जायद की तिल लगायें

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भूमि- दोमट, हल्की चिकनी एवं कछारी भूमि तिल की खेती हेतु उपयुक्त होती है।
खेत की तैयारी- अच्छी जुताई कर भुरभुरी मिट्टी वाला समतल खरपतवार रहित खेत तैयार करें। सिंचाई हेतु नालियों एवं क्यारियों की व्यवस्था करना चाहिए।
बीज की मात्रा एवं बीजोपचार- 5-6 किग्रा/ हे. की दर से उन्नत किस्म के प्रमाणित कार्बेन्डाजिम (2 ग्राम/किग्रा) फफूंदनाशी से बीजोपचार कर बोयें। बीजों के समान वितरण हेतु बीज : गोबर की खाद (2:20) मिलाकर बोनी करें।
उन्नत किस्में- ग्रीष्म ऋतु हेतु तिल की अनुशंसित किस्में टीकेजी-22, टीकेजी-55, जेटीएस-8, टीकेजी-306 फरवरी के तृतीय से चतुर्थ सप्ताह में बोयें। बोने में कतारों से कतारों की दूरी 12 इंच तथा पौधों से पौधों की दूरी 4 इंच रखने से उपयुक्त पौध संख्या 3 लाख / हे. प्राप्त होती है।
खाद एवं उर्वरक- गोबर की 10 टन खाद/ हेक्टेयर तथा रसायनिक उर्वरक 60:40:20 किग्रा नत्रजन:फास्फोरस:पोटाश/ हेक्टेयर की दर से डालें। स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा और नत्रजन की आधी मात्रा बोनी के समय तथा शेष आधी नत्रजन की मात्रा बोने के 3-4 सप्ताह बाद डालें।
निराई-गुडा़ई- बोने के 15-20 दिन बाद निराई-गुड़ाई करें और उसी समय अनावश्यक घने पौधे को निकाल दें।
सिंचाई- जायद मौसम हेतु ऐसी किस्मों का चयन करें। जो कम पानी व कम समय में अधिक उत्पादन दे। सामान्य तौर पर मई-जून में 7 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए तथा सिंचाई सुबह-शाम करें। फूल आने तथा फलियां बनते समय तिल की फसल में सिंचाई अत्यंत आवश्यक है।
कीट नियंत्रण- तिल को पत्ती मोड़क एवं फली बेधक कीट पौधों की पत्ती अवस्था में एवं फूलों के अंदर घुसकर भीतरी भाग खाकर एवं फल्ली में छेदकर फसल को नुकसान पहुंचाती है। क्विनालफॉस 25 ईसी (2 मिली/ली.) या डाइमेथियेट (1 मिली/लीटर) का आवश्यकतानुसार छिड़काव करें।
रोग नियंत्रण- तिल की फसल में तना एवं जड़ सडऩ रोग, आल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग का प्रकोप होता है साथ ही पर्णभाग रोग का प्रकोप होता हैं जिसमें फूल हरे पत्तियों में बदल जाते हंै। अधिक शाखायें और छोटी पत्तियां गुच्छों में होती है। रोग नियंत्रण हेतु उपयुक्त फसल चक्र अपनायें। कीट/ रोग से ग्रसित पौधों के भाग को तोड़कर/उखाड़कर तथा इल्लियों को इकटठा कर नष्ट करें। डायथेन एम-45 (2.5 ग्राम/ली.) मिलाकर बोने के 30 और 60 दिन पर आवश्यकतानुसार छिड़काव करें।
कटाई और गहाई- पत्तियां पीली होकर झडऩे लगें तथा फलियां हरी हो तभी तिल की कटाई करंे। कटी फसल को लकड़ी के सहारे रखकर अच्छी तरह सुखायें। सूखे पौधों को छडिय़ों से पीटकर गहाई करें।
उपज- 700-800 किग्रा/ हेक्टेयर होती है।

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