वसूली होती थी पर अब हालात वैसे नहीं हैं। आज भी यहां पर राजाओं के बिखरे पड़े ध्वस्त महल, कचहरी, अस्तबल, मंदिर, नाचघर आदि पुरानी दास्तान बयां करते नजर आते हैं। पूर्व में सुल्तानबाद परगना के नाम से प्रसिद्ध यह इलाका घने जंगलों और जंगली जानवरों से भरा पड़ा था। यहां पहाडिय़ां आदिम जनजाति का बाहुल्य था जिसका अगुआ चांद सरदार था। जिला गजेटियर (1965) के अनुसार गोरखपुर (उ.प्र.) से आये खडग़पुर राजा के संबंधी अबू सिंह और बाकू सिंह ने यहां के स्थानीय जमींदार को परास्त कर इस पर कब्जा जमाया। बड़े भाई बाकू सिंह ने महेशपुरराज में अपनी राजधानी स्थापित की। सन् 1781 ई. में अंग्रेज कलेक्टर क्लीवलैंड के समय में यह पाकुड़ के अम्बर परगना के साथ राजशाही जिला (वर्तमान बांग्लादेश) से अलग कर भागलपुर जिला में ‘पहाडिय़ा उन्नयन योजनाÓ के तहत मिला दिया गया।
झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने संताल परगना दौरे के दौरान पाकुड़ में घोषणा की थी कि पेयजल संकट को दूर करने के लिये हर जिले को एक-एक करोड़ दिये गये हैं। संताल परगना में लंबित सिंचाई परियोजनाओं की बाधा दूर करने व चेकडैम, कुएं तथा तालाबों को बरसात के पहले पूरा करने हेतु जिला उपायुक्तों को आदेश दिये गये हैं। यह भी कहा गया कि पाकुड़ जिला सहित महेशपुरराज में बिजली आपूर्ति दुरुस्त कर दी जायेगी। इस एक ने टोका, बिजली वाली बात तो ठीक है। सरकार जोर लगायेगी तो हो जायेगा, पर सिंचाई योजनाओं का क्या? महेशपुर राज में ही करोड़ों रुपये खर्च कर बांसलोई नदी पर बासमती से लेकर सोलपटिया, धोबन्ना, बाबूपुर, इंग्लिश पाड़ा, लुढाई तक 20 जगहों पर लिफ्ट इरीगेशन की योजना शुरू की गई। कुएं बने, पम्प हाउस बने इंजीनियर से लेकर आपरेटर, नाइट गार्ड, खलासी तक की बहाली हुई।
मैं खड़े-खड़े पूरी बातें सुन रहा था। मन में आया क्यों न बांसलोई नदी को देखा जाये जिस पर बने लिफ्ट इरीगेशन की यहां चर्चा हो रही है। मैं सिंहवाहिनी मंदिर होते हुए बांसलोई नदी के किनारे पहुंच गया। नदी क्या, बस यूं कहें कि बालू का ढेर। चैत में ‘सावनÓ की मेहरबानी से इधर-उधर जल की महीन रेखाएं जरूर खिंच गई थीं। गोड्डा के बांस पहाड़ से निकलकर पछवारा, सिलंगी, कुसकिरा से महेशपुरराज होते हुए बांसलोई नदी मुरारई (प.बं.) पार कर भागीरथी में मिलती है। कभी यह संताल परगना की ‘जीवन रेखाÓ कहलाती थी। नदी के किनारे लिफ्ट इरीगेशन योजना के कुएं के टूटे बिखरे रिंग बदहाली की पूरी दास्तान बयां कर रहे थे।
जीवनदायिनी जल से हमारा जुड़ाव और लगाव दूर का हो गया है हमने कितनी उपेक्षा की है पानी व इसके प्रबंधन के साथ। सहसा मुझे याद आ गयी प्रख्यात पर्यावरणविद व गांधीवादी अनुपम मिश्र की पुस्तक आज भी खरे हैं तालाब की। हाल में निर्मित लिफ्ट इरीगेशन सरीखीं सिंचाई योजनाएं जब ‘डिलीवरÓ करने में खोटी साबित होती जा रही हैं , तो भी सदियों पूर्व हमारे पूर्वजों-पुरखों द्वारा निर्मित तालाब आज भी खड़े हैं लोगों की प्यास बुझाने व धरती का सीना तर करने के लिये? पंचायत के उप मुख्यिा अभिषेक सिंह ने बताया, महेशपुरराज और इसके आस-पास के जो भी तालाब आज कारगर हैं, वे सब यहां के राजाओं द्वारा निर्मित है पूरे प्रखंड में सबसे बड़ा तालाब है ‘हँस सरोवरÓ वह यहां से 13 कि.मी. दूर देवीनगर पंचायत में है।
धड़ल्ले से हो रही पेड़ों की कटाई और सीमित हो रहे वन क्षेत्र के इस दौर में भी देवीनगर में चतुर्दिक हरियाली है। देवीनगर में राजा उदय नारायण सिंह ने अपनी प्रजा के लिये हंस सरोवर का निर्माण करवाया था। वहां एक सुरंग के अवशेष भी दिखाई दिये। जो ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार वह यहां से 11 कि.मी. पूरब बिरकिट्टी गांव में निकलती है। हंस सरोवर के पास पहुंचा तो इसके बनावट की सुदंरता देख मन हर्षित हो उठा। तालाब के चारों ओर हरे-भरे पेड़ों की श्रृंखलाएं और जल पर पडि़त उनकी छाया मनोरम दृश्य उपस्थित कर रहे थे। लाल लखौरी ईंटों से बनी बड़ी-बड़ी कलात्मक सीढिय़ाँ इसकी सुंदरता बढ़ा रहीं थी। पहाड़ी व पथरीले संतालन परगना के इलाके में 41 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान के बावजूद तालाब में अच्छी मात्रा में पानी की उपलब्धता जल संचय-प्रबंधन के हमारे परम्परागत टिकाऊ सोच का जीता-जागता उदाहरण था। तालाब के चारों तरफ लगे वृक्ष हमारे पुरखों के जल के वाष्पीकरण को रोकने की वैज्ञानिक सोच को इंगित कर रहे थे। ब्रिटिश काल के अंग्रेज हुक्मरानों के ठसकों और हमारे मौजूदा हाकिमों के दंभ से परे एक राजा परिवार के हाथों से निकलकर दूसरों के हाथों में आ गया है। 40-50 बीघे में फैला यह तालाब अतिक्रमण की चपेट में आकर सिमटने लगा है। इस तरफ से मिट्टी भरकर तालाब-क्षेत्र को खेत में तब्दील करने का सिलसिला प्रारंभ हो चुका है।
उपेक्षा की इस आंधी के बावजूद आज भी कई तालाब खड़े हैं। देश भर में कोई आठ से दस लाख तालाब आज भी भर रहे हैं और वरुण देवता का प्रसाद सुपात्रों को भी बांट रहे हैं।

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