मिट्टी स्वास्थ्य कहीं और न बिगड़े

कृषि प्रधान देश होने के बाद भी देश में सामान्य किसानों के जीवन स्तर में कोई सकारात्मक सुधार नहीं आ पाया है। सरकार द्वारा दी गयी सुविधाओं के बाद भी किसान आने वाली फसल के परिणाम पर निर्भर रहता है। प्राकृतिक विपदा या किसी अन्य कारण से फसल की हानि सहने की क्षमता उसमें नहीं रहती, फलस्वरूप वे आत्महत्या के लिये बाध्य हो जाता है। दिन पर दिन फसल उत्पादन की लागत भी बढ़ती चली जा रही है। परंतु प्रथम हरितक्रांति के 45-50 वर्ष बाद भी किसान फसल उत्पादन उर्वरकों का संतुलित उपयोग नहीं कर रहा है। उदाहरण के तौर पर हम स्फुर खाद का किसान द्वारा खड़ी फसल पर कई क्षेत्रों में डाला जाना है। जिसकी उस फसल पर कोई उपयोगिता नहीं है। किसानों द्वारा की जाने वाली इस गंभीर गलती के लिये कृषि विस्तार में लगे कार्य करता भी है जो किसान को उर्वरकों के सही उपयोग के बारे में वर्षों से नहीं समझा पाये। उर्वरकों के संतुलित तथा सही तरीके की बात तो दूर रही। इसी का परिणाम है कि अब हमें मिट्टी के स्वास्थ्य की चिन्ता सताने लगी है।
कृषि देश में कुल सकल उत्पाद का 30 प्रतिशत का योगदान देती है, यदि किसानों की वास्तविक आवश्यक समस्याओं का निदान कर उन्हें सही दिशा में निर्देशन किया जाय तो यह योगदान 50 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड इस दिशा में एक यंत्र का काम कर सकता है। परंतु स्वास्थ्य कार्ड के बाद यदि हम किसानों को कार्ड के आधार पर संतुलित खाद के उपयोग के साथ-साथ उर्वरकों के देने के तरीके तथा समय का कार्यान्वयन नहीं करा पाये तो पूरी प्रक्रिया जो सुनने व सोचने में बहुत आकर्षक दिखती है, का कोई लाभ नहीं होगा। मिट्टी परीक्षण की स्वास्थ्य कार्ड दी जाने वाली जानकारी की विश्वसनीयता भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। इस पर निगरानी रखना भी अति आवश्यक है अन्यथा मिट्टी के स्वास्थ्य की और बिगड़ जाने की संभावना रहेगी।

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