जैविक या जीरो सरकार बताएं कौन सी खेती करे किसान ?

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(विशेष प्रतिनिधि)
भारत में खेती में बढ़ते रसायनों के दुष्प्रभावों के दुष्प्रचार के बाद देश में डिजायनर खेती या फैशनेबल खेती का प्रचलन बढ़़ता जा रहा है। अनेक उपदेशक, प्रचारक संत-महात्मा लोग भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी खेती कर रही किसानों की बिरादरी को जैविक खेती, परम्परागत खेती, प्राकृतिक खेती, आध्यात्मिक खेती, विष रहित खेती ऐसी अनेक पद्धतियों के बारे में गरिष्ठ ज्ञान परोस रहे हैं। इन तथाकथित उपदेशकों के पास फसल उत्पादन के बाद विपणन का मंत्र नहीं है, लाभ का फार्मूला नहीं है। हाल ही में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में तीन दिन ‘खेती का जीरो बजट’ पर कार्यशाला हुई। राजधानी के लाल परेड ग्राउंड में पूरे प्रदेश से सरकारी खर्च पर बुलवाए गए किसानों को खेती के नए फंडे समझाए गए। इस जीरो बजट के तीन दिनी कर्मकांड में सरकार ने करोड़ों फूंक दिए। प्रवचनकर्ता ने अपने फार्मूले की सीडी ही 8-8 सौ में बेच कर वारे -न्यारे कर लिए। एक केन्द्रीय मंत्री के दबाव में हुए इस आयोजन में सत्तारूढ़ पार्टी सक्रिय थी और पद्मश्री प्रवचनकर्ता के ‘नागपुर कनेक्शन’ की भी चर्चा रही।
           
