मेडागास्कर पद्धति – धान उत्पादन की उत्तम तकनीक

भूमि का चुनाव
इसके लिए ऐसी मृदा हो जिसमें कार्बनिक पदार्थ ज्यादा हो, उचित सिंचाई की सुविधा हो, उचित जल निकास की व्यवस्था हो, कार्बनिक खादों की पूर्ति के लिए हरी खाद, गोबर की खाद, जीवाश्म खाद, नाडेप कम्पोस्ट आदि का प्रयोग किया जाता है। लवणीय व क्षारीय तथा जल भराव मृदा में श्री पद्धति से धान की खेती नहीं की जा सकती।
खेत की तैयारी
इसके लिए देशी खाद, हरी खाद, नाडेप आदि की आवश्यकता होती है। खेत की तैयारी के समय 15-20 टन गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए। हरी खाद के रूप में सनई, ढैंचा का प्रयोग करें। सनई व ढैंचा को अच्छी प्रकार से पलट कर सडऩे के 10-12 दिन बाद रोपाई का कार्य करना चाहिए। समतल खेत में पौध से पौध एवं लाईन से लाईन दूरी को व्यवस्थित करने के लिए रोलर मार्कर का प्रयोग करना चाहिए। इसके लिए 4-8 लाईन वाले रोलर मार्कर का प्रयोग करें। प्रत्येक 8 लाईन के बाद कृषि क्रियाओं को करने के लिए 30 सेमी. का अन्तराल अवश्य छोड़े ।

जनसंख्या के साथ खाद्यान्नों की मांग को पूरा करना एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। इसके लिये धान की एसआरआई (श्री पद्धति ) काफी सहायक सिद्ध हुई है। इस पद्धति से अन्य पद्धति की अपेक्षा 2 से ढ़ाई गुना अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। एसआरआई पद्धति को अन्य नाम जैसे मेडागास्कर पद्धति, श्री पद्धति, धान सघनता पद्धति आदि नामों से भी जाना जाता है। धान के अधिक उत्पादन हेतु श्री पद्धति तकनीक अपनाकर किसान भाई अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इस तकनीक से धान की खेती करने के लिए निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए।

पोषक तत्व एवं उर्वरक

  • खेत की मिट्टी परीक्षण के अनुसार तत्वों की कमी की पूर्ति हेतु जैविक खादों (नाडेप खाद, गोबर खाद, वर्मी खाद, बायोगैस खाद, नीलहरित काई/अजोला, पी.एस.बी. कल्चर, एजेटोवेक्टर कल्चर) एवं रसायनिक खाद का उपयोग करें।
  • जैविक खाद के रूप में 8 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से उपलब्ध खाद एवं पी.एस.बी. तथा ऐजेटोवेक्टर कल्चर एवं अन्य जैविक उत्पाद का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • रसायनिक खाद का उपयोग नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश (120:60:60) के अनुपात में किये जाए। नत्रजन की आधी मात्रा और स्फुर व पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के पूर्व तथा शेष नत्रजन की आधी मात्रा बराबर-बराबर दो बार में कल्ले फूटते समय व बाली बनने की प्रारम्भिक अवस्था पर प्रयोग करना चाहिए।

नर्सरी तैयार करना
एक हेक्टेयर रोपाई हेतु 100 वर्ग मी. क्षेत्रफल में नर्सरी तैयार करना चाहिए। श्री पद्धति हेतु 5 किलोग्राम बीज की प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। बीज शोधन का कार्य कार्बेण्डाजिम की 2-3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से करें। जिस खेत में रोपाई करना है, पास में ही नर्सरी डालें। नर्सरी हेतु 5-6 इंच उठी, 4 फिट चौड़ी व आवश्यकतानुसार लम्बी क्यारी बनायें। क्यारियों में सड़ी गोबर की खाद व कम्पोस्ट की खाद तथा खेत की भुरभुरी मिट्टी का प्रयोग करें।
रोपाई
श्री पद्धति में 8-12 दिन की पौध रोपाई हेतु उपयुक्त रहती है। पौधों की रोपाई 25 ङ्ग 25 सेमी.की दूरी पर करनी चाहिए। नर्सरी से पौध निकालने हेतु खुर्पी का प्रयोग करना चाहिए, जिससे पौधों की जड़ों में मिट्टी व बीज चोल लगा रहे। 2-3 पत्ती वाली पौध की रोपाई करें। पौध को 2-3 सेमी. की गहराई पर अंगूठे एवं अनामिका की सहायता से 1-1 पौध लगायें। पौधों की जड़ों को सूखने से बचाने के लिए पौधशाला से निकालने के आधे घण्टे के अन्दर रोपाई करने का प्रयास करें। रोपाई का कार्य वगैर पानी भरे खेत में करें। रोपाई के बाद उसी दिन व दूसरे दिन हल्की सिंचाई करें।
जल प्रबंध
खेत में नमी बनाये रखें किन्तु पानी भरा न रहने दें। प्रत्येक 2 मीटर के अन्तराल पर जल निकास हेतु लगभग एक फिट गहरी नाली बनायें। खेत को प्रत्येक 10-12 दिनों के अन्तराल पर 2-3 दिनों तक सूखा रखें, ऐसा करने से पौधों में जड़ों एवं कंसों का विकास अधिक होता है। प्रयोगों द्वारा यह पाया गया है कि प्रति हिल 60-100 पौधा तैयार हो जाता है। खेत में दरार पडऩे पर हल्की सिंचाई करें। पुष्प गुच्छ प्रारम्भ होने की अवस्था में तथा परिपक्वता तक 2-3 सेमी. पानी रखने की संस्तुति की जाती है।
खरपतवार प्रबंध
इसके लिए रोपाई के 10 दिन बाद 3-4 बार कोनोवीडर की सहायता से खरपतावार निकालना चाहिए। कोनोवीडर के प्रयोग से खरपतवार नियंत्रित होता है, साथ ही साथ वायु संचार तथा जीवाणु की संख्या में वृद्धि होती है।
उपज
श्री पद्धति द्वारा धान की खेती करने से 90-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।

  • डॉ. मेघा दुबे
  • डॉ. व्ही.के. वर्मा 
    email: kvkbetul@rediffmail.com
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