टमाटर में रोग नियंत्रण के उपाय

डेम्पिग ऑफ : पीथियम फाइटाफ्थोरा एवं राइजोक्टोनिया नामक फफूंदों के मिले-जुले संक्रमण से यह रोग होग होता है। सर्वाधिक संक्रमण पीथियम नामक फफूंद से होता है कृषक इस रोग को स्थानीय स्तर पर कमर तोड़ रोग के नाम से पुकारता है। यह रोपणी में लगने वाला प्रमुख रोग है एवं टमाटर के अलावा अन्य फसल जैसे मिर्च गोभी आदि में भी यह आता है।
प्रमुख लक्षण: इस रोग के लक्षण पौधों पर दो रूप मे दिखाई देता है । बीज अंकुरित होकर भूमि की सतह से निकलने के पूर्व संक्रमित होकर नष्ट हो जाते हैं। जिससे रोपणी में ऐसा प्रतीत होता है कि बीज अंकुरित हुआ है अंकुरण के पश्चात पौधे के तनों पर इस रोग का आक्रमण होता है एवं तने का विगलन होने पर पौधे भूमि की सतह पर लुड़क कर नष्ट हो जाता है। रोपणी में पौधों की घनी बुवाई एवं आवश्यकता से अधिक नमी की उपलब्धता इस रोग को बढ़ाने में सहायक होते हंै।
नियंत्रण के उपाय: रोपणी का स्थान हर वर्ष बदल दें एवं रोपणी स्थल को या तो सूर्य ऊर्जा से या फार्मेलिन 1 भाग एवं 7 भाग पानी से उपचारित करें।  बीज का केप्टान (3 ग्राम/कि.ग्रा.बीज) या कार्बेंडाजिम 2 ग्राम प्रति कि. ग्रा. बीज  उपचारित  करें।  बीजों की बुवाई कतार में करें एवं वायु संचार एवं खरपतवार प्रबंधन हेतु सावधानीपूर्वक गुड़ाई करें। जल प्रबंधन उत्तम होना चाहिए । अतिरिक्त जल रोग के संक्रमण एवं प्रसार में सहायक होती है। संक्रमण होने पर रोगग्रस्त पौधों को नष्ट करें नमी यथा संभव कम करें एवं ताम्रयुक्त कवकनाशियों में से एक का चयन कर 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से रोपणी का सिंचन करें ।
फल सडऩ : इस रोग का संक्रमण सामान्यत: कच्चे एवं हरे फलों पर दिखाई देता है। प्रभावित फलों पर हल्के या गहरे भूरे रंग के गोलाकार धब्बे चक्र के रूप में दिखाई देते हैं जो हिरण की आंख की तरह लगते है। रोगग्रस्त फल प्राय: जमीन पर गिर कर सड़ जाते हैं। ये सड़े फल रोगजनक एवं फफूंद की वृद्धि कर संक्रमण को बढ़ाते हैं ।
नियंत्रण के उपाय:- पौधों को लकड़ी या तार की सहायता से सीधा खड़ा करे। भूमि की सतह पर 15 से 20 सेमी. तक की पत्तियों को तोड़ दें। जल प्रबंधन उत्तम रखें एवं अतिरिक्त पानी की निकास करें सुनिश्चित करें । रोग ग्रस्त फलों कों एकत्र कर नष्ट करें। खरीफ  या वर्षा के मौसम में संक्रमण के पूर्व ही मैन्कोजेब या कापर ऑक्सीक्लोराईड 2.5 ग्राम प्रति लीटर में पानी का छिड़काव करें। फसल लगने पर मेटालेक्जिल, मेन्कोजेब या कार्बेंडाजिन, मेंन्कोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें।
पिछेती अंगमारी (झुलसा) :  फाइटोफ्थोरा इन्फेसटान्स नामक रोग जनक फफूंद से होने वाले यह रोग टमाटर एवं इस फूल की सब्जियों के लिये अत्यंत घातक हैं।  अधिक नमी एवं कम तापमान होने पर यह रोग महमारी के रूप मे फैलता है। आरंभिक लक्षण के रूप में पत्तों पर गहरे भूरे रंग के अनियमित आकार के धब्बे बनते हैं। जो प्रगत अवस्था में आपस में मिलकर बड़े धब्बे गहरे काले रंग के बनाता है। अनुकूल परिस्थितियों में संपूर्ण पत्तियां झुलस कर गहरे काले रंग की दिखाई देती है ।
नियंत्रण के उपाय : फसल चक्र रोगग्रस्त पौधों को नष्ट करना, संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों की पूर्ति करना, उचित सिंचाई जल निकास का प्रबंधन करना एवं आवश्यकता होने पर मेंकोजेब (25 ग्राम/10 लीटर पानी ) या कापर आक्सीक्लोराइड (30 ग्राम/10 लीटर पानी ) का छिड़काव करें।
