गर्मियों में कद्दूवर्गीय फसलों में कीट नियंत्रण

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डॉ. संदीप शर्मा
मो. : 9803133157
email : sharma.sandeep1410@gmail.com

मध्यप्रदेश में नर्मदा ताप्ती, तवा, गंजाल आदि नदियों के तटों पर खीरा, ककड़ी, टिण्डा, खरबूज, तरबूज, लौकी आदि फसलें विस्तृत क्षेत्र में उत्पादित की जाती हैं। क्षेत्र में इन फसलों की खेती असंगठित एवं अपेक्षाकृत कम प्रशिक्षित किसानों द्वारा की जाती है। अत: इन फसलों की उन्नत उत्पादन तकनीकी के व्यापक एवं सघन प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है। इन फसलों में उत्पादन को प्रभावित करने वाले कारकों में कीटों का आक्रमण प्रमुख है अत: हानिकारक कीटों का परिचय एवं उनके नियंत्रण तकनीक की जानकारी प्रस्तुत है।

कद्दू का लाल भृंग : वैज्ञानिक जगत में रेफिडो पेल्पा फोविको लीस के नाम से प्रसिद्ध यह कीट कद्दू, ककड़ी, खीरा, खरबूज और तरबूज की फसलों पर अधिक हानि करता है। करेले पर इसका प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है। इस कीट का वयस्क भृंग चमकीले नारंगी-लाल रंग का होता है। इसके सिर, वक्ष तथा उदर का निचला भाग काले रंग का होता है। इसका शरीर 6-8 मि.मी. लंबे तथा 4-5 मि.मी. चौड़ा होता है। इसके वक्ष और उदर के निचले हिस्से पर छोटे-छोटे रोम पाये जाते हैं। इस भृंग की इल्ली जिसे ग्रब कहते हैं, मटमैले सफेद रंग की होती है जिसका सिर भूरे रंग का होता है। पूर्ण विकसित ग्रब 12 मि.मी. तक लंबा हो जाता है। इस कीट के ग्रब और वयस्क दोनों ही हानिकारक हैं। ग्रब भूमि में रहकर जड़ों और तनों में छेद बनाकर क्षति करते हैं। जो फल जमीन के संपर्क में आते हैं ग्रब उन्हें भी क्षतिग्रस्त करते हैं। वयस्क भृंग पत्तियों में गोल छेद बनाकर क्षतिग्रस्त करते हैं। वयस्क कोमल पत्तियों को विशेष रूप से पसंद करते हैं। नवजात पौधे पत्तीविहीन होकर मर जाते हैं। इस कीट का आक्रमण फरवरी से अक्टूबर तक होता है। ग्रब द्वारा क्षतिग्रस्त जड़ों, तनों तथा फलों में फफूंद लग जाती है, फलस्वरूप वे सडऩे लगते हैं। अप्रैल-जून के दौरान इस कीट की सक्रियता अधिकतम रहती है। मादा भृंग पौधों की जड़ों के पास मिट्टी में अंडे देती है। वयस्क भृंग लगभग एक माह तक जीवित रहता है।
नियंत्रण : फसल की बोनी जनवरी माह में करने से पौधों की बीज-पत्र अवस्था भृंगों के आक्रमण से बच जाती है क्योंकि शीतकाल में भृंग सक्रिय नहीं रहते। फसल की प्रारंभिक अवस्था में वयस्क भृंग दिखाई देने पर यथासंभव भृंगों को हाथ से चुनकर नष्ट करें। यह कार्य सुबह के समय करना प्रभावी होता है क्योंकि इस समय भृंग सुस्त रहते हैं और सरलता से पकड़े जा सकते हैं। एकत्रित भृंगों को घासलेट युक्त जल से भरे बरतन में डालकर मारा जा सकता है। धतूरे की पत्तियों की राख या गोबर की राख मिट्टी के तेल में मिलाकर भुरकने से भृंग पौधों पर आक्रमण नहीं करते। अत्यधिक प्रकोप की स्थिति में मैलाथियान 50 ई.सी. दवा की एक मिली लीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़कने से प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है। फसल कटाई उपरांत बेलों को एकत्र कर नष्ट कर दें जिससे इनमें आश्रय प्राप्त कर रहे वयस्क नष्ट हो सकें। यदि मैलाथियान तरल दवा उपलब्ध न हो तो मैलाथियान 5 प्रतिशत चूर्ण का भुरकाव 8 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से किया जाना भी प्रभावी होता है।
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लाल मकड़ी : रसचूसक माईट या वरूथी वैज्ञानिकों के मध्य टेट्रानिकस सिनाबेरिनस के नाम से जानी जाती है। नग्न आंखों से दिखाई न देने वाली यह एक सूक्ष्म मकड़ी है। अपने पोषक पौधों की पत्तियों की निचली सतह पर चिपक कर रस चूसक यह वरूथी कपास, बैंगन, टमाटर, भिण्डी तथा कद्दूवर्गीय फसलों पर आक्रमण करती है। इस वरूथी का वयस्क लाल रंग का होता है जो कि अण्डाकार होता है तथा शरीर के ऊपरी भाग में दो धब्बे पाये जाते हैं। वरूथी की शिशु एवं वयस्क दोनों ही अवस्थायें हानिकारक होती है। पत्तियों की निचली सतह पर इनके द्वारा बनाई महीन जाली से इनकी उपस्थिति ज्ञात होती है। ग्रसित पौधे बीमार दिखाई देते हैं