बीमा कंपनियों के टोल फ्री नं. हुए धराशायी

किसान हुए परेशान
(विशेष प्रतिनिधि)
इन्दौर। प्रदेश में विगत सप्ताह के अंतिम दिनों में हुई चक्रवाती वर्षा से खरीफ फसलों को भारी नुकसान हुआ है। विशेषकर मालवा-निमाड़ क्षेत्र में सोयाबीन व उड़द की कटी फसल अथवा कटाई के लिए तैयार खड़ी फसल को इस वर्षा ने क्षति पहुंचाई है। किसान की 3 माह की मेहनत पर एक दिन में पानी फिर गया। हलाकान किसान फसल बीमा कम्पनियों को फोन लगाने दौड़ा लेकिन कम्पनियों के टोल फ्री नं. ही नहीं लग रहे। परेशान किसान ने कृषि विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों से गुहार लगाई, लेकिन उन्होंने भी किसान को प्राथमिक सोसायटियों और बैंकों का रास्ता दिखा दिया। प्रदेश किसानों की यह स्थिति तब है, जब प्रदेश के मुखिया से लेकर देश के मुखिया तक आगामी चुनाव का शंखनाद कर रहे हैं।

अचानक हुई इस चक्रवाती वर्षा से इन्दौर-उज्जैन संभाग विशेषरूप से प्रभावित हुए हैं। इन संभागों में खरीफ की प्रमुख फसल सोयाबीन, उड़द, कपास आदि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

वर्षा से खेतों में पानी भर गया, कटी हुई सोयाबीन पानी में डूब कर खराब हो गई। किसान श्री बाबूलाल धाकड़ बताते हैं कि 35 बीघा में लगी सोयाबीन में से 17 बीघा की कटी सोयाबीन पानी में डूब गई, शेष खड़ी फसल भी जलभराव के चलते झुक गई है।

श्री धाकड़ रतलाम जिले के शेरपुर खुर्द के किसान हैं। ग्राम पिपल्यासोदीया के श्री महेश पाटीदार की 20 बीघा की सोयाबीन व उड़द की कटी फसल में बारिश से अंकुरण हो गया। फसल बीमा की नियम-शर्तों में बंधे होने से इन किसानों की इसका लाभ ही नहीं मिल पा रहा है। आलोट तहसील में ऐसे 1-2 नहीं 32 गांव हैं। इसी तरह की स्थिति नीमच जिले में भी है। जिले के सेमली हस्तपुर, हासपुर, दांगड़ी, सरोलिया, बोरखेड़ी, सुवाखेड़ा, पाडलाखेड़ी, मोड़ी, मोरगां आदि में भी चक्रवाती वर्षा से कटी सोयाबीन की फसल में अंकुरण, फसल का सडऩा जैसी शिकायतें हैं तो सुंद्रेल के श्री लोकेश गंगाराम पाटीदार की कपास की फसल तेज हवा से आड़ी होने जैसे नुकसान भी हैं। कपास में फूल-पूड़ी आने के दौरान वर्षा से उत्पादन घटने की चिंता भी किसानों को है। वर्षा से नुकसान की खबर बीमा कम्पनियों को देने के लिए उनके टोल फ्री नं. लग ही नहीं रहे हैं। देवास जिले के ग्राम जलोदियादेव के श्री दौलत सिंह पटेल को गत वर्ष भी कालातीत ऋणी होने से फसल बीमे का लाभ नहीं मिला, इस बार भी 35 बीघे की सोयाबीन में लगभग 70,000 रुपए के नुकसान की भरपाई के लिए फसल बीमा पर भरोसा कम ही है।

फसल बीमा के जोखिम : फसल बीमा सुरक्षा के तहत बीमा कम्पनियों द्वारा किसान की खड़ी फसल, फसल पूर्व बुवाई तथा फसल कटाई के पश्चात के जोखिमों को भी शामिल किया जाता है, लेकिन इस योजना में जंगली जानवरों जैसे- हाथी, नील गाय, जंगली सुअर आदि द्वारा नष्ट की जाने वाली फसलों से संबंधित जोखिम और नुकसान को शामिल नहीं किया गया है। इसी तरह यदि किसी एक ही गांव के अलग-अलग क्षेत्रों में अतिवृष्टि या पाला पडऩे से फसल प्रभावित होती है, तो ऐसे गांवों के अन्य क्षेत्र में सामान्य उत्पादन होने पर उसे बीमा लाभ नहीं दिया जाता है। इससे प्रीमियम देने के बाद भी पीडि़त किसानों को बीमे का शत प्रतिशत लाभ नहीं मिल पा रहा है। फसल बीमे की विसंगतियों पर सवाल उठते रहे हैं।

