कितने बरस और ?

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(सुनील गंगराड़े)

सरकार किसानों की भलाई के लिए योजना बना रही है। आने वाला बजट किसानों और खेती पर ही केन्द्रित होगा। प्रधानमंत्री का सीना चौड़ा होते नहीं रुकता और प्रदेश के मुख्यमंत्री की छाती फूलते नहीं कम होती कि प्राकृतिक आपदा और विपदा की घड़ी में सरकार साथ रही। प्रति एकड़ मुआवजा दिया गया। प्रत्येक फलदार पौधे के नष्ट होने पर राहत दी गई। बिजली बिल माफ कर दिए गए हैं। किसानों को कर्ज में छूट दी जा रही है। केन्द्र ने पीठ थपथपाने का कर्मकांड एक बार फिर किया है। प्रदेश को लगातार चौथी बार कृषि कर्मण पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।
राजधानी में अब जलसों, उत्सवों, मेलों और प्रतिष्ठा प्रसंगों का अंतहीन सिलसिला चलता है। राजा के 100 दिन पूरे होने पर, सरकार का 1 वर्ष खत्म होने पर, सियासत के 10 साल मूंग दलने पर, दिल्ली के नवाजने पर, कोई नामालूम विदेशी संस्था द्वारा कथित श्रेष्ठता का अवार्ड दिए जाने पर होर्डिंग, बेनर, चौराहों पर चौकोर चौड़ी मुस्कानों के पोस्टर। लगता है यही स्वर्ग है, सब कुछ बासंती हो रहा है। खेतों में जरबेरा फूल रहा है मुख्यमंत्री के। मौसम रंग बिरंगा हो रहा है, पर तस्वीर का दूसरा स्याह पक्ष है, कि किसान सल्फास खा कर जान भी दे रहा है। बुन्देलखंड के किसानों की हालत बदतर है। साहूकार से भारी ब्याज दर पर पैसा उठाकर किसानों ने बीज, खाद का इंतजाम किया।
प्रधानमंत्री के अभिनंदन कार्यक्रम में किसानों को जबरिया लाने के लिए करोड़ों का खर्च किया जाएगा। वैसे केन्द्र से मिली राशि का अन्य मदों में खर्च की परम्परा पुरानी है। वहीं खबर है कि प्रधानमंत्री की सभा के लिये गेहूं की अधपकी फसल काटने को मजबूर किया गया किसानों को।
किसानों की भलाई के लिये योजनाओं का विस्तार भले ही हो रहा है लेकिन विभाग में मैदानी अधिकारी-कर्मचारी के सैकड़ों पद खाली पड़े हैं। मौजूदा टीम पर दोहरा बोझ है। मार्च में येन-केन प्रकारेण लक्ष्य पूर्ति की जाती है। अदम गोंडवी ने इन्हीं स्थितियों पर सटीक प्रश्न किया है-
जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में
गांव तक वो रोशनी आएगी कितने साल में।

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