और उनकी ऊंचाई अपेक्षाकृत कम रह जाती हैं। मार्च-अप्रैल का गम मौसम इनके अधिक प्रकोप के लिये अनुकूल समय है। वर्षा तथा शीतकाल में इनकी संख्या कम हो जाती है। अपने सूक्ष्म आकार के कारण ये हवा के सहारे एक स्थान से दूसरे स्थान तक विचरण करती हैं। वयस्क वरूथी रेशमी धागे की सहायता से पौधों पर लटकती रहती हैं। और पशुओं या हवा के माध्यम से अन्य पौधों पर पहुंच जाती हैं। स्वयं के द्वारा बनाया गया यह रेशमी धागा वरूथी के लिये पैराशूट का कार्य करता है। ग्रसित पौधे की उपज क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अधिक प्रकोप होने की दशा में प्रकोपित पत्तियां सूखकर गिर जाती हैं।
नियंत्रण : ग्रसित पत्तियों को तथा खरपतवारों को तोड़कर नष्ट करें। कतारों के मध्य अनुशंसित दूरी रखें। सघन बोई गई फसल में प्रकोप अधिक होता है। पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग करें। सामान्यत: रसायनिक नियंत्रण की आवश्यकता नहीं पड़ती। अधिक प्रकोप होने पर डायकोफाल 18.5 ई.सी. की 2.5 मि.ली. मात्रा या डायमिथोएट 30 ई.सी. की 1.5 मि.ली. मात्रा या प्रोपेरगाईट 57 ई.सी. की एक मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर प्रकोपित पौधें पर छिड़कें।
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फल मक्खी : बेक्ट्रोसेरा कुकुरबिटी नामक यह मक्खी सामान्यत: खरबूज-तरबूज तथा खीरे के फलों को क्षति करती है। करेला और गिलकी इसे कम पसंद हैं। यह मक्खी लाल-भूरे रंग की होती है। इसके सिर पर काले तथा सफेद धब्बे पाये जाते हैं। वक्ष पर हरापन लिये हुये पीले रंग की लम्बाकार मुड़ी हुई धारियां पाई जाती हैं। पारदर्शी एक जोड़ी पंखों के बाहरी सिरे पर भूरे रंग की धारियां एवं स्लेटी रंग के धब्बे होते हैं। मक्खी के बैठने की अवस्था में इसके पंख पूर्णत: फैले रहते हैं। इसकी इल्ली या मैगट हल्के सफेद रंग के होते हैं जिनका शरीर बेलनाकार तथा अग्र सिरा नुकीला होता है। इसकी मैगट अवस्था ही हानिकारक होती है। मैगट फलों के अंदर ही अंदर गूदे को खाकर नष्ट करता है। क्षतिग्रस्त फल अंडे देने के स्थान से टेड़ा हो जाता है जिसकी पहचान आसानी से हो जाती है। क्षतिग्रस्त फलों पर फफूंद का आक्रमण हो जाता है जिससे वे सडऩे लगते हैं। कभी-कभी मैगट बेल को भी खाते हैं जिससे बेल में गांठें बन जाती है। इस की कीट की एक वर्ष में 7-10 पीढिय़ां पायी जाती हैं। देरी से पकने वाली किस्मों में फल मक्खी का प्रकोप अपेक्षाकृत अधिक होता है। कद्दू के फलों पर फल मक्खी का प्रकोप कम होता है क्योंकि फल की कठोर त्वचा के कारण अंड निरोपण नहीं होने पाता। मई-जून माहों के दौरान फल मक्खी अधिक सक्रिय रहती है।
नियंत्रण : समय-समय पर बेलों की निंदाई-गुड़ाई करते रहना चाहिये जिससे भूमि में उपस्थित इस मक्खी की शंखियां नष्ट हो सकें। ग्रसित फलों को तोड़कर भूमि में गहराई पर गाड़कर नष्ट करें। तम्बाखू के चूर्ण या घासलेट मिश्रित राख का पौधों पर भुरकाव करने से मक्खी का प्रकोप कम होता है। फल मक्खी पर रसायनिक कीटनाशकों का छिड़काव प्रभावी नहीं होता क्योंकि इसके मैगट फलों के अंदर रहते हैं। पुष्प अवस्था में रसायनिक कीटनाशकों का उपयोग करने से मादा फूलों पर आने वाले और परागण में उपयोगी कीट भी नहीं आ पाते। अत: इस अवस्था में छिड़काव नहीं करना चाहिये। फल मक्खी के प्रभावी नियंत्रण के लिये विष चारे का उपयोग किया जाना सफल पाया गया है। तरल विष चारा उथले बर्तनों में खेतों में जगह-जगह रखकर वयस्क मक्खी को आकर्षित कर मारा जा सकता है। तरल विष-चारा बनाने के लिये एक किलो गुड़ को 20 लीटर पानी में घोलकर इसमें 50 मिली. सिरका तथा 50 मिली. मैलाथियान 50 ई.सी. कीटनाशक मिलायें। तैयार घोल को फल पकने की अवस्था में मिट्टी के चौड़े मुंह के बर्तनों में भरकर खेत में जगह-जगह रख दें। चूंकि मादा वयस्क मक्खी को अण्ड निरोपण के पूर्व पानी की आवश्यकता होती है तो वह इस घोल की ओर आकर्षित होती है और मैलाथियान विष के कारण नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार नर वयस्कों को संतरे के तेल तथा पानी के मिश्रण से आकर्षित कर नष्ट किया जा सकता है।

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