उत्तर प्रदेश में भी संकट में फंसता अन्नदाता

www.krishakjagat.org
Share

घाटे की खेती
आज देश की सभी सरकारें हैरान हैं कि अन्नदाता अपनी आवाज उठाने के लिए क्यों और कैसे खड़े हो रहे हैं और उग्र रूप धारण कर रहे है। किसान की हालत पीढ़ी दर पीढ़ी बद से बदतर होने के कारण सम्भवत: ऐसा हो रहा है। खेती के निरन्तर घाटे में जाने, जिंसों का घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से लागत तक न निकलने और पिछले दो-ढाई दशकों में तीन लाख से अधिक किसानों के आत्महत्या करने के बावजूद अभी तक किसान शांत नहीं हुए हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के उपवास और किसानों के साथ रूबरू होकर किए गए संवाद के बाद आन्दोलनकारी किसानों के हित में उठाए गए कदमों के कारण किसान आन्दोलन अब ठण्डा होने लगा है। सम्भवत: किसान अब समझ चुका है कि वह किसी भी राजनीतिक दल को राजनीतिक रोटी सेंकने का मौका नहीं देगा।
न वर्तमान ठीक न भविष्य सही
लगातार सघन पद्धति से खेती करने एवं रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग के कारण भूमि की उर्वराशक्ति निरन्तर कम होती जा रही है। जिसके चलते खेती की भूमि में देश के अन्दर लगभग 5 लाख टन सल्फर तत्व की कमी हो गई है, जो वर्ष 2025 तक बढ़कर लगभग 20 लाख टन हो जाएगी, क्योंकि पैदावार बढ़ाने के चक्कर में तेजी से भूमि से जितना पोषक तत्व ग्रहण किया गया है वह उसी अनुपात में भूमि को प्रदान नहीं किया गया है। जिससे जाहिर है कि खेत की मिट्टी को लेकर किसान न तो वर्तमान ही ठीक है और न ही भविष्य। जहां तक उत्पादन का प्रश्न है तो वह भी प्रतिवर्ष गिरता ही जा रहा है। इस उत्पादन गिरने और फसलों हेतु बाजार की अनुपलब्धता केवल प्रदेश स्तर पर ही नहीं अपितु राष्ट्रीय स्तर पर भी यही हाल है।

भारतवर्ष के कृषि प्रधान देश होने के उपरान्त भी कृषि एवं कृषक दोनों की ही दशा दिन-प्रतिदिन बिगड़ती ही जा रही है। कृषि हमारे देश की जीवन रेखा है तथा विकास का मूल आधार है और आने वाले समय में भी ऐसा ही रहेगा। अत: क्या यह एक चिन्तनीय प्रश्न नहीं है कि देश में किसानों की हालत बदतर है और उसके उत्पादों के लिए न तो बाजार ही मिल रहा है और न ही सरकार उसकी समस्याओं के निराकरण की ओर कोई विशेष रूचि ले रही है। मध्य प्रदेश में कर्ज माफी को लेकर ही किसानों का आन्दोलन उग्र हो चला है। तमाम राजनीतिक दल किसानों की इस पीड़ा पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं। वे इस तथ्य से अच्छी तरह से परिचित हैं कि किसान कल्याण के लिए कर्ज माफी कोई स्थाई समाधान नहीं है, परन्तु वे अपनी राजनीति चमकाने के लिए आग में घी डालने से नहीं चूक रहे हैं। आजादी के बाद से ही सरकारें समय-समय पर किसानों का कर्ज माफ करती रही हैं, परन्तु इससे किसानों की हालत बेहतर होने के बजाय और बदतर होते चले गये। घाटे का सौदा बनी खेती को उबारने के प्रति किसी का कभी ध्यान नहीं गया। यदि जिस पेशे से भारत की दो तिहाई आबादी जुड़ी हुई है, उसे लाभकारी बनाया जाता तो गरीब किसानों को आज यह दिन नहीं देखना पड़ता।