अगेती अंगमारी : आल्टरनेरिया सोलेनाई नामक रोग जनक फफूंद से होने वाले इस रोग में पत्तों पर गहरे भूरे रंग के गोलाकार चक्रनुमा धब्बे बनते हैं जो लक्ष्य पटल की तरह दिखाई देते हैं। नम वातावरण में ये धब्बे आपस में मिल जाते हैं और गहरे भूरे रंग के हो जाते है। पत्ते समय से पहले पीले पड़    जाते हैं।
नियंत्रण के उपाय: इस रोग का प्रबंधन पिछेती अंगमारी रोग प्रबंधन की तरह करें।
भभूतिया रोग: एरिसिफे साइकोरेसिरेयम नामक रोग में पत्तों की निचली सतह पर सफेद चूर्णी धब्बे दिखाई देते हैं जिसके अनुरूप पत्तों की ऊपरी सतह पीली पड़ जाती है । प्रभावित पतित्यां पीली पड़कर समय से पूर्व झड़ जाती है।
नियंत्रण के उपाय : पिछेती अगंभारी प्रबंधन के गैर रसायनिक उपायों को अपनाते हुये रासायनिक प्रबंधन के अंतर्गत हेक्जाकोनेजोल (5 मि.ली./ 10 लीटर पानी) का छिड़काव करें। तत्पश्चात् आवश्यकता अनुसार डिनोकेप  (6 मि.ली./10 लीटर पानी) छिड़काव करे।
जीवाणु जन्य उकठा रोग : राल्सटोनिया सोलेनिसियेरम नाम रोग जनक जीवाणु द्वारा होने वाला यह रोग अत्यंत घातक है। जब फसल पूर्णत: विकसित होकर पूरी क्षमता से उत्पदान देने की स्थिति में आता है तो अचानक स्वस्थ पौधे बिना किसी पीलेपन या धब्बे आदि के नीचे की तरफ झुक कर पूरा पौधा मुरझा जाता हैं एवं अन्त में नष्ट हो जाता हैं।
जीवाणु रोग प्रबंधन : फसल चक्र, संतुलित उर्वरक प्रबंधन एवं जल प्रबंधन रोग ग्रस्त पौधों को नष्ट करना आदि उपायों के अतिरिक्त स्टेप्टोसाइक्लिीन 1 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी के घोल में रोपणी से पौधे निकलने के दिन पूर्व रोपणी सिंचन कर पौधों  को उपचारित करें। खेत तैयार करते समय 15 कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से ब्लीचिंग पाउडर खेत में मिलाये । खेत में रोग के लक्षण देखते ही स्ट्रेपटोसाईक्लिन (1 ग्राम/10 लीटर पानी) का छिड़काव एवं 7 दिन के पश्चात् कापर ऑक्सीक्लोराईड (30/10 लीटर पानी) का छिड़काव करें।
विषाणु रोग : टमाटर की फसल में विषाणु जन्य मोजेक एवं लीफकर्ल रोग बहुतायत से आते हैं। इन रोगों के कारण पत्तियां सिकुड़ कर छोटी हो जाती हैं। मुड़ कर विकृत हो जाती हैं एवं पत्तीयों में अनियमित आकार के पीले धब्बे बन जाते हैं। रोग ग्रस्त पौधे बौने हो जाते हैं। फूल एवं फलों की संख्या अत्यन्त कम हो जाते हैं। फल अत्ंयंत विकृत एवं गुणवत्ताहीन होते है।
नियंत्रण के उपाय : संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों का प्रबंधन करें । रसचूसक कीट सफेद मक्खी, थ्रिप्स एवं माहू के प्रभावी प्रबंधन हेतु रोपणी में मच्छरदानी लगा कर पौधा तैयार करे। फसल को खरपतवार एवं रोगग्रस्त पौधों से मुक्त रखें। रोग सहनशील प्रजातियों का चयन करे । पौध संख्या अधिक नही रखे एवं रस चूसक कीट के प्रबंधन हेतु मैलाथियान या डेल्टामेथ्रिन (10 मि. ली./10 लीटर पानी में या इमीडाक्लोप्रिड 5 मि.ली./10 मि.ली.) पानी का छिड़काव करें।
पोशकीय विकार : कैल्शियम तत्व की कमी के कारण फलों की कली की छोर वाले भाग पर पनीले धब्बे उभर आते हैं तथा प्रभावित भाग अन्दर धस जाता है और गहरे रंग के हो जाते हंै इस समस्या के प्रबंधन हेतु फल बनने की अवस्था में कैल्शियम क्लोराइड (50 ग्रा./10 लीटर पानी) का छिड़काव करें। इसके अतिरिक्त सुहागे एवं चूने की कमी के कारण फलों में दरार पडऩा एक प्रमुख समस्या है इससे बचाव हेतु 30-40 ग्राम बोरेक्स/10 लीटर पानी का छिड़काव करें ।

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