ऊपरी दबाव में शून्य बजट खेती के प्रवर्तक सुभाष पालेकर के लिये रेड कार्पेट बिछाना विभाग के गले की हड्डी बन गया है। पालेकर ने 30 बरस से जैविक खेती के लिये किये जा रहे विभागीय प्रयासों को तीन दिन में मिट्टी कर दिया। कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन के साथ, पालेकर प्रदेश भर के कृषि अधिकारियों के मुंह पर जैविक खेती की आलोचना करते रहे। विभागीय कार्यप्रणाली को भी उन्होंने पानी पी-पीकर कोसा लेकिन कोई चूं भी नहीं कर पाया।
प्रवचनकर्ता की शाही फौज
पालेकर ने कहा कि जैविक खेती, रसायनिक खेती की तरह ही हानिकारक है। विभाग द्वारा जैविक खेती के नाम से किसानों को बरगलाया जा रहा है। जबकि उनका शानदार मंच के साथ शाही स्वागत हुआ। 150 लोगों की फौज पालेकर खुद लाये, जिन्हें अच्छे होटलों में ठहराया गया। इनकी जोरदार खातिरदारी हुई। उन्होंने अपने उत्पादों और किताबों की दुकानदारी भी अच्छी तरह से की। 1700 रुपये की जीवामृत किट और 2500 रुपये की शून्य बजट किताबों का सेट किसानों व सरकारी अधिकारियों को बेचा गया। प्रवचनकर्ता के दबदबे के कारण विशाल पंडाल में तीन दिन तक सरकारी काम छोड़कर बैठे उपसंचालकों और पीडी आत्मा, मन मसोस कर विभाग के खिलाफ झिड़कियां सुनकर खिसियानी हंसी हंसते रहे। वहीं किसानों को यह खिल्ली उड़ाना बड़ा पसंद आया। उन्होंने साथ मिलकर ठहाके लगाये। उन्होंने मंत्री, सांसद और किसी भी अधिकारी को जैविक का नाम तक लेने से मना कर दिया था।  पालेकर ने नया क्या कहा-यह किसी को पल्ले नहीं पड़ा। उनका बताया घनामृत, दश पर्ण काढ़ा, फसल अवशेषों को रोटावेटर से भूमि में दबाया जाना आदि तो पहले से ही जैविक खेती के अंग में सम्मिलित था।
गोबर खाद प्रदूषणकारी ?
विद्वान विशेषज्ञ ने गोबर की खाद को प्रदूषणकारी बताया। उन्होंने कहा कि इससे निकली मीथेन ओजोन परत को नुकसान पहुंचाती है। जबकि उनका बताया घनामृत भी गोबर से बना हुआ है। वे भूल गये कि सर्वाधिक प्रदूषण उद्योगों से तथा कृषि रसायनों से बढ़ रहा है। किंतु उन्हें गोबर में ही ज्यादा खोट नजर आई। दूसरी ओर 30 एकड़ खेती के लिये एक गाय की जरूरत होने की अवधारणा से किसान भी सहमत नहीं थे। उन्होंने अपने पक्ष में कई किसानों को खड़ा कर सफलता की बड़ी-बड़ी कहानियां सुनाई जो गढ़ी हुई सी लगीं। क्योंकि यही किसान जैविक खेती के मंचों पर भी यही कहानी सुनाते हैं। जिस किसान ने भी अपनी सफलता में जैविक खेती का नाम लिया, उसके मुंह से शब्द छीनकर प्रवचनकर्ता पालेकर शून्य बजट उगलवाते रहे। उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट का भी विरोध यह कहकर किया कि उसे देशी केंचुओं से निर्मित होना चाहिए। किसी  किसान ने टिप्पणी की कि केंचुओं का पासपोर्ट देखकर वर्मी कम्पोस्ट कैसे बनाया जाये। केंचुओं की किस्म आइसीनिया फोटिडा सबसे अच्छी तरह से वर्मी कम्पोस्ट बनाने के लिये प्रचलित है, जिसका घोर विरोध इस मंच ने किया। हालांकि विचारणीय है कि बरसों से इस देश और प्रांत की मिट्टी अपनाने वाले केंचुओं में अब विदेशीपन कितना शेष होगा। पालेकर यह कैफियत भी कैसे देंगे  कि वर्मी कम्पोस्ट के निर्माण में केंचुओं की किस्मों से कैसे दोष उत्पन्न हो सकता है। जबकि उन्हें जो पोषण प्राप्त हो रहा है, वो देसी गोबर, कचरा और मिट्टी वही है जो अन्य केंचुओं को भी मिल रही है।
समय की बर्बादी
जीरो बजट खेती  का यह कार्यक्रम तीन दिन के स्थान पर तीन घंटे में भी सिकुड़ सकता था। किंतु वे किसी क्लास टीचर की तरह किसानों को एक-एक शब्द का इमला बोलते रहे। वे हर फसल के लिये घनामृत की मात्रा और डालने का समय रटाते रहे। इसकी जगह एक साधारण सा चार्ट यदि किसानों को दे दिया जाता तो दो दिन का समय व खर्च बचाया जा सकता था।
मंच से बताई अन्तरवर्तीय खेती में सोयाबीन में कतार से कतार की दूरी ढाई फिट बताई गई। इसके साथ कोई अन्य फसल की कतार साढ़े चार फिट पर। इसे अपनाना है तो कृषि यंत्र का प्रयोग संभव ही नहीं हो सकेगा। इसी तरह से एक साथ कई फसलों को कतार में अलग-अलग दूरी पर बोये जाने से जो व्यवहारिक कठिनाइयां होंगी, उसका निराकरण आसान नहीं दिखता। यदि विभाग उनकी अनुशंसाओं को अपनाने बैठ जाये तो कृषि यंत्रीकरण आधुनिक खेती, नये बीज, संतुलित उर्वरक, सिंचाई आदि के कार्यक्रम ठप हो जायेंगे। प्रदेश के कृषि विभाग की आवश्यकता ही नहीं होगी। पालेकर उन्नत जाति के बीजों की खिलाफत करते हुए केवल देसी बीजों के प्रयोग पर बल देते हैं। वे कह गये कि यदि कृषि अधिकारी आपको मुफ्त में भी उन्नत बीज दें तो मत लीजिये क्योंकि शून्य बजट खेती केवल देसी बीजों से ही संभव है। खेती शून्य बजट कैसे हो सकती है? क्या अपने पास उपलब्ध बीज की कीमत शून्य हो सकती है? क्या श्रम, सिंचाई तथा विपणन आदि के लिये किसानों को कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ेगा? पालेकर तो कहते हैं कि शून्य बजट से उत्पादित अनाज का मूल्य 4-5 गुना अधिक हो सकता है। जैसे कि गेहूं 60-70 रुपये किलो। पता नहीं वे किसान के अनाज की सप्लाई किस अम्बानी के यहां करवाने वाले हैं?
प्रदेश जैविक खेती में आगे
1996-97 से प्रदेश में जैविक खेती ने एक आंदोलन का रूप लिया। इस दौरान राष्ट्रीय स्तर से लेकर विकासखंड स्तर तक कई संगोष्ठियां और अन्य कार्यक्रम  हुए। पदयात्राएं निकाली गईं, जैविक सेना बनी। खेत से लेकर शमशान तक नाडेप और वर्मी कम्पोस्ट बना दिये गये। पहले सभी विकासखंड, फिर प्रत्येक वि.ख. में 3-3 फिर 5-5 गांवों को जैविक ग्राम बनाया गया। सरकारी प्रक्षेत्रों में 50 प्रतिशत जैविक खेती करने के आदेश दिये गये। उमा भारती जैविक खेती की प्रबल समर्थक थीं। उनके बाद शिवराज ने भी प्रदेश में जैविक खेती को भरपूर प्रोत्साहित किया। महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा से लेकर अब तक जितने भी कृषि मंत्री और संचालक रहे हैं वे सभी जैविक खेती के हिमायती ही रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला इंदौर में और शेरपुरा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रदेश की जैविक खेती को उपलब्धि बताने के बाद, कुछ समय से जैविक के प्रचार-प्रसार में आई सुस्ती को दूर कर विभाग फिर जैविक खेती को पुख्ता करने में जुट गया था।
इस जीरो बजट खेती के आयोजन पर लाखों रुपये खर्च हुए। यदि बाहर से आने वाले किसानों का किराया-भाड़ा और अधिकारियों का टीएडीए आदि भी जोड़ा जाये  तो आंकड़ा करोड़ के पार निकल जायेगा। क्या इसी तरह से होती है शून्य बजट खेती? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। ये अलग खोज का विषय नहीं है कि इस आयोजन में किन लोगों की पौ-बारह हुई है।

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