मृत संवर्ग में किसान संपर्क योजना
स्वयं कृषि विभाग को जिलों के स्तर पर जो सूचनाएं प्राप्त हो रही हैं, उनमें कहा गया है कि लक्ष्य से काफी कम धान पैदा होने का मुख्य कारण अतिवृष्टि, अनावृष्टि और रोगों से अधिक क्षेत्र में किसान सहायकों का उपलब्ध नहीं होना पाया गया। इसके बावजूद भी धान के पैदावार की दुर्दशा जो किसानों ने झेली है वह किसी से छिपी नहीं है। इससे पूर्व यही स्थिति रबी फसल की भी रही थी। गत 5 वर्षों में उत्तर प्रदेश में कृषि-उत्पादन वृद्धि से सम्बन्धित लगभग पांच योजनाएं पूर्ण हो चुकी हैं। सर्वाधिक महत्वूर्ण प्रशिक्षण एवं सम्पर्क योजना को तो 5 वर्ष पूर्व ही मृत संवर्ग में डाल दिया गया था जिसके दुष्परिणाम अब सामने भी आने लगे हैं। कृषि-आपूर्ति संगठन नामक योजना के बन्द किए जाने से किसान अब बाजार से बेतहाशा मूल्य-वृद्धि के कृषि-यन्त्रों एवं खाद आदि क्रय करने के लिए विवश हैं। वहीं उसके उत्पाद मिट्टी के भाव भी नहीं बिक रहे हैं। यदि किसान गन्ने की फसल को लेकर गन्ने की भांति ही पिस रहा है तो आलू को मुफ्त में किसी को देने के लिए विवश है। कई जिलों से सूचनाएं प्राप्त हुई है कि वहां के किसान अपने खेत खाली करने के लिए मुफ्त में ही आलू खोदकर ले जाने की अनुमति देने के लिए विवष हैं। इन हालातों में किसानों की पीड़ा को समझा जा सकता है, क्योंकि शीतगृहों में किसान आलू नही रख पा रहा है। वे या तो मर चुके हैं अथवा शीतगृहों के मालिक केवल प्रभावशाली लोगों के ही आलू शीतगृहों में रख रहे हैं। शीतगृहों के मालिकों की समस्या यह है कि कहते हैं कि उन्हे व्यापार में घाटा हो रहा है, वे जितनी धनराशि भण्डारण के रूप में पाते हैं उतना तो उन्हे बिजली का बिल देना पडता है।
आलू किसान परेशान
सरकार आलू किसानों के विषय में कुछ सोचती नहीं है और न ही कोई स्थायी प्रभावी योजना बना पा रही है। सरकार का कृषि विभाग एक सफेद हाथी सिद्ध हो रहा है। अत: यहां यह कहना उचित है कि केवल ”किसान पंचायतÓÓ करने से ही किसानों की समस्याएं दूर होने वाली नहीं हैं उसके लिए जिले एवं राजधानी में बैठे अधिकारियों के पेंच कसने होंगे साथ ही किसानों के उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराने के लिए स्थाई योजनाएं भी बनानी होंगी। किसानों की समस्याओं का स्थाई समाधान तलाशना होगा नहीं तो कृषि एवं किसान की हालत बद से बदतर होती जाएगी, जो किसी भी तरह से शुभ नहीं होगी।
गन्ना किसान हलाकान
जिस तरह से आलू किसान परेशान है ठीक उसी तरह से गन्ना किसान की हालत भी खराब है क्योंकि उत्तर प्रदेश में गन्ने की कुल पैदावार का लगभग 40 प्रतिशत से अधिक की पेराई मिलें ही नहीं कर पाती हैं। परिणामस्वरूप किसान को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अपने गन्ने को औने-पौने भाव में क्रेशर एवं कोल्हू वालों के हाथों बेचना पड़ता है। गन्ना क्षेत्र में भी सरकार की उदासीनता के चलते गन्ने का उत्पादन प्रति हेक्टेयर क्षेत्रफल लगातार कम होता जा रहा है। प्रदेश के 67 प्रतिशत गन्ना क्षेत्रफल मेें गत 20 वर्षों तक मात्र दो प्रजातियां ही बोई जाती रही हैं जिस कारण गन्ने का उत्पादन या तो कम हो गया या फिर वह स्थिर हो गया। प्रदेश का गन्ना विभाग किसानों को गन्ने का बीज तक उपलब्ध नहीं करा पाता। प्रदेश में लगभग 600 लाख क्विंटल गन्ना बीज की आवश्यकता होती है, परन्तु गन्ना विभाग कठिनता से 60-65 लाख क्विंटल गन्ने के बीज का वितरण करा पाता है, जबकि देश के कुल गन्ना उत्पादन का लगभग 55-60 प्रतिशत गन्ना उत्तर प्रदेश एवं महाराष्ट्र में ही पैदा किया जाता है। इस कारण ही उत्तर प्रदेश का गन्ना किसान अपनी फसल को जलाने के लिए विवश हो जाता है। यदि किसान को आलू मुफ्त में देना पड़ रहा है और गन्ने को जलाना पड़ रहा है तो ऐसी हालत में किसान पंचायत का क्या लाभ है?
बाजार के हवाले किसान
हमारी सरकार ने केवल किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी को समाप्त करने का कार्य ही नहीं किया है अपितु उनके उत्पादन की खरीद को काफी कम करके उनके एक बहुत बड़े वर्ग को, जो कि छोटे किसान एवं मझौले किसानों का है उसे पूरी तरह से बाजार के हवाले कर दिया है। जिसके परिणामस्वरूप किसान अपनी फसल को जल्द से जल्द औने-पौने दामों में बेचने के लिए विवश है। इसके लिए उसे या तो घाटे का सौदा करना पड़ता है या फिर आत्महत्या करने को बाध्य होना पड़़ता है।
यही कारण है कि हाल ही में मध्य प्रदेश में किसान आन्दोलन के दौरान गोली लगने से 6 किसानों की मृत्यु भी हो गई है, यह एक दुखद स्थिति है। वर्तमान में किसान का खेती से भागने का कारण यही है कि फसल अच्छी होने के उपरान्त भी उसे अपने उत्पाद का उचित भाव नहीं मिल पा रहा है। इसी स्थिति के चलते किसान बर्बाद हो रहा है और कृषि क्षेत्र में आये इस संकट के कारण लाखों परिवारों पर भूख का साया मंडराने लगा है।

www.krishakjagat.org
Share
Share