वर्तमान परिस्थितियों में भी बीमा कम्पनियां किसानों को टालमटोल का रवैया अपना रही है। टोल फ्री नं. धराशायी हुए पड़े हैं, जबकि कम्पनियों के क्षेत्रीय प्रतिनिधि कहे जाने वाले जिम्मेदार गायब हैं। नीमच जिला प्रशासन ने जिले में कार्यरत बीमा कम्पनी आईसीआईसीआई लुम्बार्ड से संपर्क के आभाव में सभी संबंधित विभाग व संस्थाओं को निर्देश देते हुए किसानों को सोसायटियों व बैंकों में अपने नुकसान की जानकारी देने के निर्देश दिये हैं।
बीमा कंपनियों को कड़े निर्देश
हाल ही में हुई बारिश से फसलों को नुकसान नहीं हुआ है बल्कि धान एवं कपास जैसी प्रमुख फसलों को लाभ हुआ है। जल्दी बोई गई सोयाबीन को कुछ जिलों के लो लैण्ड एरिया में डूबने से नुकसान की संभावना है। कलेक्टरों को सूचना के आधार पर सर्वे कराने के लिए कहा गया है। इसके साथ ही फसल बीमा कंपनियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए उन्हें निर्देश दिया गया है कि कलेक्टरों द्वारा फसल कटाई प्रयोगों के आधार पर जारी किए जाने वाले नोटिफिकेशन पर शीघ्र बीमा दावे की कार्यवाही करें। 
– मोहनलाल, संचालक कृषि (म.प्र.)
किसान क्या करें
फसल बीमा व्यवसाय से जुड़े सूत्रों ने कृषक जगत से चर्चा में बताया कि यदि खेतों में जल-भराव हुआ है या फसल की कटाई होने के बाद नुकसान हुआ है और संबंधित बीमा कम्पनी से सम्पर्क नहीं हो पा रहा है तो किसान अपने बैंक या कृषि विभाग के माध्यम से भी हुए नुकसान की लिखित सूचना बीमा कम्पनी तक पहुंचा सकते हैं। इस तरह का क्लेम स्थानीय आपदा के अंतर्गत आयेगा। यदि पूरे क्षेत्र में वर्षा से नुकसान हुआ तो यह सामान्य प्रक्रिया के तहत फसल कटाई प्रयोग के आधार पर परिणामानुसार क्लेम बनेगा।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना अपनी प्रारंभ काल से ही बीमा कम्पनियों की व्यवसायिकता में जकड़ी रही है। बीमा कम्पनियों का उद्देश्य ‘हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा होय’ वाली इस योजना से सिर्फ प्रीमियम के रूप में करोड़ों रु. कमाने का रहा है जिसके लिये न तो कोई बड़ा भारी नेटवर्क चाहिए न ही अत्यधिक संसाधनों की आवश्यकता है। कई कंपनियां तो सिर्फ ‘वन मैन शो’ के आधार पर राज्यों में इस योजना को संचालित कर रही है। मध्य प्रदेश में तो सरकार ने भी इसे आगामी चुनाव में किसानों के वोट बैंक को लुभाने के लिये जोर-शोर से बीमा क्लेम वितरण कार्यक्रम आयोजित किये। हालांकि यहां भी कम्पनियों ने अपनी कुशल व्यवसायिकता का परिचय देते हुए बीमा क्लेम को गणना के फार्मूले में उलझा कर नाममात्र की राशि के क्लेम अधिकाधिक संख्या में बनाये।

कृषि विशेषज्ञ एवं जिलों के कृषि अधिकारियों का कहना है कि इस वर्षा से सोयाबीन पर 1-2 प्रतिशत ही नकारात्मक प्रभाव पड़ा है वह भी केवल वहां, जहां सोयाबीन की बोवनी शीघ्र हो गई थी। इसी कारण कटाई भी शीघ्र प्रारंभ हो गई। धार जिले के ग्राम बोरूद के किसान श्री बद्रीलाल केशाजी राठौर भी इस बात का समर्थन करते हैं। उनकी सोयाबीन की फसल में इस वर्षा से पानी की कमी पूरी हो गई और सोयाबीन का अच्छा उत्पादन आने की संभावना है। साथ ही रबी में चने की फसल लेने में इस वर्षा की नमी का लाभ मिलेगा। विशेषज्ञ भी कहते हैं कि रबी फसलों विशेषकर चने की फसल के लिए यह वर्षा अत्यंत उपयोगी साबित होगी।

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