दुधारु गाय एवं भैंसों में प्रजनन प्रबंधन

पशुओं की प्रजनन क्षमता उनके आर्थिक उत्पादन का मुख्य आधार है प्रजनन संबंधी समस्याओं के कारण पशु पालकों को पशु ब्यांत का अन्तराल बढऩे से काफी हानि उठानी पड़ती है अत: पशुओं से अधिकाधिक आर्थिक लाभ लेने के लिए आवश्यक है कि उन्नत नस्ल के पशुओं से कम से कम प्रति वर्ष एक स्वस्थ बछड़ा/बछिया मिलती रहे तथा 8 से 9 महीने तक दुग्ध उत्पादन मिलता रहे और इसके लिए आवश्यक है कि ब्याने के बाद 70 से 90 दिनों के अंदर पशुओं को पुन: गाभिन हो जाना चाहिए। सामान्यत: पशु ब्याने के 45 से 50 दिन के बीच नियमित रुप से ऋतु चक्र में आना प्रारंभ कर देते हैं, पशु के गर्भ न ठहरने पर जब गाय/भैंस तीन से अधिक बार 20 से 21 दिन के अन्तर पर गर्मी में आने के लक्षण दिखाती है और प्रत्येक बार सांड या कृत्रिम गर्भाधान विधि द्वारा गाभिन कराने पर भी गाभिन नहीं हो पाती है तो इस तरह के पशु को रिपीट ब्रीडर या पुन: गर्भाधान की आवश्यकता वाला पशु कहा जाता है इस तरह के पशुओं में प्रत्येक बार 20 से 22 दिन के अन्तराल में गर्मी में आता है और गाभिन कराने के बाद भी उसका गर्भ नहीं ठहरता है । पशुओं में गर्भ न ठहरने के अनेक कारण होते हैं। जिनमें मुख्य कारण निम्नलिखित हैं।

  • पशु जननांगों से संबंधित विशेष प्रकार के जीवाणु जैसे ब्रूसेला, ट्राईकोमोनास, लिस्टिरिया, कैम्पाइलोबेक्टर आदि के संक्रमण से ग्रसित पशु में गर्भ नहीं ठहरता तथा पशु गर्मी के लक्षण 20 से 21 दिन के अन्तराल पर प्रदर्शित करता रहता है इस तरह पशु में रिपीट ब्रीडिंग की समस्या बन जाती है ।
  • खनिज लवण तथा विटामिन की कमी के कारण भी नियमित रुप से दुधारू पशुओं में गर्भ नहीं ठहरता है अगर दुधारू पशुओं के दाने में 50 ग्राम खनिज लवण प्रतिदिन दिया जाये तो इस समस्या को आसानी से दूर किया जा सकता है ।
  • गाभिन पषु को संतुलित आहार न देना व उचित देखभाल न करना भी रिपीट ब्रीडिंग का एक महत्वपूर्ण कारण बन जाता है ।
  • कभी-कभी पशुओं के अण्डाशय में कमी अथवा हार्मोन की कमी के कारण भी गर्भ नही ठहरता है ।
  • प्राय: गर्मी के मौसम में भैंसों में ऋतु चक्र के शांत लक्षण देखने को मिलते हैं। ऐसे में यदि पशु पालक उचित समय पर पशु को गाभिन नहीं कराते हैं तब भी रिपीट ब्रीडिंग की समस्या बन जाती है अत: पशु पालकों को पशु के गर्मी के लक्षण नियमित रुप से सुबह-शाम देखना चाहिए ।
  • संक्रामक गर्भपात की बीमारी में पशुओं में गर्भधारण करने के छ: महीने बाद अचानक गर्भपात हो जाता है। जिसका कारण बच्चेदानी में किसी संक्रामक रोग का फैलना या उसे ब्रूसेलोसिस या लप्टोस्पाईरोसिस या लिस्टोरियोसिस का रोग हो जाना अथवा भैंसों में गर्भपात की प्रवृत्ति तथा हार्मोन्स का असंतुलन हो सकता है। ऐसी स्थिति में भैसों को स्वस्थ सांड से गर्भित कराना चाहिए । कृ़ित्रम गर्भाधान प्रणाली द्वारा वीर्यदान कराने से इस रोग की संभावना नहीं रहती क्योकि सांड केन्द्रों में सांडों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण होता रहता है ।

निदान:

  • गर्भाशय के रोग के होने पर जनन अंगों में संक्रमण होता है और उनमें सूजन आ जाती है इसके लिए एन्टी बायोटिक दवाओं एवं आयोडीन के घोल का प्रयोग करना चाहिए ।
  • हार्मोन्स के संतुलन के लिए शरीर को प्राप्त होने वाले पौष्टिक तत्वों विशेषकर प्रोटीन और खनिज लवण जैसे कैल्सियम, फास्फोरस, तांबां, जस्ता, लोहा एवं कोबाल्ट, आयोडीन आदि की पशुओं के आहार में उचित एवं संतुलित मात्रा उपलब्ध होना जरूरी है । साथ ही समय रहते भैंसों में ब्रूसेलोसिस का टीके लगवाना चाहिए। परंतु गाभिन भैंसों में यह टीका नहीं लगवाना चाहिए ।
  • प्राय: गाभिन पशु में यह देखा गया है कि छ: महीने के गाभिन होने के बाद या व्याने के बाद भैंसों में बच्चेदानी बाहर निकल आती है इसमे बच्चेदानी का कुछ भाग या पूरा भाग बाहर आ जाता है इस स्थिति में पशु को बचाना मुश्किल हो जाता है । यदि उचित समय में इलाज न किया गया तो यह स्थिति भयानक रुप ले लेती है। ऐसी स्थिति में बच्चेदानी निकलने के बाद उसके निकले हुए हिस्सों को एक ग्राम पोटैशियम परमैग्नेट को एक लीटर पानी में मिलाकर धीरे-धीरे साफ करना चाहिए। उसके बाद बच्चे दानी को साफ हाथों से अन्दर कर देना चाहिए । इसके बाद पशु के रहने के स्थान को इस तरह से बनायें कि अगले पैर नीच रहें तथा पिछले पैर उंचाई पर रहें। इसके लिए अगले पैरों के नीचे समतल गड्ढा खेाद देना चाहिए। कपड़े की एक रिंग बनाकर बच्चेदानी के बाहरी भाग को इस प्रकार बांधे कि बच्चेदानी बाहर न आ सके। इसके लिए रिंग को रस्सी से बंाधकर मादा पशु के बच्चेदानी पर इस तरह से लगाये कि वह बच्चेदानी के बाहर ही लगी रहे तथा रस्सी के दोनों सिरों को अयन के आगे बांध दे जिससे कि भैंस को बच्चेदानी रेाकने में सहायता मिले।
  • मादा पशु को कैल्सियम एवं फास्फोरस 10 से 15 दिनों तक प्रतिदिन नियमित रुप से 50 ग्राम खिलाये साथ ही खाने के लिए खुराक में थोड़ी कमी कर दें तथा आहार में तरल पदार्थ अलग कर देना चाहिए। पशु पालक अक्सर बच्चेदानी के निकले भाग को जूते या गंदे हाथों से ही अन्दर कर देते हैं । इससे संक्रमण होने की संभावना बनी रहती है ऐसा करने से पशु पालकों को बचना चाहिए साथ ही गाभिन पशु को कभी भी मारना या दौड़ाना नहीं चाहिए। गाभिन पशु को पूरे सूखे चारे पर नहीं रखना चाहिए और उसे कुछ न कुछ मात्रा में हरा चारा भी देना चाहिए।
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