फसल उत्पादन हेतु बुवाई विधि

बीजों की बुवाई करने की विधि, विभिन्न कारणों, दशाओं और उद्देश्यों से प्रभावित होती है। जो इस प्रकार है:-
बीज बुवाई विधि
फसलों को अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिये बुवाई विधि जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही बुवाई की गहराई और सिंचाई महत्वपूर्ण मानी जाती है। पर्याप्त अंकुरण नहीं होने पर अधिक पौध संख्या प्राप्त नहीं होती है। जिससे उत्पादन कम हो जाता है। अच्छा अंकुरण प्राप्त करने के लिए बीजों को उचित गहराई पर बोना आवश्यक है। परंतु बीजों को बोने की गहराई निम्न कारकों पर निर्भर करती है :-

विभिन्न फसलों की विभिन्न परिस्थितियों में, बुवाई करने की, भिन्न-भिन्न विधियां अपनाई जाती है। बुवाई की विधि फसल की उत्पादन, बढ़वार व अन्त:कर्षण क्रिया को प्रभावित करती हैं। अत: बुवाई की विधि ऐसी होनी चाहिए, जिससे फसल में खरपतवारों के संक्रमण को रोका जा सके तथा मृदा क्षरण कम हो। खेत में दिन में सिंचाई जल का पूर्ण उपयोग हो सके अर्थात् सिंचाई जल क्षमता बढ़ जाए। बोवाई विधि में बीजों को समान दूरी व गहराई पर बोना हो। ये सभी बात जिस बोवाई विधि में होती है उसमें उत्पादन लागत स्वत: ही घट जाता है और प्रति इकाई क्षेत्र अधिक उत्पादन प्राप्त होता है।

मृदा की नमी– यदि खेत में बुवाई के समय नमी की मात्रा कम हो, तब बुवाई (सामान्य नमी में बोने की अपेक्षा) गहरी करनी चाहिए। इसके विपरीत खेत में पर्याप्त नमी हो तो बीजों की बुवाई उथली करनी चाहिए।
मिट्टी का प्रकार – बलुई मृदा में बुवाई, चिकनी मृदा की तुलना में गहरी करें। क्योंकि बलुई मृदा के जलधारण क्षमता कम होती है, जिससे बीजों को अधिक गहराई में पर्याप्त नमी मिले व अंकुरण अच्छा हो।
बीज का आकार-बड़े आकार के बीज की बुवाई गहरी व छोटे आकार के बीज को उथली भूमि में बुवाई करें।
फसल का किस्म- फसल के दो किस्मों के लिये, बुवाई की गहराई अलग-अलग रखनी पड़ती है। उदाहरण- गेहूं के देशी किस्मों में फोलियो स्टाइल की लम्बाई, बोने गेहूं की तुलना में अधिक होती है। अत: देशी किस्मों की तुलना में अधिक होती है। अत: देशी किस्मों को गहरे बोने पर भी उनमें अच्छा अंकुरण प्राप्त हो जाता है।

फसल एवं किस्म, फसल बुवाई के उद्देश्य, बुवाई के समय नमी का स्तर, मिट्टी का प्रकार, मौसम, बुवाई संसाधनों की उपलब्धता, सिंचाई संसाधनों की उपलब्ध आदि। इन सभी बातों को ध्यान में रखकर बीज बुवाई की विधियां अपनाई जाती है। जिनका वितरण इस प्रकार है:-
 

छिड़काव विधि से बुवार्इ.
इस विधि में बीजों को बोने के लिए सबसे पहले खेत की तैयारी की जाती है। इसके बाद बीजों को हाथों से छिड़ककर बो दिया जाता है। बोने के बाद बीजों को पाटा चलाकर भूमि में मिला दिया जाता है अथवा हल्के कृषि यंत्र जैसे बखर इत्यादि से मिला दिया जाता है। इस विधि में सामान्यत: ऐसे फसलों के बीच बोये जाते हैं जो आकार में छोटे होते हैं जैसे – बरसीम, लूसर्न, धान, बाजरा, सरसों, रामतिल, लघुधान्य आदि। इस विधि को अपनाने से लाभ तो होता ही है परंतु कुछ हानियां होती है जो निम्नलिखित है-

 

लाभ-

  • यह आसान एवं सरल विधि है।
  • बुवाई के लिये किसी यंत्र की आवश्यकता नहीं होती है।
  • इस विधि से कम समय में अधिक बुवाई की जा सकती है।

हानि-

  • अधिक बीज की आवश्यकता होती है।
  • बीज की मात्रा, गहराई एवं बुवाई अन्तरण पर कोई नियंत्रण नहीं रहता है। यदि बीज ज्यादा गहराई पर चले जाते हैं तो उनके सडऩे व सतह पर ही रह जाने पर उनके अंकुरित न होने की संभावना होती है।
  • सिंचाई जल दक्षता कम हो जाती है।
  • निंदाई व गुड़ाई कार्य में बाधा होती है तथा यंत्रों का प्रयोग संभव नहीं हो पाता।

