कृषि में एक ज्वलंत समस्या कीटों में कीटनाशक रसायनों के प्रति प्रतिरोधकता

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कीटों में कीटनाशकों की प्रतिरोधी क्षमता से क्या मतलब है-
ऐसे कीटों का विकास होना जो किसी कीटनाशक दवा की निर्धारित मात्रा से नष्ट हो जाती थी मगर अब उसी कीटनाशक का प्रभाव उस कीट पर नहीं होता है। इस प्रकार का बदलाव प्राय: कीट प्रतिरोध कहलाता है।
अभी तक सम्पूर्ण विश्व में लगभग 504 से अधिक कीटों व अन्य जीवों में विभिन्न कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधकता का पता चला है इनमें 283 कीट कृषि फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले है। भारत में सर्वप्रथम सन 1952 में मच्छर में डी.डी. टी. के प्रति प्रतिरोध शक्ति के बारे में जानकारी सामने आयी थी। तदुपरांत अनेकों कीटों में भिन्न-भिन्न प्रकार के कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधिता के बारे में जानकारी सामने आती गयी। कृषि की प्रमुख कीट हरी सुण्डी में साइपरमेथ्रिन के प्रति 5 से 800 गुना जबकि फैनवरलेट के प्रति 18 से 3200 गुना प्रतिकारक शक्ति पैदा होने की जानकारी है। गोभी को नुकसान करने वाले डायमंड बैक मोथ की इल्ली में साइपरमेथ्रिन के विरूद्ध 145, फैनवरलेट के विरूद्ध 210 तथा डेल्टामेथ्रिन के विरूद्ध 194 गुना प्रतिकारक शक्ति पैदा होने की जानकारी प्राप्त हुई है जो की अत्यंत ही चिन्ता का विषय है।
आज हमें यह भी ख्याल है कि कृषि के लिये अत्यंत हानिकारक हरी सुण्डी ने बी.टी. कपास बोलगार्ड के विरूद्ध भी प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है इसी कारण से आज बोलगार्ड -2 को बाजार में उतारा गया है। अनेकों फसलों में नुकसान करने वाली सफेद मक्खी में आज अनेकों कीटनाशकों जैसे की सिन्थैटिक पाईरेथ्राईड्स के विरूद्ध प्रतिरोधक शक्ति पैदा हो गई है जो की एक गंभीर मुद्दा है।
कीट प्रतिरोधक शक्ति के प्रकार-
परस्पर प्रतिकारक शक्ति – परस्पर प्रतिकारक शक्ति एक प्रकार की असाधारण घटना है इसमें कीट किसी एक प्रकार के रसायन के प्रति प्रतिकारक शक्ति विकसित कर लेते हैं तदुपरांत उसी समूह अन्य रसायनों (रसायनिक संरचना), प्रति स्वत: ही प्रतिरोधकता विकसित कर लेते हैं उदाहरण के लिये डी.डी.टी. का लंबे समय तक प्रयोग होने के कारण अनेकों कीटों में बी.एच.सी. या प्रति भी प्रतिकारक शक्ति का विकास हो जाता है।
बहुविविध प्रतिकारक शक्ति- बहुविविध प्रतिकारक शक्ति से हमारा अभिप्राय कीटों में दो या दो से अधिक कीटनाशकों के प्रति प्रतिकारक शक्ति विकसित करने से है। कीटों में इस प्रकार की प्रतिकारक शक्ति कीटनाशक दवाओं के सतत प्रयोग करने से पैदा होती है।
कीटों में कीटनाशक रसायन के प्रति प्रतिरोधक शक्ति पैदा करने वाले कारक –
कीटों में कीटनाशक रसायनों के प्रति प्रतिरोधक शक्ति पैदा करने में अनेक कारक जिम्मेदार होते हैं जिनमें कीट की बाहरी आकारिकी, जैव रसायनिकी, आंतरिक सरंचना, कीटनाशकों की रचना तथा उन्हें इस्तेमाल करने का तरीका आदि जिम्मेदार होते हैं। किसान भाई इस जानकारी का उपयोग करके कृषि में कीटों द्वारा उत्पन्न कीट प्रतिरोधकता का मुकाबला कर अधिक से अधिक पर्यावरण सुरक्षित खेती करके लाभान्वित होंगे।

