खरीफ दलहनों की उत्पादन व संरक्षण तकनीक

भूमि
खरीफ दालों को दोमट भूमियों में उगाया जाता है, लेकिन इनको सभी हल्की एवं भारी भूमियों में भी उचित जल प्रबंध द्वारा उगा सकते है। भूमि घुलनशील लवणों से रहित हो एवं उदासीन पी.एच. (पी.एच. 7.0) वाली भूमियां अच्छी मानी जाती है।
बीजोपचार

  • 2 ग्राम थाइरम या कार्बेण्डाजिम फफूंदीनाशी या 6 ग्राम ट्राईकोडरमा मित्र फफूंद प्रति किलो बीज दर से।
  • फिप्रोनिल 5 एस.सी. का 4.5 मि.मी. प्रतिकिलो बीज के हिसाब से 5 मि.मी. पानी में मिलाकर बीजोपचार करें।
  • मोठ व ग्वार में जीवाणुवीय पती धब्बा बीमारी के नियंत्रण हेतु बीज को स्टेप्ट्रोसाक्लिन 100 पीपीएम (10 लीटर पानी में एक ग्राम स्टेप्टोसाइक्लिन) घोल में एक घंटा भिगोने के बाद। अन्त में राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर बुवाई करें।

कतार से कतार की दूरी

  • कतारों की दूरी 30 सेमी से 45 सेमी व पौधों की दूरी 15 से 20 सेमी रखें।
  • खाद एवं उर्वरक बारानी क्षेत्रों में 10 किलोग्राम नत्रजन अथवा 30 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टर की दर से बिजाई से पूर्व उर्वरक देें।

निराई गुड़ाई

  • 30 दिन की अवधि तक निराई गुड़ाई कर सरपतवार अवश्य निकाल दें।
 खरीफ दलहन फसलोत्पादन तकनीकें:-
फसल  मूंग मोठ उड़द              लोविया (चंवला)
उन्नत किस्में आर एम जी – 344 आर एम ओ – 40  कृष्णा, टी आर सी – 19
  आर एम जी – 268 आर एम ओ – 435 9. पन्त, यू, आ सी – 101
  आर एम जी – 492 आर एम ओ – 225 19. पन्त आर एस – 9
  एस मल एल – 668 यू. 1, आई. आर सी.पी – 27  
  आई पी एम – 02 – 03 पी.यू. 94-1 एफ एस – 68  
बीज दर (किग्रा./है.) 15 से 18 किग्रा. 10 से 15 किग्रा. 15 से 20 किग्रा. 15 से 18 किग्रा.
बुआई का समय जून माह में मानसून की पहली बरसात से जुलाई के अन्त तक

कटाई व पैदावार
खरीफ दालों की फलियों पकने के साथ ही फटकर बिखर जाती है। फलियों के झड़कर गिरने से फटकर दानों के छिड़कने से होने वाली हानि को रोकने के लिए फलियों को पूरी तरह पकने के बाद एवं झडऩे से पहले काट लेवें। इसके बाद एक सप्ताह या 10 दिन तक खुली धूप में सुखाएं और फिर गहाई कर दाना निकाल लेें। औसत उपज मूंग से 8-10 क्विंटल, मोठ 5-7 क्विंटल तथा चंवला व उड़द से 10-12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है।

  • केशर मल चौधरी
  • सज्जन चौधरी
  • डॉ. शंकर लाल गोलाडा
  • जगदीश प्रसाद तेतरवाल 
    email: sandeeph64@gmail.com
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