अंकुरण का स्वभाव – फसली बीज को उथला बोना चाहिए। जिनका अंकुरण स्वभाव ऊपरी भूमि होता है, क्योंकि गहराई पर बोने से पौधा बीज -पत्र के सहित भूमि से आसानी से बाहर नहीं आ पाता है जबकि अधो-भूमि अंकुरण वाले बीजों को गहराई पर भी बोया जा सकता है।
रोपण विधि से बुवाई-
बीजों को बीज शैय्या में पौधे तैयार करने के लिये बोया जाता है। पौध तैयार होने के बाद इन्हें उखाड़कर मुख्य खेत में वांछित दूरियों पर कतारों में रोपण किया जाता है।
मेड़ विधि से बुवाई-
कुछ फसलों जैसे- आलू, अरबी, रतालू, शकरकंद, टैपिकोया, गन्ना आदि के पौधों का रोपण भागों या बीजों को तैयार समतल खेतों में न बोकर मेड़ों में बुवाई करना ज्यादा प्रचलित रहता है।
कतार बुवाई विधि की लाभ व हानियां निम्नलिखित है:-
लाभ –

  • बीज की मात्रा पर नियंत्रण रख सकते हैं। तुलनात्मक रूप से इसमें छिड़का विधि से कम बीज उपयोग होते हैं।
  • बुवाई इच्छित गहराई एवं दूरी पर की जाती है।
  • फसल की निंदाई-गुड़ाई करने में आसानी होती है एवं इसके लिए कृषि यंत्रों का उपयोग भी संभव होता है।
  • अधिक सिंचाई दक्षता मिलती है तथा कम समय में अधिक क्षेत्र को सिंचित किया जा सकता है।
  • पौध-संरक्षण के उपायों को क्रियान्वित करने में आसानी होती है।
  • पौध समान दूरियों पर उगते हैं अत: सभी पौधों को समान पोषक तत्व जैसे – खाद, पानी व प्रकाश मिलता है। जिससे सभी पौधों का समान विकास होता है।
  • फसल कटाई में भी आसानी होती है।
  • यदि आवश्यक हुआ तो कतारों के बीच में अन्त:वर्तीय फसलें भी ली जा सकती है।

हानियां –

  • यह बुवाई की एक महंगी विधि है।
  • बुवाई में अधिक समय लगता है।
  • बुवाई के लिए यंत्रों की आवश्यकता होती है।
  • यंत्रों की कार्यविधि एवं संचालन की पूर्ण जानकारी होने पर कभी-कभी किसान को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
कतार विधि से बुवाई
इस विधि से बीजों की बुवाई कतरों में की जाती है। खेत की तैयारी के बाद विभिन्न यंत्रों की मदद से या हाथों से बुवाई या रोपण कतारों में की जाती है। इसमें बुवाई के लिये बीज, नये पौधों तथा वानस्पतिक प्रवर्धित सामग्री की कतारों में बुवाई या रोपाई की जाती है। इसकी विभिन्न विधियां है-
समतल बुवाई विधि- समतल तैयार खेतों में बुवाई की विधियां इस प्रकार है:-
देशी हल के पीछे बुवाई- इस विधि में समतल तैयार खेत में देशी हल के माध्य्म से बनाये गये कूड़ों में बुवाई की जाती है। इसमें दो आदमियों की आवश्यकता होती है। एक हल चलाने व एक बीज डालने के लिए। बीज बुवाई के बाद पाटा चलाकर बीजों को ढंक दिया जाता है।
डिबलिंग विधि- इस विधि के द्वारा डिबलर यंत्र के माध्यम से बुवाई की जाती है। यह एक साधारण यंत्र है। जिसका आकार आयताकार होता है। यह लोहे या लकड़ी के फ्रेम में बनाया जाता है। इसमें खूटियां लगी होती है। जिसकी दूरी कम या अधिक करने की व्यवस्था होती है। फसल के अनुसार बोने की दूरी के अनुसार इन खूटियों को स्थित कर दिया जाता है। यंत्र के बीच एक हत्था लगा होता है। बुवाई के लिये तैयार खेत में खूटियों से छिद्र बनाते जाते है तथा इन छिद्रों में बुवाई कर बीजों को मिट्टी से ढंकते जाते हैं।
ड्रिलिंग विधि – बीजों की बुवाई, बैल चलित या ट्रैक्टर चलित सीड ड्रिल या सीड-कम फर्टिलाईजर ड्रिल के माध्यम से की जाती है। इस विधि में बीज एवं उर्वरक एक ही कतार में डाले जाते हैं।
क्रिस-क्रास विधि- इस विधि से बीजों को दो दिशाओं में समकोणों पर बुवाई करते हैं। पूर्व- पश्चिम दिशा में आधे बीज तथा आधे बीज उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर बुवाई की जाती है। सामान्य तौर पर यह सीड ड्रिल के द्वारा इस प्रकार की बुवाई की जाती है।
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