कीटों में कीटनाशक रसायनों के प्रति प्रतिरोधक शक्ति रोकने हेतु कुछ सुझाव-

  • फसलों की कीट प्रतिरोधक किस्मों को बुवाई हेतु काम में लाना चाहिए उदाहरण स्वरूप कपास में बोलगार्ड-2 किस्म को काम में लें। इनमें से सामान्य के अपेक्षा कम मात्र में कीटनाशकों का उपयोग होगा।
  • बी.टी. कपास के बीज के पैकेट में थोड़ी मात्रा में नान-बीटी कपास के बीज भी होते हैं जिन्हें किसान भाई कभी-कभार ही वापरते हैं ये नान-बीटी खेत के चारों ओर बोना चाहिए। जिससे बीटी कपास को नुकसान करने वाली हरी सुण्डी में बीटी कपास की इस किस्म के विरूद्ध प्रतिरोधक क्षमता का विकास न हो सके तथा वो नियंत्रण में रह सके।
  • कीटों की खेतों में सर्वेक्षण पद्धति द्वारा लगातार निगरानी करते रहें तथा सही समय आने पर उचित कीटनाशक का प्रयोग करें।
  • कीटनाशक दवाओं का प्रयोग उनकी अनुशंसित मात्रा के हिसाब के ही करें, अधिक अथवा कम मात्रा में दवा  का प्रयोग करना  सदैव कीटों में प्रतिकारक क्षमता को विकसित करने में मदद करता है।
  • फसलों में कीटों के आक्रमण शुरू होते ही कीटनाशक रसायनों का प्रयोग नहीं करें वरन पहले कीट नियंत्रण की अन्य विधियों जैसे की भौतिक, कर्षण, यांत्रिक, जैविक विधियों का उपयोग भी करें। कीटनाशक दवाओं का प्रयोग अंतिम हथियार के रूप में ही करें।
  • बैंगन, भिंडी, टमाटर तथा चना जैसी फसलों में फेरोमेन आधारित समन्वित कीट प्रबंधन तकनीक का उपयोग करने से कीटनाशक दवाओं का प्रयोग स्वत: ही कम हो जाता है जो कि बहुत ही सरल व आसान होता है।
  • सिन्थेटिक पाईरेथ्राईड्स समूह की दवाओं के सामने कीट बहुत ही जल्दी से प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं अत: सिन्थेटिक पाईरेथ्राईड्स समूह की दवाओं का यथासम्भव कम तथा लगातार दो छिड़काव कदापि न करें।

कीटों में कीटनाशक प्रतिरोधकता विकसित होने की दर में कमी लाने के कुछ उपाय-

  • जिन कीटनाशक दवाओं के प्रति कीटों में प्रतिकारक क्षमता विकसित हो गई हो अथवा  इसकी संभावना हो तो इस तरह के दवाओं में कुछ मात्रा में तिल का तेल डालने से इन कीटों में प्रतिकारक शक्ति पैदा होने में कमी लायी जा सकती है।
  • यदि कीटों को मरने के लिये एक से अधिक बार दवा का प्रयोग करना हो तो अलग-अलग कीटनाशक समूह वाले कीटनाशक का उपयोग करना चाहिये उदाहरण स्वरूप पहला स्प्रे ऑर्गेनो फास्फेट वर्ग वाले कीटनाशक का करना चाहिए जबकि दूसरा स्प्रे नियो निकोटीनाईट वर्ग वाले कीटनाशक का करें तथा आखिरी स्प्रे काईटीन इन्हेबिटर वर्ग के कीटनाशक का करें।
  • जहां तक संभव हो वहां तक स्वयं द्वारा मिश्रण करी गयी दो अथवा बाजार में उपलब्ध से अधिक दवाओं का प्रयोग कदापि नहीं करें।
  • आज बाजार में अनेकों जैविक कीटनाशक उपलब्ध है जैसे एन.पी.वी., कवक तथा जीवाणु आधारित कीटनाशक इनका अनुशंसित मात्र में प्रयोग करने से किसान को लाभ प्राप्त होता है व रसायनिक कीटनाशकों के आवश्यकता में भी कमी आती है।
  • फसलों में सदा सिफारिश के मुताबिक ही रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग करें, आवश्यकता से अधिक नत्रजन का प्रयोग करने से रस चूसने वाले कीटों के प्रकोप में वृद्धि होती है तथा हमें उनके नियंत्रण हेतु रसायनिक कीटनाशकों का प्रयोग करना पड़ता है जिससे  इन कीटों में प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है जो कि एक गंभीर मुद्दा है।
  • सामान्य परिस्थितियों में कई बार फसल के तुरंत उगने के बाद रस चूसने वाले कीटों का प्रकोप होने लगता है, इस प्रकार की स्थितियों से बचने के लिये किसानों को बीज को बोने से पूर्व रसायनिक अथवा जैविक दवाओं से उपचारित कर लेें इसे बीज-उपचार (सीड ट्रीटमेंट) भी कहा जाता है। इस प्रकार के बीज उपचार द्वारा फसल की 20-30 दिनों तक रस चूसक कीटों से रक्षा की जा सकती है।
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