मूंग उत्पादन की उन्नत तकनीक

भूमि
मूंग की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टो में उगाया जा सकता है, लेकिन अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये दोमट या बलुई दोमट मिट्टी, जिसमें जीवांश्म पदार्थ की प्रचुर मात्रा व मृदा का पीएच मान सामान्य हो सर्वोत्तम मानी जाती है।
भूमि की तैयारी
मूंग की खेती के लिये रबी फसलों के कटने के तुरन्त बाद खेत की तुरन्त जुताई कर 4-5 दिन छोड़कर पलेवा करना चाहिए। पलेवा के बाद 2-3 जुताईयां देशी हल या कल्टीवेटर से कर पाटा लगाकर खेत को समतल एवं भुरभुरा बनाये। इससे उसमें नमी संरक्षित हो जाती है व बीजों से अच्छा अंकुरण मिलता है। दीमक से बचाव के लिये क्लोरोपायरीफॉस 1.5 चूर्ण 20-25 कि.ग्रा./है. के मान से खेत की तैयारी के समय मिट्टी में मिलाना चाहिये।
बुआई समय
मूंग की लगभग जुलाई माह तक बोनी कर देना चाहिये।

मूंग ग्रीष्म एवं खरीफ दोनों मौसम की कम समय में पकने वाली एक दलहनी फसल है। इसके दाने का प्रयोग मुख्य रूप से दाल के लिये किया जाता है जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट एवं बसा होता है। दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में गठानें पाई जाती हैं जो कि वायुमंडलीय नत्रजन का मृदा में स्थिरीकरण एवं फसल की खेत से कटाई उपरांत जड़ों एवं पत्तियों के रूप में प्रति हेक्टेयर लगभग 1-1.5 टन जैविक पदार्थ भूमि में छोड़ा जाता है जिससे भूमि में जैविक कार्बन का अनुरक्षण होता है एवं मृदा की उर्वराशक्ति बढ़ाती है।

बीज दर एवं उपचार
बीज दर उसके बीज के आकार पर निर्भर करता है। बुआई हेतु 25-30 कि. ग्रा./हे. बीज की आवश्यकता पड़ती है। बुवाई से पूर्व बीज को रसायनिक दवा 2 ग्राम थायरम+1 ग्राम कार्बेनडाजिम प्रति किलो बीज के बाद राईजोबियम कल्चर, पी.एस.बी. कल्चर एवं ट्राइकोडर्मा 5 ग्राम प्रत्येक से 1 किलो बीज उपचारित किया जाता है।
बुआई का तरीका
मूंग से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने हेतु हल के पीछे पंक्तियों अथवा कतारों में बुआई करना उपयुक्त रहता है। कतार से कतार की दूरी 22-30 से.मी. रखी जाती है। पौधे से पौधे की दूरी 10-15 से.मी. रखते हुए 4 से.मी. की गहराई पर बोना चाहिये।
खाद एवं उर्वरक
फसल में उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना अधिक उपयोगी होगा। मूंग में 20 किग्रा. नत्रजन, 40 कि.ग्रा. स्फुर व पोटाश की मात्रा 20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिये। जिन क्षेत्रों में जिंक की कमी देखने को मिलती है वहां 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिये। उर्वरकों की पूरी मात्रा बुवाई के समय करना चाहिये।
सिंचाई
फसल पकने के 15 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर देना चाहिये।
खरपतवार नियंत्रण
मूंग की फसल में नींदा नियंत्रण सही समय पर नहीं करने से फसल की उपज में 40-60 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। फसल व खरपतवार की प्रतिस्पर्धा की क्राीिन्तक अवस्था मूंग में प्रथम 30 से 35 दिनों तक रहती है। इसलिये प्रथम निंदाई-गुड़ाई 15-20 दिनों तथा द्वितीय 35-40 दिन पर करना चाहिये। कतारों में बोई गई फसल में व्हील हो नामक यंत्र द्वारा यह कार्य आसानी से किया जा सकता है।
कटाई एवं गहाई
मूंग की फसल क्रमश: 65-70 दिन में पक जाती है। मार्च में बोई गई फसल मई में तैयार हो जाती है। फलियां पक कर हल्के भूरे रंग की अथवा काली होने पर कटाई योग्य हो जाती है। पौधे में फलियां असमान रूप में पकती हैं यदि पौधे की सभी फलियों के पकने की प्रतीक्षा की जाये तो ज्यादा पकी हुई फलियां चटकने लगती है अत: फलियों की तुड़ाई हरे रंग से काला रंग होते ही 2-3 बार में करें एवं बाद में फसल को पौधे का साथ काट लें। अपरिपक्वास्था में पलियों की कटाई करने से दानों की उपज एवं गुणवत्ता दोनों खराब हो जाते हैं। हंसिए से काटकर खेत में एक दिन सुखाने के उपरांत खलिहान में लाकर सुखाते हैं। सुखाने के उपरांत डंडे से पीट कर या बैलों को चलाकर दाना अलग कर लेते हैं। वर्तमान में मूंग एवं उड़द की थ्रेसिंग हेतु थ्रेसर का उपयोग कर गहाई कार्य किया जा सकता है।

 उन्नत किस्मों का चयन
मूंग के अच्छे उत्पादन के लिये सदैव उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए क्योंकि स्थानीय किस्में लंबे समय में पकती है तथा रोग व व्याधियों का प्रकोप अधिक होता है जिससे उपज कम प्राप्त होती है। मूंग की फसल से अधिक उपज प्राप्त करने के लिये निम्नलिखित उन्नत किस्मों का विवरण इस प्रकार है-
किस्म अवधि उपज विशेषताएं 
टी.जे.एम.-3 60-70 10-Dec खरीफ के लिये उपयुक्त, फलियां गुच्छों में लगती है, फली में 8-11 दाने एवं पीला मोजेक एवं पाउडरी मिल्ड्यू रोग हेतु प्रतिरोधक
जे.एम.-721 70-75 Dec-14 पूरे मध्यप्रदेश में ग्रीष्म एवं खरीफ दोनों मौसम के लिये उपयुक्त, पौधे की ऊंचाई 53-65 सेमी. 3-5 फलियां एक गुच्छे में, फली में 10-12 दाने एवं पीला मोजेक एवं पाउडरी मिल्डयू रोग सहनशील
के.-851 65-70 08-Oct खरीफ मौसम के लिये उपयुक्त, पौधे मध्यम आकार के (60-65 से.मी.) एक पौधे में 50-60 फलियां, एक फली में 10-12 दाने एवं दाना चमकीला हरा एवं बड़ा।
एच.यू.एम.-1 65-70 07-Sep खरीफ के लिये उपयुक्त, पौधे
(हम-1)     मध्यम आकार के (60-70 से.मी), एक पौधे में 40-55 फलियां, एक फली में 8-12 दाने एवं पीला मोजेक एवं पर्णदाग रोग के प्रति सहनशील
पी.डी.एम.-11 65-70 10-Dec खरीफ के लिये उपयुक्त, पौधे मध्यम आकार के (55-65 से.मी.), मुख्य शाखायें मध्यम (3-4), परिपक्व फली का आकार  छोटा एवं पीला मोजेक रोग प्रतिरोधी
पूसा विशाल 60-65 Dec-14 खरीफ के लिये उपयुक्त, पौधे मध्यम आकार के (55-70 सेमी.), फली का साइज (अधिक 9.5-10.5 से.मी.), दाना मध्यम चमकीला हरा एवं पीला मोजेक रोग सहनशील।
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