गेहूं पर आयात शुल्क हटाना आत्मघाती फैसला

नई दिल्ली स्थित लाल किले की प्राचीर से संबोधित करते हुए देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, ‘खाद्यान्न आयात करना किसी भी देश के लिए बहुत ही अपमानजनक है, इसलिए हर चीज इंतजार कर सकती है, लेकिन खेती नहीं।Ó वह 1955 का साल था। नेहरूजी ने खाद्यान्न आयात करते समय जो अपमान महसूस किया था, उसे व्यक्त करने के 65 से ज्यादा वर्षों बाद भारत इतिहास में लौटने की पटरी पर दौड़ रहा है। उन दिनों में लौट रहा है जब देश की खाद्यान्न जरूरतें आयात से पूरी की जाती थीं। गेहूं की बम्पर फसल के दावों के बावजूद लोकसभा में 8 दिसंबर 2016 को गेहूं आयात से 10 फीसदी आयात शुल्क हटाने की घोषणा ने सस्ते आयात के सैलाब के दरवाजे खोल दिए हैं। खाद्यान्न आयात, बेरोजगारी आयात करने जैसा है। इसकी कृषक समुदाय पर मार पड़ेगी, जो बेचारा पहले ही संकट में है। जब भी आयात खोला जाता है तो हमेशा ही छोटे किसानों और काश्तकारों की आजीविका संकट में पड़ जाती है। आयात का फैसला ऐसे समय लिया गया है, जब गेहूं की बुआई पूरी होने को है और सारे संकेत अच्छी फसल होने के हैं।
23 सितंबर को ही सरकार ने आयात शुल्क 25 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी कर दिया था। सिर्फ दो माह बाद ही इसे खत्म ही कर दिया गया। इन दो माह में ऐसा कुछ आमूल परिवर्तन नहीं हुआ था कि आयात शुल्क हटा ही दिया जाए। व्यापारिक घरानों ने पहले ही ऑस्ट्रेलिया और यूक्रेन से 35 लाख टन गेहूं आयात का करार किया है और इसमें से 20 लाख टन तो आ भी चुका है। ये करार 10 फीसदी आयात शुल्क रहते किए गए थे। ऐसे में मुझे आयात शुल्क खत्म करने का कोई कारण नजऱ नहीं आता। सरकार के 9.35 करोड़ टन गेहूं उत्पादन के दावे के विपरीत उत्पादन करीब 8.60-8.70 करोड़ टन भी होता है तो भी फैसले का औचित्य नहीं है, क्योंकि घरेलू खपत की कुल जरूरत 8.70 करोड़ टन है। जब घरेलू उत्पादन, घरेलू मांग के बराबर है तो चिंता का क्या कारण है? यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए।
उत्तर सरल-सा है। सरकार उस आयात लॉबी के आगे झुक गई है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ता गेहूं देखकर अपने लिए भारी मुनाफा देख रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं का भाव 210 डॉलर (करीब 14,300 रु.) और 235 डॉलर (करीब 16,000 रु.) प्रति टन के बीच है, जो भारत की तुलना में बहुत ही कम है। व्यापार को इस फर्क में बड़ा मुनाफा दिख रहा है और सरकार ने दयालुता दिखाते हुए कृपा कर दी। यदि खेरची के भाव 21.50 रुपए किलो तक बढ़ जाए तो भी मुझे कीमतें नीचे लाने के लिए आयात खोलने के पीछे कोई आर्थिक तर्क नहीं दिखता। दूसरा कारण खाद्यान्न भंडार की नाजुक हालत का दिया जा रहा है। 1 दिसंबर को भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के पास 1.65 करोड़ टन गेहूं था। यह 2007 के बाद से न्यूनतम स्तर पर है। पिछले साल के 2.68 करोड़ टन के स्तर को देखते हुए यह काफी कम दिखता है, लेकिन फिर भी यह अप्रैल 2017 की बफर जरूरत के लिए पर्याप्त है। मुझे यह एक पहेली ही लगती है कि पिछले कुछ वर्षों से खासतौर पर जब दो साल पहले एफसीआई का स्टॉक 8.10 करोड़ टन पार कर गया था, हमारे सारे प्रयास खाद्यान्न खरीद घटाने के रहे हैं।
