औषधीय गुणों से भरपूर हल्दी

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बुवाई का समय एवं बीज दर- अल्पकालीन प्रजातियों हेतु मई के दूसरे पखवाड़े एवं मध्यकालीन प्रजातियों में जून के पहले सप्ताह तथा दीर्घकालीन प्रजातियां जून और जुलाई के मध्य बुवाई करते है जिन क्षेत्रों में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था हो वहां हल्दी को अप्रैल-मई माह में लगाया जा सकता है। हल्दी की बुवाई के लिए दो आंख वाले 25 ग्राम वजन के स्वस्थ कंद वाली गांठों को उपयोग में लिया जाता है। जिसके लिए मातृ कंद भी उपयोग किये जा सकते हैं तथा बीज कंद भी उत्पादन की दृष्टि से मातृ कंद भी कंदों से बुवाई ज्यादा उपयुक्त रहता है। बुवाई के समय बीज का चयन करते समय यह ध्यान दिया जाना अति आवश्यक है कि कंद स्वस्थ, दो आंखों वाले 25 ग्राम वजन से कम न हो एक हे. की बुवाई के लिए 10 से 15 क्विंटल बीज पर्याप्त होता है। हल्दी के बीज को बोने से पहले जैविक फफूंदनाशी ट्राईकोडर्मा 5 ग्राम/ किलो बीज की दर से बीजोपचार करने से अंकुरण एवं पौधे स्वस्थ रहते हैं।

हल्दी का भारतीय परम्पराओं में अपना अलग ही महत्व है। बात जब शादी-विवाह की होती है। तब हल्दी का विशेष महत्व होता है। इसके अतिरिक्त अन्य मांगलिक कार्यों चिट्ठी-पत्रिका में हल्दी को शुभ मानकर शादी विवाह के पत्रों पर हल्दी लगाकर भेजा जाता है। घरों में, सामूहिक भोजन में, मसाले के रुप में हल्दी का प्रयोग रंग लाने में किया जाता है।

बुवाई विधि- अंतरवर्तीय फसल के रुप में आम, अमरुद, नींबू, कटहल इत्यादि के साथ लगाया जा सकता है। जिसमें लाईन से लाईन की दूरी 40 से 45 सेमी एवं पौध से पौध की दूरी 23 सेमी 6 से 7 सेमी गहराई में हल्दी की गांठों को दबाकर मेड़ बना दी जाती है। गांठ लगाते समय खेत में नमी की कमी होने से सिंचाई करें। जिसमें अंकुरण शीघ्र होता है। हल्दी की शुद्ध खेती करने पर समतल खेत में भूमि से उठी हुई मेड़ों पर बुवाई करना उपयुक्त होता है। इस विधि में समतल खेत में लगाकर एक फुट ऊंची मेड़ बना ली जाती है। यदि बुवाई मानसून के पहले ( मई-जून) में कर दी है बुवाई के तुरंत बाद पलवार बिछा देना उपयोगी होता है। इसके लिए मेड़ों पर पलाश, धान की पुआल या ज्वार-बाजरे की कड़वी से ढ़क दें इससे खेत में नमी बनी रहती है, खेत में खरपतवार की समस्या कम रहती है और कचरा सड़-गलकर फसलों को जीवांश प्रदान करता है। जब कंद अंकुरित हो जायें तब उन पर मिट्टी चढ़ाना आवश्यक होता है।
उपयुक्त किस्में- सुरोमा, रस्मी, रोमा प्रभा, प्रतिभा, सुदर्शन, क्रांति, सुगंधन, बीएआर बरुआ सागर।
खाद एवं उर्वरक- अंतिम जुताई से पहले 200-260 क्विंटल सड़ी गोबर खाद मिट्टी में मिलाएं इसके अलावा 260 किलो यूरिया, 375 किलो फास्फोरस एवं 100 किलो म्यूरेट आफ पोटाश प्रति हेक्टर आवश्यक होता है। जिसमें फास्फोरस एवं पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा खेत में बुवाई के पहले मिलाएं शेष नाइट्रोजन पौधों में मिट्टी चढ़ाते समय दो बार में दें।
निदांई गुड़ाई एवं सिंचाई- समय-समय पर निंदाई-गुड़ाई करते रहें। जिससे उगने वाले खरपतवारों से फसल की रक्षा हो सके। इसके लिए 4 से 5 निदाई 25 दिन बाद करना आवश्यक है प्रत्येक उर्वरक के छिड़काव के बाद पौधों की जड़ों पर मिट्टी चढ़ायें जिससे गांठें मोटी एवं मजबूत बने। यदि फसल की बुवाई अप्रैल-मई में की गई हैं। तब सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है। इसके लिए गर्मियों में प्रत्येक सप्ताह सिंचाई आवश्यक है। वर्षा में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। अत: फसल होने पर मुख्य फसल की सिंचाई की जाती है। उसी की फसल से हल्दी को पानी मिलता रहता है।
खुदाई एवं उपज- फसल बुवाई के 8 से 9 माह में पककर तैयार हो जाती है। फसल की पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगे और कंद पूर्ण विकसित हो जायें तो एक सप्ताह पूर्व सिंचाई बंद कर दें। और सावधानी पूर्वक खुदाई कर लें ताकि कंद कट न जाय। अधिकांशत: हल्दी की फसल तुड़ाई फरवरी-मार्च में ही जाती है। खुदाई कर कंदों को अच्छी तरह साफ कर प्रोसेसिंग कर ली जाती है।

हल्दी की प्रोसेसिंग- हल्दी की खुदाई के उपरांत एक सप्ताह के अंदर कंदों को साफ कर किसी धातु या लोहे की कढ़ाई में प्रोसेसिंग यंत्र में 45 से 60 मिनट तक उबाला जाता है। जब अन उबलती गांठों से झाग आने लगे तथा एक विशेष प्रकार की गंध आने लगे और दबाने पर दब जाये तब उसे आग से उतारकर 10 से 15 दिन तक किसी चटाई या फर्श पर सुखाएं। सूख जाने पर किसी ड्रम या यंत्र में डालकर इस प्रकार रगड़ें कि इसमें चमक आ जाये। हल्दी की सूखी गांठों में 2 प्रतिशत पिसी हल्दी का पावडर मिला कर इन गांठों को पालिश करें जिससे यह कंद आकर्षक हो जाते हैं। एक हेक्टेयर क्षेत्र में 200 से 250 क्विवंटल गीली हल्दी एवं 80 से 85 क्विंटल सूखी हल्दी प्राप्त हो जाती है।

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