जलवायु परिवर्तन कारण और परिणाम

पृथ्वी पर एक समय ऐसा भी था जब लोग निसर्ग चक्र के अनुरूप ही जीवन जीते थे। ऋतुओं का पहिया निर्धारित गति के साथ निर्बाध गति से घूमता था, कहीं कोई उलट फेर नहीं था। जीवन सहज था। जिस तरह नदी का धरा के साथ, चिडिय़ा का पेड़ों के साथ, तितली का फूलों के साथ जीवंत संबंध होता था उसी तरह मनुष्य का प्रकृति के साथ रागात्मक संबंध था। परंतु मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ यह संबंध धीरे-धीरे कमजोर होता चला गया।
हम अपने ही जीवन काल में यह विनाश लीला देख रहे हैं। प्राणवायु मर रही है, जनसंख्या गुब्बारे की तरह फूल रही है, सैकड़ों जीव प्रजातियां पूरी तरह विलुप्त हो रही हैं, नित नये उपकरण जगह घेरते जा रहे हैं, सड़क पर ही नहीं आकाश पर भी यातायात संकुल होता जा रहा है, शब्द शोर में बदल गए हैं। भूकंप, बाढ़, सूखा एक आम खबर बनकर रह गयी है। ऐसे में यदि हमें अपने अस्तित्व को बचाना है तो हवा, पानी और जलवायु की चिंता करना जरूरी है।
जलवायु परिवर्तन की चर्चा अभी तक कुछ ऐेसे अंतर्राष्ट्रीय संदर्भों से घिरी रही है जिन्हें भारत का आम नागरिक अपने जीवन के साथ आसानी से नहीं जोड़ता। जलवायु परिवर्तन की अंतर्राष्ट्रीय बहस में दरारें हैं। कल तक जिन देशों को विकासशील कहा जाता था, उनमें से आज कई या तो पूरी तरह विकसित की श्रेणी में आ चुके हैं या उनके समाज का एक हिस्सा इस कोटि में आ चुका है। विकसित होने का अर्थ औद्योगिकता के दौर में धनी हो चुके देशों का अनुगामी होना है।
महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में कहा था ‘व्यक्तिगत उपभोग के यूरोपीय मापदंड को भारत में अपनाने पर भीषण स्थिति पैदा होगी।Ó दैनिक जीवन की आवश्यकताओं से लेकर विलासिता की तमाम सुविधाओं पर नजर डालें तो यूरोप और अमेरिका के मानक काफी भयानक लगते हैं। इन मानकों की आड़ में हमारे देश के संपन्न वर्ग में एक बेखबर, बर्बर, जीवनशैली पनप रही है, कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह के लोग पढ़े-लिखे धनी वर्ग के होते हैं। अखबारों की खबरों के अनुसार जून 2010 का महीना सन् 1890 के बाद सबसे ज्यादा गरम महीना रहा है। नोबल पुरस्कार प्राप्त अल-गोर का प्रसिद्ध पुस्तक एन इनकन्वीनियंट ट्रूथ बताती है कि सन् 2005 अब तक का सबसे गर्म साल रहा है। अप्रैल के महीने में जब गर्मी दस्तक देती है तब अचानक बारिश होना और सर्द हवायें बहना, दिसंबर के महीने में, आम के पेड़ों पर बौर आ जाना, मुंबई में 24 घंटों में 37 इंच बारिश होना। अगस्त 2006 में भोपाल जैसे शहर में बाढ़ आ जाने जैसे अजीब वाकये उस बड़ी घटना के छोटे-छोटे संकेत हैं जिसे दुनिया ग्लोबल वार्मिंग के नाम से पुकारती है।
ग्लोबल वार्मिंग के तहत धरती का तपना, पृथ्वी का गरमाना उतना ही घातक और खतरनाक साबित हो सकता है जितना परमाणु युद्ध। पिछले कई दशकों से वैज्ञानिक लगातार इस संकट से आगाह कर रहे थे और बता रहे थे कि धरती पर मौसमी उथल-पुथल मच सकती है। पर अब आगाह करने की जरूरत नहीं है, मौसमी उलटफेर की विपदा धरती पर उतर आयी है। धरती का पारा ऊपर चढ़ाने के लिये हम और हमारी जीवन व कार्यशैली जिम्मेदार है। अधिक से अधिक सुविधायें जुटाने की होड़ में मनुष्य प्रकृति के दोहन में जुटा है। नतीजतन, वायुमंडल में कुछ गैसों की, जिन्हें ग्रीन हाऊस गैस कहते हैं, मात्रा इतनी बढ़ गयी कि धरती पर आने वाली सूरज की गर्मी वापस वायुमंडल में नहीं जा पाती। धरती के गर्माने की इस मुख्य वजह को वैज्ञानिक ‘ग्रीन हाउस प्रभावÓ कहते हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि विश्व की औद्योगिक क्रांति से पूर्व की तुलना में आज वायुमंडल में प्रमुख ग्रीन हाऊस गैस, कार्बन डाय आक्साइड की मात्रा 30 से 40 प्रतिशत ज्यादा है। तमाम चेतावनियों, कोशिशों एवं अंतर्राष्ट्रीय संधियों के बावजूद हवा में ग्रीन हाऊस गैस घुलने की मात्रा बढ़ती जा रही है। मौसमी बदलाव या जलवायु परिवर्तन पर अंकुश लगाने के लिये यूं तो कई अंतर्राष्ट्रीय समझौते और संधियां हुई हैं पर 1997 का क्योटो प्रोटोकाल सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध है। इसमें ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के सभी प्रावधान मौजूद हैं। सारी दुनिया ने इस संधि को मान्यता दी है, सिर्फ अमेरिका को छोड़कर। अब यह संधि भी बीते दिनों की बात हो गयी है। इस मुद्दे पर दुनिया ने एक होकर कदम नहीं उठाया तो हमें अपने अस्तित्व के लिये कठिन संघर्ष करना होगा। जलवायु परिवर्तन के लिये जिम्मेदार कारकों को नियंत्रित करने तथा व्यापक जनचेतना के माध्यम से जीवनशैली को परिवर्तित करने में हमारी महत्वपूर्ण भूमिका है। इस वैश्विक समस्या के उपाय नितांत स्थानीय हैं। (सी.एन.एफ.)

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