पीला सोना सोयाबीन लगायें

खेत का चुनाव
सोयाबीन की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली माध्यम से गहरी काली मिट्टी उपयुक्त होती है खेत का ढाल इस प्रकार हो की जल निकास अच्छी प्रकार से जाये और खेत में पानी न रुके।
भूमि की तैयारी
रबी फसल की कटाई के बाद 2-3 वर्ष में एक बार गहरी जुताई करें। जुताई की गहराई 15 सेंटीमीटर से अधिक न हो, गहरी जुताई के लिए अप्रैल का अंतिम सप्ताह या मई का पहला सप्ताह उपयुक्त रहता है गहरी जुताई का मुख्य उद्देश्य भूमि में पड़े कीड़ों के अंडे, लार्वा तथा भूमिजनित बीमारियों के जीवाणु को खत्म करना होता है।
खाद एवं उर्वरक
उचित पोषक तत्वों का प्रबंधन एवं पूर्ति सोयाबीन की अच्छी उपज के लिए आवश्यक है बोनी के पहले गोबर का अच्छा सड़ा हुआ खाद 4 टन प्रति एकड़ तथा एनपीकेएस की अनुशंसित मात्रा नाइट्रोजन 8 किलो, फास्फोरस 24 किलो, पोटाश 8 किलो तथा सल्फर 5.8 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से देना चाहिए। इसके आलावा राइजोबियम एवं पीएसबी कल्चर भी संतुलित पोषण में सहायक है।
बीज का चयन-मात्रा
सोयाबीन के लिए बीज दर की मात्रा 28-36 किलोग्राम/एकड़ की सिफारिश की जाती है अगर बीज का आकार छोटा हो तो बीज दर कम तथा बीज का आकर बड़ा होने पर बीज दर बढ़ा देनी चाहिए।

 सोयाबीन खरीफ की एक प्रमुख फसल है, जिसकी खेती लगभग 55 लाख हे. क्षेत्रफल में की जाती है। देश में सोयाबीन उत्पादन के क्षेत्र में म.प्र.अग्रणी है, जिसकी हिस्सेदारी 55 से 60 के मध्य है लेकिन उत्पादन पर नजर डालेंगे तो पायेंगे कि हमारे देश की उत्पादकता 10 क्वि./हे. है, जो कि एशिया की औसत उत्पादन 15 क्ंिव./हे. की तुलना में काफी कम है । अकेले मालवा क्षेत्र में सोयाबीन का क्षेत्रफल लगभग 22 से 25 लाख हे. अच्छादित है।

अंकुरण क्षमता
सोयाबीन के बीज में अंकुरण अन्य फसलों की अपेक्षा कम होती है इसलिए यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए की किसी भी स्थिति में 70 प्रतिशत अंकुरण क्षमता से कम अंकुरण वाले बीज का उपयोग बुवाई हेतु न किया जाय।
बुवाई समय
सोयाबीन की बुवाई के लिए 20-30 जून का समय उपयुक्त माना जाता है बुवाई 75-100 मिलीमीटर बरसात के बाद ही करनी चाहिए कभी कभी असमान्य स्थिति में बुवाई 15 जुलाई तक भी की जा सकती है।
किस्में

  • जल्दी पकने वाली (80 से 95 दिन ) अहिल्या (एनआरसी-3), जेएस -71-05, 90-41, 93-05, 95-60, पंजाब-1,
  • मध्यम अवधि वाली जातियां – (95 से 105 दिन),जेएस- 335, मैक्स -450, पीके-1024, अहिल्या -2
  • देर से पकने वाली जातियां – (105 दिन से अधिक),जेएस 80-21, पीके-472, पीके-461, जेएस 75-46, पीके 74-21, 262 यूपीएसएम-38, जेएस 2, 93-05, 97-52, 20-29, 20-34, एनआरसी 12, 84

