किसानों की आत्महत्याएं नजर अंदाज

कृतिक आपदाओं एवं राजशाही अव्यवस्थाओं के चलते हलधर की पहचान रखने वाला देश का बलराम उन हालातों तक जा पहुंचा है कि अब उसे जीवन ही बोझ जान पडऩे लगा है। पूरे देश से किसानों द्वारा आत्महत्या का सिलसिला लगातार जारी है। लेकिन सत्ता से लेकर विपक्ष में बैठे सियासतदार स्वार्थ की राजनीति से अलग नहीं हो पाये है।
राजधर्म को शर्मिदा करने वाली यह मौते संसद से लेकर सड़कों तक मात्र तमाशा बनकर रह गई। राजनैतिक फायदे के लिये सड़कों पर धरना, चक्काजाम लगाकर मात्र मजमा इकट्ठा करने के प्रयास हो रहे है। दिल्ली के गजेन्द्र सिंह से लेकर विदिशा के अमानसिंह भोई के मामले एक जैसे ही है। और पिछले दस वर्षों से किसान इन आपदाओं में शासन की उपेक्षाओं को लेकर अपने आप को खत्म करता आया है। हर बार की बहस, बंद हंगामा, धरना एवं झूठे आश्वासनों के अलावा कही कोई भी रत्ती भर बदलाव किसानों की जिन्दगी में नहीं देखा गया है। कल तक विपक्ष में रहकर जो सत्ता पर आरोप लगाते थे, वही आज सत्ता के पाले में बैठकर मौतों पर सफाई देते नजर आते है। स्थानीय प्रशासन आत्महत्या करने वाले किसानों को नशेडी या पागल करार देता हैं। जबकि गमजदा किसान की आकस्मिक मौत को बीमारी की मौत करार दिया जाता है।
आजादी के 67 वर्षों बाद भी देश की सरकार किसानों के दिल में विश्वास पैदा नहीं कर पाई है। यही कारण है कि प्रत्येक पांच बरस में यही किसान अपना वोट कभी इस पाले में तो कभी उस पाले में डालता आ रहा है। लेकिन उसका विश्वास इन बाजीगारों पर नहीं बन पाया है। अन्तत: राजनेताओं को सत्ता के सौपान तक ले जाने वाला अन्नदाता अपने लिये मौत का रास्ता चुन रहा है। बात सिर्फ आपदा पीडि़त किसान की नहीं है। अब तो किसान सरकारी खरीद केन्द्रों पर विलम्ब के कारण हो रही परेशानी, बेइज्जती और बदईतजामी के कारण आत्महत्या कर रहा हैं। कहीं हम्मालो की मनमानी, कहीं बारदाने की कमी तो कही तुलाई में हो रही बेईमानी, स्वाभिमानी किसान के दिल को तार-तार कर रही है। अवसाद स्वरूप पीडि़त किसान जीवन की बलि देने को मजबूर हो चुक है। लानत होनी चाहिये देश की इन अव्यवस्थाओं पर विदिशा जिले में तपती दोपहरी एवं अंधेरी रातों में लगातार एक हफ्ते से इंतजार कर रहे दो किसानों ने आत्महत्या की तो एक की हृदयाघात से मौत हुई, स्थानीय प्रशासन ने भी मामले को दवाने, आनन-फानन में अंतिम संस्कार की व्यवस्था की और अन्त में कागजी सफाई में मरने वाले को शराबी एवं बीमारू करार दे दिया। आश्चर्य किसान का बेटा कहने वाले प्रदेश मुखिया भी नौकरशाही के इस छलावे को आज तक नहीं समझ सके। तुलाई केन्द्रों पर पांच दिनों तक वारदाने की कमी, हम्मालों की मनमानी, आखिर सच्चाई का मंथन कौन और कब करेगा।
तुलाई केन्द्रों पर बढ़ती आवक को देखकर स्थानीय अधिकारी चौथे कृषि कर्मण पुरस्कार की संभावनाएं जताकर जनप्रतिनिधियों के समक्ष अपने बधाई गीत गाने लगे है। इस संभावना में भी कोई शक नहीें है कि बढ़ते उत्पादन के कारण इस वर्ष भी मध्यप्रदेश कृषि कर्मण अवार्ड का सशक्त दावेदार होगा। लेकिन ऐसे जश्न मनाने से पूर्व किसानों के मातमी वातावरण का भी तो जायजा लीजिए। सरकारी तुलाई केन्द्रों पर अराजकता, आक्रोशित किसानों का चक्काजाम रोजमर्रा की दिनचर्या बनी हुई है।
प्रदेश में अधिक राजस्व हासिल करने के लिये दारू को गाँव के चौपालों तक पहुंचाकर अब यदि अन्नदाता को शराबी या नशेडी करार देकर उसे स्वयं ही मौत का जिम्मेदार ठहरा दिया जाये तो बात कचोटने वाली, बात आत्ममंथन की है, गिरेवान में झाकने की है। कि आखिर 67 सालों में देश के राजनेता अन्नदाता के मन में इतना भी विश्वास पैदा नहीं कर सके है कि किसान आपकी व्यवस्थाओं, आपकी योजनाओं या आपके ढांढस पर विश्वास कर सके। अन्न दाता के साथ सरकार की संवाद की स्थिति यह है कि सिर्फ और सिर्फ आप ही बोलते आये है, अन्नदाता के असल दर्द को सुनने की कभी कोशिश नहीं हो सकी है।

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