कृषि यंत्र समय की आवश्यकता

भारत में लगभग 1378 लाख किसानी परिवारों में सिर्फ 10 लाख परिवार ऐसे हैं जिनके पास 10 हेक्टर से अधिक खेती योग्य भूमि है। जबकि 924 लाख परिवार ऐसे है जिनके पास एक हेक्टर से कम खेती योग्य भूमि है। यदि दो हेक्टर से कम भूमि वाले परिवारों की संख्या देखें तो वह 1171 लाख तक पहुंच जाती है जो कुल किसानी परिवारों के लगभग 85 प्रतिशत होती है। ऐसी स्थिति में कृषि यंत्रों को छोटे किसानों के लिये विकसित कर उपलब्ध करना एक टेड़ी खीर है। भारत में कृषि यंत्रों का प्रारंभिक उपयोग इंग्लैंड में विकसित तकनीक पर आधारित रहा चाहे वो जुताई के यंत्र ट्रैक्टर, सिंचाई पम्प, गहाई यंत्र या कुट्टी काटने वाली मशीन हो। साठ के दशक में हरितक्रान्ति के बाद जब किसानों की आर्थिक हालत में सुधार आया तब तक किसानों ने उन्नत कृषि यंत्रों की उपयोगिता समझी, परंतु उपलब्ध यंत्र बड़े किसानों के ही पहुंच में थे।

समय की मांग के साथ छोटे किसानों के लिये भी पशु चलित कृषि यंत्रों का विकास किया गया परंतु वो बहुत कारगर सिद्ध नहीं हो पाये। सम्पन्न किसानों ने जिनके पास भले ही जोत कम रही हो अपनी प्रतिष्ठा के लिये ट्रैक्टर क्रय किये। अधिकांश राज्यों में 40 हार्सपावर से कम शक्ति वाले ट्रैक्टरों पर ही अनुदान दिये जाने के कारण अधिक शक्ति के ट्रैक्टर लोकप्रिय नहीं हो पाये। ऐसे किसानों के ट्रैक्टरों का स्वयं के लिये उपयोग सीमित समय के लिए हो पाता था। इससे ट्रैक्टरों का सीमित यंत्रों के साथ किराये पर देने की प्रथा प्रारंभ हो गयी। इसको जुताई में काम आने पशुओं के रखरखाव पर होने वाली बढ़ती लागत ने और बल दिया।

कृषि में अलग-अलग कार्य के लिये अलग-अलग कृषि यंत्रों की आवश्यकता होती है। किसी बड़े सम्पन्न किसान के लिये भी यह संभव नहीं है कि वह जुताई, बीज बुआई, उर्वरक देने, गुड़ाई, कटाई-गहाई आदि सभी कार्यों के लिये अलग से यंत्र रखें। साथ में क्षेत्र की मिट्टी व अन्य आवश्यकतानुसार भी कृषि यंत्रों के डिजाइन में भी परिवर्तन करना आवश्यक रहता है।

वर्तमान में वह सीमित यंत्रों से किसी प्रकार किसान अपना कार्य चला रहा है जिससे उसकी मेहनत के अनुरूप उसे परिणाम नहीं मिल पाते हैं। जिसका असर फसल की उत्पादकता पर पड़ता है।

उत्पादकता को बढ़ाने के लिये कृषि कार्यों को समय से सम्पन्न करना अति आवश्यक है। कृषि श्रमिकों की समय पर अनुपलब्धता व बढ़ती मजदूरी दर को देखते हुए दक्ष कृषि यंत्रों का उपयोग अब अनिवार्यता बनती जा रही है। देश व प्रदेश में छोटी जोत वाले किसानों की संख्या देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि पंचायत स्तर पर ऐसे केन्द्र आरंभ किये जायें जहां ट्रैक्टर तथा कृषि में काम आने वाले सभी कृषि यंत्र वहां उपलब्ध हो, जो किराये पर सीमान्त व लघु किसानों जिनकी खेती का रकबा 2 हेक्टेयर से कम हो को ही उपलब्ध कराया जाये। इसके लिये एक सुदृढ़ व्यवस्था बनाना भी आवश्यक होगा ताकि इसका लाभ सम्पन्न रुतवेदार किसान सीमान्त किसानों से पहले न उठा पाये।

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