डिजीटलीकरण से भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान बढ़ेगा

भारत को 141 मिलियन हेक्टेयर खेती के साथ विश्व की चुनिंदा बड़ी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में चीन जैसे देश की बराबरी पर रखा जाता है। फिर भी कृषि उत्पादकता दर में वैश्विक प्रतिस्पर्धा में हम जापान जैसे छोटे देश के आस-पास ही पहुंच पाते हैं। हमें अपनी इस कमी को पूरा करने के लिए खेती की नई तकनीक के साथ उच्च कृषि मशीनरीकरण को भी बढ़ाना होगा। विश्व की श्रेष्ठतम ट्रैक्टर निर्माता कम्पनियों की भारत में उपस्थिति के बाद भी देश में कृषि मशीनरीकरण का    अभाव है।
लम्बे समय से भारतीय किसानों के लिए मशीनीकरण काफी दुर्लभ था, इसका सबसे बड़ा कारण उनका आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होना है। छोटी सी जमीन का मालिक होने तथा खेती की बढ़ती लागत के कारण छोटे और सीमान्त कृषक, जो कि हमारे कृषक आबादी का एक बड़ा हिस्सा है, उनके लिए ट्रैक्टर खरीदना  कठिन ही नहीं करीब-करीब असंभव सा है। भारत में बड़े खेतों के मालिकों के पास ही अपना ट्रैक्टर है। इसका अर्थ यह हुआ कि करीब 85 प्रतिशत किसान जो कि छोटे काश्तकार हैं, मशीनीकरण जरूरतों के लिए शेष 15 प्रतिशत बड़े किसानों पर निर्भर हैं। इससे स्वाभाविक है कि एक विशाल रेंटल बाजार स्वत: ही बन सकता है। कई छोटे किसान अपने खेतों की मशीनीकरण की जरूरतों को पूरा करने के लिए अन्य ट्रैक्टर मालिकों पर निर्भर रहते हैं। भारत में एक बड़ी औपचारिक किराए की प्रथा मौजूद है, लेकिन उसकी अपनी समस्याएं हैं। गुणवत्ता मापदण्डों की कमी, समय का पालन नहीं करना, पुराने उपकरण, जमीन के आकार के आधार पर भेदभाव जैसी कुछ समस्याएं इसके विकास में बाधक बनी हुई हैं।
आमदनी दूनी की कुंजी मशीनीकरण
सरकार का ध्यान किसानों की आय दोगुनी करने पर केन्द्रित है, खेती में मशीनीकरण को इसकी प्रमुख कुंजी कहा जा सकता है। कृषि उपकरणों के लिए कस्टम हायरिंग सेन्टर्स की स्थापना पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए, साथ ही पूंजी निवेश पर सब्सिडी जैसे लाभ अगर मिलने लगे तो निजी क्षेत्र  की भागीदारी भी बढ़ सकती है, और इस कारोबार में भी सघन डिजीटल क्रांति देखने को मिल सकती है। अनेक निजी उद्यमी, बड़े किसानों के साथ ही निजी कम्पनियां कृषि उपकरण किराए पर देने के कारोबार को एक बड़ा व्यापार मानती है और इससे किसानों के जीवन को बदलने का भी एक अवसर मिल सकता है।
कृषि यंत्र किराये पर
कृषि उपकरण किराए पर देने वाले केन्द्र, उच्च स्तरीय उपकरण प्रति घंटा की दर से किराए के आधार पर किसानों को उपलब्ध करवा रहे हैं। इसके साथ ही प्रशिक्षित एवं पेशेवर चालक एवं मैकेनिक भी उपलब्ध हैं जो कि भारत के छोटे किसानों के लिए किसी रामबाण से कम नहीं है।
इस प्रकार के कुछ केन्द्र ग्राम स्तर पर भी उपलब्ध हैं, किसानों को तो बस वहां जाने भर और आदेश देने की देर है जहां किसान उच्च स्तरीय यंत्र प्राप्त कर सकते हैं जो उन्होंने पहले कभी उपयोग नहीं किए। केवल उपकरण ही नहीं, वे अपने घर कोई भी पेशेवर सेवा प्राप्त कर सकते हैं, इसलिए कृषि उपकरणों को एक सेवा उत्पाद के रूप में देखें। यह अब भारत के किसानों के निहितार्थ उपलब्ध हैं।
मशीनीकरण के लिए निर्भरता खत्म
अब किसानों को अपने खेतों में मशीनीकरण के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहना होगा। वे श्रेष्ठतम सेवाएं पा सकते हैं और उसके लिए उन्हें भुगतान करना होगा। यह भुगतान भी उपयोग के आधार पर निर्भर होगा और सबसे महत्वपूर्ण यह कि वे कम से कम किराए पर बेहतर से बेहतर उपकरण प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि जमीनी स्तर पर इस इस प्रकार के सही बदलाव में अभी थोड़ा समय लगेगा। ऐसे में जबकि निजी उद्यमी बड़ी सावधानी के साथ इस क्षेत्र में कारोबार कर रहे हैं।
सरकार का सहयोग जरूरी
सरकार को भी चाहिए कि मशीनीकरण के प्रति उनकी सोच को बदलें, केन्द्र के साथ ही राज्य स्तर दोनों पर अभी भी बहुत किए जाने की संभावना है। उदाहरण के लिए पुराने नियमों को छोड़कर जैसे कि रेट कॉन्ट्रेक्ट को हायरिंग सेन्टर्स पर लागू किया जाए कि केवल वही उपकरण रखे जाएं जो सरकार से स्वीकृति प्राप्त हो। इस प्रकार के प्रतिबंध उच्च स्तरीय हो, किसानों को अच्छी गुणवत्ता वाले उपकरण मिल सकें तथा सही मायनों में मशीनीकरण के स्तर को सुधारा जा सके।
वास्तव में देखा जाए तो इस क्षेत्र में निजी कम्पनियों और स्टार्टअप के प्रवेश से क्रांति की शुरुआत भर हुई है। कॉॅल सेन्टर्स एवं मोबाइल एप के माध्यम से कृषि उपकरण किराए पर देने की पेशकशों के डिजीटल उपयोग से भारतीय कृषि मशीनीकरण में भारी परिवर्तन आ सकता है, और भारतीय किसान इस डिजीटल चक्र की धुरी बन सकते हैं।

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