बीजोपचार
मृदाजनित एवं बीज जनित रोगों की रोकथाम के लिए कार्बेंडाजिाम 50 प्रतिशत डब्ल्यू पी. की 2-3 ग्राम मात्रा 1 किलोग्राम सोयाबीन के बीज के उपचार हेतु सिफारिश की जाती है। यह एक अन्त: प्रवाही फफूंद नाशक है जो पौधे की फफूंद जनित बीमारियों से संरक्षण एवं उनका नियंत्रण करता है।
कतार-पौधों की दूरी
सोयाबीन में स्पेसिंग बुवाई के समय तथा प्रजाति पर निर्भर है कतार से कतार की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटरतथा पौधे से पौधे के बीच की दूरी 4.5 सेंटीमीटर (2.5 इंच) रखी जाती है जल्दी पकने वाली तथा कम फैलने वाली जातियां जे एस अहिल्या -3 में कतार से कतार की दूरी कम तथा देर से एवं ज्यादा फैलने वाली जाती जैसे जस-335 में कतार से कतार की दूरी ज्यादा रखने की सिफारिश की जाती है।
पौधों की संख्या एवं बुवाई की गहराई
सोयाबीन के खेत में प्रति एकड़ अनुमानित 1.6 से 2.0 लाख पौधे अच्छी उपज के लिए आदर्श है जिसका अर्थ है 1 मीटर लम्बाई में 20 स्वस्थ पौधे यहाँ ध्यान रखने वाली बात है की जाति एवं उसके लक्षण के अनुसार भी पौध संख्या प्रभावित होती है।
अन्तरवर्तीय फसलें
इन्टरक्रॉपिंग के लिए सोयाबीन के साथ अरहर 4:2 के अनुपात में एसोयाबीन के साथ मक्का 4:2, एवं सोयाबीन के साथ टिल 2:2 के अनुपात में बुवाई करें।
जल प्रबंधन
सोयाबीन में सिंचाई की 3 क्रांतिक अवस्थायें है
1. अंकुरण की अवस्था 2.फूलों की अवस्था 3.फली भरने की अवस्था
सोयाबीन में सिर्फ 25-30 प्रतिशत जल का उपयोग फूल आने (वानस्पतिक अवस्था) के पहले होता है तथा 70-75 प्रतिशत जल का उपयोग प्रजनन अवस्था में होता है इस अवस्था में अगर सूखा पड़ता है टी फली बनने में समस्या आती है यहाँ पर एक सिंचाई देना आवश्यक हो जाता है अन्यथा फसल को भरी नुकसान होता है।
खरपतवार प्रबंधन – सोयाबीन की फसल में खरपतवारों का प्रकोप होना, सोयाबीन उत्पादन में कमी का एक प्रमुख कारण है खरपतवारों से सोयाबीन की फसल को 60-65 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है यह नुकसान खरपतवारों की संख्या एवं प्रकृति पर निर्भर करता है, कतार के अंदर उगने वाले खरपतवार ज्यादा हानिकारक होते हैं बजाय दो कतारों के बीच में उगने वाले खरपतवारों से, सोयाबीन की फसल में खरपतवार नियंत्रण की क्रांतिक अवस्था फसल की बुवाई से लेकर 30-40 दिन तक की होती है।
– सोयाबीन की फसल के लिए खरपतवारनाशियों की अनुशंसित मात्रा
1. बुवाई के पूर्व उपयोग में लाये जाने वाले – फ्लूक्लोरेलीन (2.22 लीटर हेक्टेयर) एट्राई फ्लूरेलीन (2.00 लीटर/हेक्टेयर)
2. बोवनी के तुरंत बाद उपयोग में लाये जाने वाले – मेटाक्लोर-2.00 लीटर/हेक्टेयर), पेंड़ीमिथिलीन -(3.25 लीटर /हेक्टेयर)
3. 15-20 दिन की फसल में उपयोगी खरपतवारनाशी – एमेजाथापर 10 एस.एल.(1.00 लीटर/हेक्टेयर), किवजालोफाप इथाइल (1.00 लीटर/हेक्टेयर), फेनाक्सीफाप पी इथाइल (0.75 लीटर / हेक्टेयर), हेलॉक्सिफाप (135 मिली लीटर/हेक्टेयर), क्लोरीम्यूरॉन इथाइल (36ग्राम/हेक्टेयर/फसल सुरक्षा)

 

  • अजय कुमार द्विवेदी 
    email : ajayniws@gmail.com
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