बरसात में – पशुओं की देखभाल ऐसे करें

रोजाना सबेरे-शाम दुग्धशाला के सारे पशुओं को बाडे के आंगन में निकाले और उनका बारीकी से निरीक्षण करें। जो पशु सुस्त दिखाई दें उसे अलग करें और पशुओं के डाक्टर द्वारा उसकी जांच करवाकर उसका उचित इलाज करवाये तथा दवा दे। पशुओं के चलने का ढंग देखें अगर कोई पशु लंगड़ा कर चल रहा है इसका मतलब उसके पैरों में कहीं ना कहीं दर्द हो सकता है उसके खुरों के बीच कांटा चुभा हो सकता है। अगर ऐसा है तो एक चिमटा लेकर उससे कांटा निकाल दें तथा वहां जिवाणु नाशक दवा लगायें और पशुओं के डॉक्टर द्वारा उसकी जांच करवाकर उस्का उचित इलाज करवायें तथा दवा दें। अगर कोई पशु की आंख लाल दिखाई दे, उससे लगातार पानी बह रहा हो, उसमें गंदगी हो तो उसमे कोई संक्रमण हो सकता है। ऐसी हालत मे थोड़ा पानी उबालकर ठंडा करें और उसमें एक चुटकी बोरिक पावडर घोल और उस घोल से उसकी आंख धोयें। बाद में उसमें दवा की दो से तीन बूंदें डालें। बाद में पशुओं के डॉक्टर द्वारा उसकी जांच करवाकर उसका उचित इलाज करवायेंं।
पशु के कानों की जांच करें, वे साफ -सुथरे होने चाहिये, अगर साफ नहीं है तो थोड़ी सी साफ -सुथरी सर्जिकल कपास में थोड़ी सी जंतुनाशक दवा लगाकर उससे कान साफ किया जा सकता है। लेकिन कान के भीतर कुछ भी मत डालिये नहीं तो पशु को पीड़ा हो सकती है। कान में संक्रमण हो और उससे बदबूदार स्त्राव बह रहा हो तो पशुओं के डॉक्टर द्वारा उसकी जांच करवाकर उसका उचित इलाज करवायें तथा दवा दें। बरसात मे अक्सर पशु भीग जाते हैं उससे उनकी नाक से स्त्राव बहता है। ऐसा होने पर नीलगिरी तेल की कुछ बूंदे पशु के दोनों नथूनों में डालें।

अगर पशुपालन किफायती करना है तो पशुओं के आरोग्य स्वास्थ्य पर ध्यान देना निहायत जरुरी है क्योंकि अगर उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं होता तो वे बेचैन होते है, उनका चारा ग्रहण कम हो जाता है और उनका उनकी शरीर क्रियायें जैसे श्वसन, पाचन, गोबर तथा मूत्र उत्सर्जन, दूध निर्माण तथा दूध श्रवण यह सारी प्रभावित हो जाती है और आखिरी नतीजा दूध उत्पादन मे कमी होती है। इससे पशुपालक किसान का आर्थिक नुकसान होता है, यह टालने हेतु पशुओं का स्वास्थ्य हमेशा ठीक रखने हेतु निम्नलिखित उपाय करें।

पशुओं के कुछ महत्वपूर्ण रोग नीचे दिये है।
खुरपका मुंहपका रोग :यह पशुओं का एक महत्वपूर्ण रोग है जो विषाणुओं के कारण होता है।
खुरपका मुंहपका रोग के महत्वपूर्ण लक्षण : इस रोग से संक्रमित पशु के मुंह के अंदर मे मसूढ़ों पर, जीभ पर फोड़े होते हैं जो कुछ समय पश्चात फूट जाते हैं जिससे वहा जख्म बन जाते है। इन जख्मों के कारण पशु को दर्द होता है अत: वह चारा नहीं खा सकता। और इससे वह कमजोर हो जाता है । पशु के मुंह से लगातार चिपचिपी लार बहती है जो जमीन तक लटकती है। इसी प्रकार पशु के खुरों के बीच भी पर फोड़े होते हैं जो कुछ समय पश्चात फूट जाते हैं जिससे वहां जख्म बन जाते हैं। इससे वह ठीक से चल फिर नहीं सकता और चराई नहीं कर सकता और इससे वह कमजोर हो जाता है। वैसे तो पशुओं का टीकाकरण बरसात शुरू होने से पहले ही हो जाना चाहिए।
रोग विरोधी टीकाकरण: इस रोग से गोवंशीय पशुओ का बचाव करने हेतु एक ही उपाय है और वह है सभी गौवंशीय खुरपका मुंहपका रोग विरोधी टीकाकरण बरसात शुरू होने से पहले करना ताकि उनमें इस रोग विरोधी शक्ति आ जाए।
गलघोटू रोग : यह एक जीवाणुजन्य रोग है जो पाश्चुरेल्ला मल्टोसिडा नामक जीवाणु के प्रकार के संक्रामण के कारण होता है। इस रोग से गोवंशीय पशुओं का बचाव करने हेतु उपाय है यह है सभी गौवंशीय गलघोटू रोग विरोधी टीकाकरण बरसात शुरू होने से पहले करना ताकि उनमे इस रोग विरोधी शक्ति आ जाए ।
काला ज्वर : यह एक जीवाणुजन्य रोग है जो बसिलस अंथ्रसीस नामक जीवाणु के प्रकार के सक्रमण के कारण होता है। इस रोग से गोवंशीय पशुओं का बचाव करने हेतु उपाय है यह है सभी गोवंशीय काला ज्वर रोग विरोधी टीकाकरण बरसात शुरू होने से पहले करना ताकि उनमे इस रोग विरोधी शक्ति आ जाएं।
लंगड़ा रोग : यह एक जीवाणुजन्य रोग है जो क्लोस्ट्रीडीयम शोवाय नामक जीवाणु के प्रकार के संक्रमण के कारण होता है। इस रोग से गोवंशीय पशुओं का बचाव करने हेतु उपाय है यह है सभी गोवंशीय काला ज्वर रोग विरोधी टीकाकरण बरसात शुरू होने से पहले करना ताकि उनमे इस रोग विरोधी शक्ति आ जाए।
बाह्य परजीवीयों का नाश : पशुओं के शरीर पर जू, किलनी, लीचड़, पिस्सू आदि बाह्य परजीवी पनपते हैं। वे पशु का खून चूसते हैं जिससे पशु जो चारा खाते है उससे उनका ठीक से पोषण नहीं होता और शरीर में कई संक्रमण पैदा हो सकते हैं। अत: उनकी रोकथाम हेतु पशुओं को रोज खरहारा करें। उन्हें धोये और साफ -सुथरा रखें। इतना करने के बावजूद अगर बाह्य परजीवियों का प्रकोप कम न हो तो डेल्टामेथ्रिन नामक दवा 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी मे घोलकर पशुओं के शरीर छिड़काव करें। इससे वे खत्म हो जाएंगे।

  • डॉ. सुनील नीलकंठ रोकड़े
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