आदिवासियों की फसल रामतिल

www.krishakjagat.org
Share

हमारे देश का करीब 20 प्रतिशत क्षेत्र आदिवासी जनजातियों का है, आदिवासी क्षेत्रों में रामतिल, मुख्य खरीफ के रूप में उगाई जाती है इसे क्षेत्रों में जगनी भी कहा जाता है, इसके तेल की विशेषता यह है कि इसमें 25 से 35 प्रतिशत प्रोटीन होता है, आदिवासी क्षेत्रों में यह महत्वपूर्ण फसल इसलिए है क्योंकि यह पथरीली, कम उपजाऊ जमीन में कम पानी में यह अच्छी उपज देती है।
भूमि का चयन एवं तैयारी- रामतिल किसी भी तरह की भूमि में उगाई जा सकती है, इसकी खेती पहाड़ी क्षेत्रों में, रेतीली, ढलवा, हल्की और पथरीली भूमि में की जाती है, वर्षा आरंभ होने के पश्चात खेत को दो बार देशी हल में जुताई करें, इसके बाद दो बार बखर चलाकर भूमि अच्छी तरह तैयार करें।
फसल प्रणाली- रामतिल को अनाज वाली एवं दलहनी फसलों के साथ बोया जाता है, परंतु इसकी उपज मिश्रित बोने की अपेक्षा अकेले बोने पर ज्यादा होती है, इसके फसल चक्र विशेष विभिन्न स्थानों पर लाभदायक पाये गए हैं।
उन्नत जातियां
उन्नत जातियों का बीज उपलब्ध होने पर देशी जातियां या स्थानीय जातियां न बोएं।
बीज दर
बोने के लिये, उन्नत जातियों के चयन के लिए प्रयत्न करना चाहिए। यदि हम कतारों में बोते हैं तो 5 किलो बीज एवं छिड़काव विधि में आठ किलो बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है।
बीजोपचार
फसल को बीज जनित रोगों से बचाने के लिये बोने से पहले बीजों का थाइरम या केप्टान जैसे फफूंदीनाशक दवा से 3 ग्राम प्रति किलो बीजोपचार के पहले उपचारित करना चाहिए। बीजोपचार के पहले स्वस्थ बीज प्राप्त करने के लिए बोवाई के पूर्व बीज को 4 प्रतिशत नमक के पानी में डुबोकर पोछें। बीज अलग कर लो एवं तली में बैठे बीज को छाया में सुखाएं। फिर उपचारित करें।
बोवाई समय
रामतिल मुख्यत: खरीफ फसल के रूप में बोई जाती है। इसकी बुवाई का उपयुक्त समय मध्य जून से अगस्त तक है। इसकी बोनी का समय जलवायु पर निर्भर करता है। विभिन्न राज्यों के लिये उपयुक्त समय निम्नलिखित है।
बुवाई की विधि
बुवाई की विधि भूमि के किस्म पर निर्भर करती है।
– जहां भूमि समतल है, वहां पर रामतिल की बोनी दुफन से 30 से.मी. की दूरी पर निकाली कतारों से करें।
– जो भूमि रेतीली पथरीली हो गहराई कम हो वहां कतारों से बुवाई संभव नहीं होता ऐसी भूमि में छिड़काव विधि से बुवाईज्ञ करें।
– बीजों को पूरे खेत में समान रूप से वितरण करने के लिये बीज 1:20 के अनुपात से गोबर खाद को बारीक मिट्टी के साथ मिलाकर बोया जाए।
खाद एवं उर्वरक
जैव उर्वरक कल्चर (पीएसबी) भूमि में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध स्फुर को उपलब्ध कर फसल को लाभ पहुंचाता है। 50 ग्राम पीएसबी ताजा कल्चर प्रति किलो बीज के हिसाब से बीज के पूर्व पी.एस.बी.कल्चर को जब आखिरी बखर चलाते है जमीन में हल्की नमी भी रहती है तब 5-7 किलो प्रति हे. की दर से सूखी मिट्टी के साथ या गोबर की बची खाद के साथ मिलाकर खेत में समान रूप से बिखेरे।
नींदा नियंत्रण
बुआई से 15 दिन बाद जब हम अनावश्यक पौधों की छंटाई करवाते है। तभी खरपतवार भी नष्ट कर देना चाहिये। पौधों से पौधों की दूरी 8 से 10 सेमी. होना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो फसल में नाइट्रोजन देने से पूर्व बुवाई के समय लगभग एक महीने बाद फिर खरपतवार नियंत्रण के लिये एलाक्लोर 1.5 ग्रा. सक्रिय अवयव प्रति हेक्टेयर अथवा पेन्डिमेथिालिन 1.0 किग्रा., सक्रिय अवयव प्रति हेक्टेयर 500 लीटर पानी में बोनी के तुरंत बाद छिड़काव करें।

www.krishakjagat.org
Share
Share