घट सकती है गेहूं की खरीदी

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(अतुल सक्सेना)
भोपाल। चालू विपणन वर्ष में समर्थन मूल्य पर गेहूं की ख्ररीदी घटने की संभावना है। देश एवं प्रदेश में बेमौसम बरसात तथा ओलावृष्टि को इसका मुख्य कारण माना जा रहा है। इस कारण ही देश में कुल 189 लाख हेक्टेयर की फसलें प्रभावित होने का अनुमान लगाया गया है। जबकि पूर्व में 94 लाख हेक्टेयर में नुकसान होने का आकलन किया गया था। बेमौसम बरसात एवं ओलावृष्टि के कारण ही उत्तर भारत के गेहूं उत्पादक राज्यों में फसल कटाई देर से शुरू हुई, तथा गेहूं की गुणवत्ता पर भी असर पड़ा। हालांकि सरकार ने चमक विहीन एवं टूटेे दाने का गेहूं भी खरीदने के लिये मानकों को शिथिल किया है। फिर भी खरीदी रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है। देश में 305 लाख टन खरीदी लक्ष्य के विरूद्ध अब तक मात्र 158 लाख टन गेहूं खरीदी हो पायी है जबकि गत वर्ष इस अवधि में 169 लाख टन गेहूं की खरीदी कर ली गई थी। वहीं म.प्र. में 80 लाख टन के विरूद्ध मात्र 60 लाख टन गेहूं खरीदी की संभावना जताई जा रही है क्योंकि अब तक मात्र 42 लाख टन गेहूं की खरीदी की गई है। साथ ही प्रदेश में कुल 5.70 लाख हेक्टेयर की फसल को नुकसान पहुंचा है।

देश में अब तक खरीद एजेंसियों ने 158.61 लाख टन गेहूं की खरीद की है। जबकि पिछले साल की समान अवधि में 169.29 लाख टन गेहूं खरीदा गया था। चालू सीजन में गेहूं खरीद 305 लाख टन तक होने का अनुमान था लेकिन भारी बारिश और ओलावृष्टि के कारण इसमें 13 फीसदी तक की कटौती हो सकती है। केंद्रीय खाद्य मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक खरीद के अनुमानों में कोई कटौती नहीं की गई है। हालांकि रिपोर्टों के आधार पर तय किए गए अनुमानों के मुताबिक 265 लाख टन गेहूं खरीद होने की उम्मीद है।
इस बार गेहूं खरीद की समयावधि को भी घटाए जाने की उम्मीद है। आमतौर पर यह प्रक्रिया 35-40 दिनों तक चलती है जबकि इस बार इसे घटाकर 25-30 दिन करने की उम्मीद जताई जा रही है। सामान्यतौर पर खरीद 1 अप्रैल से शुरू हो जाती है और 15 मई तक चलती है, कुछ राज्यों में यह 30 मई तक चलती है। म.प्र. में यह खरीदी 2 माह तक चलेगी।
पंजाब और हरियाणा के विभिन्न बाजारों में गेहूं की खरीद काफी तेजी से की जा रही है। ऐसे में पूरा स्टॉक निपटाने में अभी भी करीब एक हफ्ते का समय लग सकता है। खरीद में आने वाली कमी की भरपाई करने के लिए सरकार चुनिंदा राज्यों में यह काम निजी एजेंसियों को सौंपने के बारे में विचार कर रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में खरीद तंत्र ठीक नहीं है इसलिए निजी कारोबारी अनाज खरीदने के लिए छोटे किसानों के दरवाजे तक पहुंच कर सेवाएं दे सकते हैं।
इस मॉडल का इस्तेमाल 2005-06 से 2007-08 तक किया गया और इसके मिले-जुले परिणाम देखने को मिले। इस साल हरियाणा में खरीद का काम भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के जिम्मे नहीं है क्योंकि राज्य सरकार ने एफसीआई की भूमिका को पुनर्गठित करने को लेकर शांता कुमार समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू कर दिया है।
कृषि मंत्रालय ने फसल नुकसान के आंकड़ों में संशोधन कर देश में कुल प्रभावित क्षेत्र 189.81 लाख हेक्टेयर का अनुमान लगाया है जिससे भी गेहूं उत्पादन में कमी आएगी और सरकारी खरीद प्रभावित होगी।
मध्य प्रदेश की स्थिति- इधर मध्यप्रदेश में समर्थन मूल्य पर 2,965 खरीद केन्द्रों पर अब तक 42 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद की जा चुकी है और इस खरीदे गये गेहूं की एवज में किसानों को 4,429 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। इस वर्ष किसानों से 1450 रूपये प्रति क्विंटल के भाव से गेहूं की खरीद की जा रही है।
प्रदेश में इस वर्ष 18 लाख 68 हजार किसानों ने समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचने के लिये अपना पंजीकरण करवाया था। इसमें से 5 लाख 49 हजार 182 किसानों से प्रदेश में कुल 42 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद की जा चुकी है।
प्रदेश में समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीद के लिये मध्यप्रदेश स्टेट सिविल सप्लाइज कॉर्पोरेशन को नोडल एजेंसी बनाया गया है। कृषि विभाग के सूत्रों के मुताबिक रबी 2014-15 में गेहूं का उत्पादन अनुमान 203 लाख टन लगाया गया था परंतु मौसम की मार के कारण अब गेहूं का उत्पादन 184 लाख टन के आसपास रह सकता है। मौसम के कहर ने समीकरण बदल दिए हैं। इसके पूर्व 58.94 लाख हेक्टेयर में बोनी होने के कारण गेहूं का रिकार्ड उत्पादन होने की संभावना व्यक्त की जा रही थी। गत वर्ष 174 लाख टन से अधिक गेहूं का उत्पादन हुआ था।

कम कीमत की भरपाई करेगी सरकार
किसानों को खराब क्वालिटी के गेहूं की कम कीमत की भरपाई केंद्र सरकार करेगी। कैबिनेट की बैठक में यह फैसला हुआ। यह सहूलियत पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, राज्यस्थान, उत्तरप्रदेश और गुजरात के लिये होगी। इसका मकसद किसानों को 1450 रुपये का एमएसपी दिलाना है।
मार्च-अप्रैल में बारिश और ओलावृष्टि से कई राज्यों में फसल को नुकसान हुआ है। गेहूं की क्वालिटी खराब हो गई है। किसानों से खराब क्वालिटी का गेहूं भी खरीदा जा सके, इसके लिये नियमों में ढील दी गई है। लेकिन इसके लिए कीमत भी थोड़ी कम हो गई है। किसानों की परेशानियों को देखते हुए ज्यादातर राज्य सरकारों ने कीमत में इस कटौती का बोझ खुद वहन करने का फैसला किया है। वे किसानों को पूरी कीमत दे रही हैं। राज्य इसकी भरपाई की मांग कर रहे थे। केंद्र एफसीआई के जरिए उन्हें यह रकम देगा।

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