हरे चारे के लिए ज्वार लगायें

ज्वार की बहुवर्षीय साल भर हरा चारा देने वाली किस्म सी.ओ.एफ.एस.-29 का विकास तमिलनाडु कृषि वि.वि.,कोयम्बटूर द्वारा वर्ष 2003 में किया गया। ज्वार की इस किस्म से वर्ष में 5 से 6 कटाई 60 दिनों के अंतराल पर वर्ष भर लिया जा सकता है। इसकी पत्ती एवं तना काफी कोमल और रसीले होते हैं। इसमें प्रोटीन की मात्रा 8 प्रतिशत होती है। इस किस्म को बीज द्वारा लगाया जाता है। पौधे की ऊंचाई 200 से 210 से.मी. तक होती है। इस किस्म में अधिक कल्ले बनाने की क्षमता होती है। इस किस्म को एक बार लगाने पर लगभग दो से तीन वर्ष तक हरा चारा लिया जा सकता है। यह किस्म रसीला एवं कोमल होने का कारण पशुओं द्वारा पसंद किया जाता है। इस किस्म में बीज बनने की क्षमता भी अधिक होती है। 105 से 110 दिन में बीज बनकर तैयार हो जाते हैं। वर्ष में तीन बार बीज लिया जा सकता है।

मृदा एवं उसकी तैयारी
इसकी खेती लगभग सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। अच्छी जल निकास वाली मृदा ज्वार खेती के लिये अच्छी मानी जाती है। पहली जुताई देशी हल या ट्रैक्टर द्वारा किया जाना चाहिये। बाद की जुताई हैरो से करके पाटा लगाकर समतल खेत तैयार करना चाहिये।
बुआई समय
इस किस्म को वर्ष में तीन बार सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर बुवाई की जा सकती है। खरीफ में बुवाई करने हेतु जून के अंतिम सप्ताह या व वर्षा प्रारंभ होने के पूर्व किया जाना चाहिये। इसकी बुवाई मध्य नवंबर एवं मार्च-अप्रैल में भी किया जा सकता है।
उन्नत किस्म
सी.ओ.एफ.एम.-29 इस किस्म से 1000 से 1200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा वर्ष में 5 से 6 कटाई द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। इसमें 23 प्रतिशत सूखा चारा प्राप्त होता है। इसमें लगभग 8 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। इसमें अधिक और लगातार कल्ले निकलने की क्षमता होती है। यह फसल रसीला एवं कोमल होता है।
बीज दर एवं बुवाई विधि
बहुवर्षीय ज्वार की अधिक उपज लेने के लिये 5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से बीज का प्रयोग करना चाहिये। बीज को 45 से.मी. की दूरी पर 2 से 4 से.मी. की गहराई पर सीडड्रिल या कतार बनाकर बुवाई करनी चाहिए।
खाद एवं उर्वरक
बुवाई के समय 45:40:40 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश का प्रयोग करना चाहिये। बुवाई उपरांत 45 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हेक्टेयर का प्रयोग खड़ी फसल में 30 दिन बाद करना चाहिए तत्पश्चात प्रत्येक कटाई के बाद 45 कि.ग्रा. नत्रजन का प्रयोग सिंचाई के साथ करना चाहिए। प्रत्येक चौथे कटाई के बाद 40 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 40 कि.ग्रा. पोटाश का प्रयोग प्रति हेक्टेयर करना चाहिये ताकि उपज अधिक बना रहे।
सिंचाई
वर्षा ऋतु में आमतौर पर सिंचाई की आवश्यकता कम पड़ती है। यदि वर्षा का अंतराल अधिक हो तो 1-2 सिंचाई मौसम के आधार पर करना चाहिये। ठंड के मौसम में प्रत्येक 15 दिन बाद सिंचाई की आवश्यकता होती है, गर्मी के दिनों में 10 से 12 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिये। जब गर्मी अत्यधिक हो तो प्रत्येक 7 दिनों के अंतराल पर एक सिंचाई करनी चाहिये।
खरपतवार नियंत्रण
प्रथम खरपतवार नियंत्रण हाथ द्वारा बुवाई के 20 दिनों पश्चात करनी चाहिये। दूसरी निंदाई 40 दिनों बाद हाथ द्वारा की जानी चाहिये। तत्पश्चात पौध के पूर्ण विकसित हो जाने पर यह किस्म खरपतवारों को अधिक बढऩे नहीं देता है।
कटाई
बहुवर्षीय ज्वार सी.ओ.एफ. एस.-29 की कटाई साल में 5 से 6 बार किया जा सकता है। कटाई प्रत्येक 60 दिनों के अंतराल पर किया जाना चाहिए। ठंड के दिनों में इसमें वृद्धि कम हो जाती है। गर्मी एवं बरसात के दिनों में यह अत्यधिक उपज देने वाली किस्म है। पहली कटाई 60 दिनों के पहले नहीं करना चाहिये। विषाक्तता से बचा जा सके।

बहुवर्षीय ज्वार उगाने हेतु महत्वपूर्ण बिन्दु
  • हुवर्षीय ज्वार सिंचिजत अवस्था में जहां पानी की पर्याप्त व्यवस्था हो वहीं उगाना चाहिये।
  • हर तीसरी कटाई के बाद हल्की गुड़ाई करनी चाहिये।
  • मृत कल्लों को समय-समय पर हटाते रहना चाहिये।
  • कटाई 10 से.मी. ऊपरी से करना चाहिये।
  • नत्रजन प्रबंधन अवश्य करना चाहिये। प्रत्येक कटाई के बाद 45 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर नत्रजन देना चाहिये।
  • दो से तीन वर्ष से अधिक हरा चारा नहीं लेना चाहिये।
  • पानी भराव की स्थिति नहीं होनी चाहिये।
  • डॉ. एस.के. झा
  • डॉ. नितीश तिवारी
  • चंचल पोर्ते
    email : skjha_igau@yahoo.co.in
Share On :

Follow us on

Subscribe Here

For More Articles

Releated Articles