2014 में नई सरकार के सत्ता संभालते ही खाद्यान्न मंत्रालय ने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्यों की सरकारों को आगाह किया कि वह गेहूं उगाने वालों को न्यूनतम समर्थन मूल्य के ऊपर कोई बोनस दे। यदि उन्होंने ऐसा किया तो खरीद के पूरे अभियान के लिए वे ही जिम्मेदार होंगे। उसके बाद से राज्यों ने बोनस देना बंद कर दिया। ऊंची कीमत अपने आप में अधिक उत्पादन को प्रोत्साहित करना है, जिसका मतलब अधिक खरीद में होता है। दूसरे शब्दों में सरकार खुद चाहती थी कि गेहूं की खरीद नीचे आए।  विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) से बातचीत में भारत ने हमेशा अपने 60 करोड़ किसानों को संरक्षण देने का सराहनीय रुख अपनाया है। किंतु स्वदेश में खुले आयात के पक्ष में है। इसे हासिल करने के लिए एक के बाद दूसरी सरकारों ने सुनियोजित रूप से कृषि पर सार्वजनिक निवेश को कम किया है और उन्हें वाजिब कीमत देने से इनकार करती रही हैं, जिससे खेती गरीबी में फंसी हुई है। सरकार ने पहले ही सुप्रीम कोर्ट से कह दिया है कि वह किसानों को उत्पादन लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देने की स्थिति में नहीं है।
हाल के महीनों में आलू पर आयात शुल्क 30 से घटाकर 10 फीसदी, कच्चे पॉम तेल पर 12.5 से 7.5 फीसदी, रिफाइन पॉम तेल 20 से 15 फीसदी और गेहूं 25 से 10 फीसदी और अब शून्य कर दिया गया है। मुझे फलियों, खाद्य तेल, गेहूं, सेब, रबर, नारियल, रेशम, और ढेर सारे फलों के उत्पाद और ज्यूस में आयात में तेजी आती दिख रही है। भारत पहले ही 70 हजार करोड़ रुपए का अपनी आवश्यकता के 60 फीसदी बराबर खाद्य तेल आयात करता है। यह कृषि मंत्रालय और कृषि लागत और मूल्य आयोग की चेतावनी के बावजूद इतने बरसों में आयात शुल्क घटाते चलाने का परिणाम है। चाहे उपभोक्ता मूल्य काबू में करने के नाम पर आयात को उचित ठहराया जा रहा है, इस बात का अहसास नहीं है कि इससे छोटे हाशिये के किसान खेती छोडऩे पर मजबूर होंगे।
हाल ही में मोजाम्बिक, यूगांडा, इथियोपिया, म्यांमार और यहां तक कि दूर के ब्राजील तक के किसानों को भारत के लिए फलियों का उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित करने को देखते हुए मौजूदा फैसला चकित नहीं करता। 1993-94 में खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनाने वाली पीली यानी खाद्य तेल क्रांति को नष्ट करने के बाद गेहूं उत्पादन की घरेलू क्षमता घटाने का कोई भी प्रयास हरित क्रांति के अंत की शुरुआत ही कही जाएगी। भारत जैसे विशाल देश के लिए ‘जहाज से मुंहÓ तक वाले अस्तित्व में लौटना राजनीतिक रूप से आत्मघाती फैसला है, जब जहाज से आया खाद्यान्न सीधे भूखे लोगों तक पहुंचाया जाता था। भारत को फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में भीख का कटोरा लेकर खड़ा नहीं किया जा सकता।

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