खरीफ के जोखिम

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देहात में शारीरिक अक्षमता को दर्शाते हुए एक कहावत है कि एक आंख वाले ब्याह में सौ-सौ जोखिम। यही हाल खरीफ फसलों का भी होता है। बुवाई के मिलने वाले तीन दिन से लेकर कटाई तक किसान की जान सांसत में रहती है। बीती जून में ठीक-ठाक बारिश होने से चालू खरीफ मौसम में सोयाबीन, धान, कपास और मोटे अनाजों की बोनी ने जोर पकड़ा। पर मानसून की जोरदार आमद के बाद 15 दिन के सन्नाटे ने किसान के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी है। अच्छी वर्षा के लिए भजन, कीर्तन, हवन भी किसान भाइयों ने कर दिए। विशेषज्ञों ने भी भरपूर वर्षा के अभाव में 25 प्रतिशत तक उत्पादकता में कमी की आशंका जताई है। वहीं किसान अपनी मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। यदि सिंचाई साधन उपलब्ध है तो स्प्रिंकलर से भी मुरझाती फसल को सींच रहा है। नमी के अभाव में खरपतवार नाशक रसायनों का असर भी विपरीत हो रहा है। बीज कीटनाशक के निष्प्रभावी होने के समाचार भी आने लगे हैं।
वैसे मध्यप्रदेश के लिए तो सोयाबीन ऐसी मजबूत फसल है जो भारी सूखा और घनी वर्षा दोनों मार सहन कर लेती है। ऐसा मौसम कीट-रोगों के लिए भी बहुत अनुकूल होता है। इसलिए किसान भाइयों को सचेत और सावधान रहने की जरूरत है। वहीं कृषि विभाग और अन्य सरकारी एजेंसियों जो कृषि आदानों की गुणवत्ता और मानक स्तर पर निगरानी रखने के लिए दायित्व निर्वहन कर रही है, अधिक चौकस रहेंगी तो नकली एवं घटिया कीटनाशक, उर्वरक बेचने वालों पर अंकुश रहेगा।
खेती आज भी हमारी अर्थव्यवस्था की धुरी है। हमारे देश में खेती की निर्भरता पूरी तरह मौसम पर है और मौसम भी जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रहा है।
कृषि की मानसून पर निर्भरता कम करने के लिए केन्द्र सरकार ने अगले पांच सालों में 50 हजार करोड़ की योजना बनाई है। देश में कुल 14.2 करोड़ हेक्टेयर खेती की जमीन में से 65 फीसदी खेती वर्षा पर निर्भर है। इस सूखे हाल में हर खेत को पानी मिले, इस दिशा में सरकार को मिशन मोड में काम करना होगा।

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